Monday, March 9, 2015

काश्मीर...

कुछ भाजपा समर्थक मित्रों की राय है कि मुफ़्ती की हरकतों को देखते हुए भाजपा को तुरंत कश्मीर सरकार से समर्थन वापस ले लेना चाहिए। लेकिन शायद प्रबल भावनाओं के प्रभाव में उन्होंने इस बात पर ध्यान नहीं दिया है कि इससे समस्या हल नहीं होगी बल्कि बढ़ेगी।
1. स्वाभाविक है कि भारत विरोधी विचारधारा वाले लोग नहीं चाहते कि जम्मू-कश्मीर सरकार में ऐसे लोगों का
प्रभाव बढ़े, जिनकी निष्ठा भारत के प्रति है। इसलिए सरकार में भाजपा की हिस्सेदारी से कइयों को दर्द हो रहा है। आज जब इस आतंकी की जमानत का विरोध हो रहा है तो विपक्षी दलों के लोग सवाल भाजपा से ही पूछ रहे हैं, मुफ़्ती से नहीं। वे भाजपा को उकसा रहे हैं कि वह मुफ़्ती सरकार से समर्थन वापस ले ले। इसका कारण साफ़ है कि वे कश्मीर की सरकार में राष्ट्रवादी प्रभाव को कम करना चाहते हैं। भाजपा समर्थन वापस ले लेगी तो वे अपना समर्थन देकर मुफ़्ती सरकार को बचा लेंगे।

2. बहुत से मित्रों का ध्यान इस बात पर नहीं है कि जम्मू-कश्मीर में विधानसभा के अलावा एक विधान परिषद भी है। परिषद के सदस्यों का चुनाव विधानसभा के सदस्य करते हैं। पहली बार विधानसभा में बड़ी संख्या में राष्ट्रवादी विचारधारा वाले लोग पहुंचे हैं। स्वाभाविक है कि वे परिषद के लिए भी राष्ट्रवादी विचारधारा वालों का चुनाव करेंगे।
3. किसी भी राज्य की कोई भी समस्या आप उस राज्य की असेंबली में बहुमत के बिना हल नहीं कर सकते। कश्मीर पर भी यही बात लागू है। जिनको भाजपा से उम्मीदें हैं वो इस बात को समझते होंगे कि कश्मीर की समस्याएं तब तक हल नहीं होंगी, जब तक वहां भाजपा को पूर्ण बहुमत न मिल जाए। भाजपा को पूर्ण बहुमत तब तक नहीं मिलेगा, जब तक काश्मीर घाटी के इलाके में भाजपा का जन-समर्थन न बढ़ जाए। इस लक्ष्य को पूरा करने की एक बड़ी आवश्यकता लाखों कश्मीरी शरणार्थियों को वापस उनकी जमीनों पर बसाना है। उसके लिए केंद्र सरकार और कश्मीर सरकार दोनों को विशेष प्रावधान करने होंगे। इसलिए ज़रूरी है कि दोनों सरकारों में भाजपा की हिस्सेदारी हो।
4. सौ बात की एक बात ये है कि उस अलगाववादी को आरोपों और मुकदमों से बरी नहीं किया गया है। उसे सिर्फ ज़मानत पर रिहाई मिली है। और ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि वह जेल से ज़मानत पर निकला है। आज राजनाथ सिंह जी संसद में बताया कि उस व्यक्ति पर 27 मुक़दमे चल रहे हैं। उसे ज़मानत भी सशर्त मिली है। तो समझने वालों को इशारा काफी होना चाहिए कि कल फिर इनमें से किसी न किसी मुक़दमे में उसे ज़मानत की शर्तों के उल्लंघन के लिए अंदर किया जा सकता है या कोई नया अपराध पता चलने पर फिर एक मुकादम दर्ज करके जेल भेजा जा सकता है।
5. राजनीति में सारी बातें खुलेआम घोषणा करके नहीं की जा सकतीं और न ही भावनाओं के आवेश में तुरंत कोई निर्णय लेकर लंबी अवधि के लिए नुकसान उठाना समझदारी है। इसलिए मेरा अनुरोध है कि थोड़ा धैर्य रखें।
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(चित्र स्रोत: http://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/a/a0/Kashmir_map.svg)

Friday, February 6, 2015

भारतीय भाषाओं के प्रति TripAdvisor का भेदभाव...

लोकप्रिय ट्रेवल वेबसाइट www.tripadvisor.com पर मैंने अंग्रेजी में कुछ रिव्यूज लिखे थे, वे उन्होंने प्रकाशित किए. लेकिन जब हिन्दी में एक रिव्यू लिखा, तो यह कहकर अस्वीकृत कर दिया गया कि उनकी वेबसाइट पर हिन्दी स्वीकार्य नहीं है. जो भाषाएं स्वीकार्य हैं, उनकी सूची भी उन्होंने भेजी है: Arabic, Chinese, Danish, Dutch, English, French, German, Greek, Indonesian, Italian, Japanese, Korean, Norwegian, Polish, Portuguese, Russian, Spanish, Swedish, Thai, Turkish.

इसमें एक भी भारतीय भाषा नहीं है. कोई कह सकता है कि शायद TripAdvisor वाले किसी तकनीकी समस्या के कारण ऐसा करते होंगे. लेकिन ये कारण नहीं हो सकता क्योंकि यूनीकोड तकनीक के आ जाने से अब किसी भी भाषा में लिखने में कोई तकनीकी दिक्कत नहीं है. जब दाएं से बाएं लिखी जाने वाली अरबी या कठिन चित्र-लिपि वाली चीनी और जापानी भाषाओं में इस वेबसाइट पर लिखने की अनुमति है, तो हिन्दी या भारतीय भाषा में क्यों नहीं लिखा जा सकता?

मैंने एक ईमेल भेजकर TripAdvisor को बता दिया है कि मैं उनकी इस नीति को स्पष्ट रूप से भारतीय भाषाओं के प्रति भेदभाव (discrimination) की नीति मानता हूं और मैं ऐसे किसी भेदभाव को कभी स्वीकार करने वाला नहीं. साथ ही, मैंने उस वेबसाइट पर पहले मेरे द्वारा अंग्रेजी में लिखे गए रिव्यूज़ हटाने और मेरा खाता बंद करने की सूचना भी दे दी है.

ऐसा नहीं है कि मैं अंग्रेजी में नहीं लिख सकता या मेरा अंग्रेजी से (या किसी भी भाषा से) कोई विरोध है. हिन्दी तो मेरी मातृभाषा भी नहीं है, पर आखिर वो मेरे देश की एक भाषा है और यदि कोई जानबूझकर मेरे देश की भाषाओं को अपमानित करे या उनके प्रति भेदभाव करे, तो उसे स्वीकार करने और सहने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता.

मुझे पता है कि उनकी वेबसाइट पर मेरे जैसे एक व्यक्ति का अकाउंट रहने या न रहने से TripAdvisor को फर्क नहीं पड़ता. लेकिन ऐसा करने से मुझे यह तसल्ली तो अवश्य ही मिली है कि मैंने गलत बात का विरोध किया और मैं उसके आगे झुका नहीं.

Tuesday, January 27, 2015

वॉट्सऐप मैसेंजर अब पीसी पर उपलब्ध है...

लोकप्रिय मोबाइल मैसेंजर वॉट्सऐप को अब कंप्यूटर/लैपटॉप पर भी उपयोग किया जा सकता है
1. फिलहाल यह सुविधा केवल गूगल क्रोम ब्राउज़र पर उपलब्ध है। इस एक्स्टेंशन के द्वारा आप अपने फोन पर आने वाले वॉट्सऐप संदेशों की एक कॉपी अपने गूगल क्रोम ब्राउजर पर भी देख सकते हैं। यदि आपके कंप्यूटर/लैपटॉप पर गूगल क्रोम इंस्टॉल नहीं है, तो इस लिंक से डाउनलोड करके इंस्टॉल करें: https://www.google.com/chrome/browser/desktop/index.html.

2. इस सुविधा का उपयोग करने के लिए आपके फोन पर वॉट्सऐप पहले इंस्टॉल होना चाहिए। यदि वॉट्सऐप इंस्टॉल करना हो, तो इस लिंक पर जाएं और अपने फोन के ऑपरेटिंग सिस्टम के अनुसार वॉट्सऐप का सही संस्करण इंस्टॉल करें: http://www.whatsapp.com/download/

3. अपने फोन पर वॉट्सऐप इंस्टॉल हो जाने पर आप गूगल क्रोम ब्राउजर पर अपने वॉट्सऐप संदेश पढ़ सकते हैं और संदेश भेज भी सकते हैं। इसके लिए अपने कंप्यूटर/लैपटॉप पर गूगल क्रोम ब्राउजर खोलें और https://web.whatsapp.com पर जाएं


Tuesday, January 20, 2015

हिन्दी अपनाओ, हिन्दी बढ़ाओ!


हाल ही में, मैंने नवभारत टाइम्स की वेबसाइट पर प्रसिद्ध अंग्रेजी उपन्यासकार श्री चेतन भगत का लेख रोमन अपनाओ, हिंदी बचाओपढ़ा। इस लेख में उन्होंने सुझाव दिया है कि यदि हिन्दी को 'बचाना' है, तो हमें हिन्दी भाषा के लिए देवनागरी लिपि को छोड़कर रोमन लिपि अपना लेनी चाहिए। भगतजी भले ही अंग्रेज़ी में लिखते हैं, लेकिन उनकी अंग्रेज़ी किताबों का हिंदी में भी अनुवाद किया जाता है, उनकी लिखी कहानियों पर हिंदी में फ़िल्में बनी हैं और वे दैनिक भास्कर और नवभारत टाइम्स जैसे हिन्दी अखबारों में लिखते भी रहे हैं। इसलिए यह पढ़कर बहुत आश्चर्य और निराशा हुई कि एक लोकप्रिय लेखक और भाषा-प्रेमी होकर भी वे एक भाषा और लिपि को बचाने और बढ़ाने के बजाय, उसे खत्म करने की वकालत कर रहे हैं।
बात अगर सिर्फ हिन्दी बनाम अंग्रेज़ी की होती, तो मैं ये मान लेता कि शायद अंग्रेज़ी लेखक होने के कारण वे अंग्रेज़ी का ज्यादा से ज्यादा प्रचार करने के इच्छुक हैं, लेकिन उन्होंने अपनी बात के समर्थन में भाषा, सामाजिक रुतबा, फ़िल्में, तकनीक आदि सब-कुछ जोड़ दिया है। इसलिए उनकी बात का जवाब देना मुझे और भी ज्यादा ज़रूरी लगता है।
उनका पहला तर्क है कि अपने देश में सरकारों ने हिंदी के लिए कुछ किया नहीं है और सभी सरकारें सिर्फ दिखावा करती रही हैं। हालांकि पुराने कई उदाहरण दिए जा सकते हैं, लेकिन अगर हम सिर्फ आज की भी बात करें, तो हम देख सकते हैं कि श्री नरेन्द्र मोदी जी प्रधानमंत्री बनने के बाद से ही लगातार न सिर्फ हिंदी को आगे बढ़ाने के लिए काम कर रहे हैं, बल्कि वे विदेशों और यूएनओ जैसे वैश्विक मंचों पर भी हिंदी का पूरे आत्मविश्वास के साथ उपयोग भी कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर अब सभी मंत्रालयों के अकाउंट हैं और उन पर नियमित रूप से हिंदी में पोस्ट और ट्वीट आते रहते हैं। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ है। कुछ लोगों को शायद इसका महत्व समझ नहीं आता होगा, लेकिन देश के लोगों को इसमें एक सकारात्मक बदलाव साफ दिख रहा है
उनका दूसरा तर्क है कि अंग्रेज़ी इसलिए आगे बढ़ रही है क्योंकि लोगों को अंग्रेजी के कारण बेहतर करियर की उम्मीद बंधती है और समाज में उनका रुतबा बढ़ता है। अफ़सोस है कि भगतजी ने यहां अंग्रेजी और अंग्रेजियत के अंतर को अनदेखा करके उन्हें एक साथ मिला दिया है। एक भाषा के रूप में अंग्रेजी सीखने और अंग्रेजी के उपयोग से करियर में आगे बढ़ने में कोई बुराई नहीं है और न मैं इसका विरोधी हूं। लेकिन क्या इसके लिए अंग्रेजियत अपनाना ज़रूरी ही है? अगर मुझे अपने ऑफिस में अंग्रेजी का उपयोग करना पड़ता है, तो क्या मैं घर में भी अंग्रेज़ी ही बोलने लगूं या किताबें भी अंग्रेज़ी (अथवा रोमन हिन्दी) में ही पढूं? यह सोच भी गलत है कि अंग्रेज़ी बोलने से ही समाज में रुतबा बढ़ता है। चाहे हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी हों, विख्यात अभिनेता अमिताभ बच्चन हों, महान गायिका लता मंगेशकर जी हों या हमारे पूर्व प्रधानमंत्री अटलजी हों, ये सभी लोग हिंदी का ही ज्यादा उपयोग करते हैं और समाज में इनका रुतबा क्या है, ये कहने की मुझे ज़रुरत नहीं।
मैं खुद भी हर जगह हिंदी का ज्यादा से ज्यादा उपयोग करता हूं। हवाई अड्डे पर, हवाई जहाज में यात्रा के दौरान, मॉल में, मल्टीप्लेक्स में, सामाजिक समारोहों में, ईमेल लिखते समय, सोशल मीडिया में और फोन पर बातचीत के दौरान मैं ज्यादातर हिंदी का ही उपयोग करता हूं और ऐसा कभी नहीं हुआ है कि हिंदी बोलने के कारण कभी मेरा अपमान किया गया हो या मेरे मित्रों, परिचितों में मेरा रुतबा घटा हो। इसलिए मैं अपने व्यक्तिगत अनुभव से ये कह सकता हूं कि किसी को यह भ्रम नहीं पालना चाहिए कि अंग्रेजी बोलने से आपकी बहुत इज्जत होने लगेगी। आपका रुतबा आपके काम और आपकी सफलता से बढ़ता है, न कि आपकी भाषा से। यदि आप पूरे आत्मविश्वास के साथ अपनी भाषा का उपयोग करते हैं, तो लोग भी आपकी भाषा का और आपका सम्मान करेंगे। यदि आपके मन में ही अपने भाषा के प्रति हीनभावना है, तो दुनिया क्यों आपकी भाषा को सम्मान देगी?
अपने लेख में भगतजी आगे कहते हैं कि अंग्रेजी का उपयोग करने से सूचना और मनोरंजन की एक बिल्कुल नई दुनिया हमारे लिए खुल जाती है और तकनीक तक पहुंच बढ़ती है। उनका तो ये भी दावा है कि अंग्रेजी की सामान्य जानकारी के बिना हम एक मोबाइल फोन या बेसिक मैसेजिंग ऐप्स का उपयोग भी नहीं कर सकते। मुझे नहीं पता कि वे कौन-सा मोबाइल फोन रखते हैं, लेकिन शायद उन्हें जानकारी नहीं है कि आज लगभग हर कंपनी के ऐसे मोबाइल फोन मॉडल उपलब्ध हैं, जिनमें हिंदी भाषा का विकल्प मौजूद होता है। हिंदी को चुनने पर आपके फोन में सारे विकल्प हिंदी में दिखने लगते हैं और वह भगतजी के सुझाव वाली रोमन हिन्दी नहीं, बल्कि विशुद्ध देवनागरी लिपि वाली हिंदी होती है।
उनका यह कहना भी गलत है कि हिंदी के बिना मोबाइल ऐप्स का उपयोग नहीं किया जा सकता। फेसबुक, वॉट्सऐप, ट्विटर जैसे अधिकांश लोकप्रिय ऐप्स अब देवनागरी हिंदी में उपलब्ध हैं। वे आगे लिखते हैं कि वॉट्सऐप में करोड़ों भारतीय सारी बातचीत रोमन हिंदी में करते हैं, इसलिए रोमन हिंदी ही अपना ली जाए। लेकिन इसके आगे उन्होंने स्वयं ही ये भी लिखा है कि ऐसे सॉफ्टवेयर उपलब्ध हैं, जिनसे हिंदी में भी लिखा जा सकता है, लेकिन कोई इनका उपयोग नहीं कर रहा है। तार्किक बात तो ये है कि अगर सॉफ्टवेयर उपलब्ध हैं, तो लोगों को उनकी जानकारी दी जाए। लेकिन ऐसा करने के बजाय वे उल्टा सुझाव दे रहे हैं कि जो लोग उन सॉफ्टवेयर का उपयोग करते भी हैं, वे भी इनका उपयोग बंद करके रोमन में ही हिंदी लिखें। यह तर्क ऐसा ही है, जैसे कोई उनसे कहे कि अगर उनकी किताबें नहीं बिक रही हैं, तो अपनी किताबों का प्रचार करके लोगों तक पहुंचाने की बजाय वे किताबें लिखना ही बंद कर दें।
उनका एक तर्क ये भी है कि ऐसे सॉफ्टवेयर भले ही आउटपुट देवनागरी में देते हैं, लेकिन यूज़र को रोमन में ही टाइप करना पड़ता है। मैंने छः वर्षों तक कंप्यूटर साइंस की पढ़ाई की है, इसलिए मैं जानता हूं कि कंप्यूटर सारा काम बाइनरी भाषा में करते हैं, जिसमें सब-कुछ सिर्फ दो अंकों 1 और 0 से लिखा जाता है। मैं चाहे ‘A’ लिखूं या लिखूं, कंप्यूटर सब-कुछ बाइनरी में ही समझता है। तो क्या मैं सब 1 और 0 से ही लिखने लगूं? हिंदी में ट्रांसलिटरेशन करने वाले सॉफ्टवेयर चाहे बाइनरी में काम करें या रोमन में, मुख्य बात ये है कि वे परिणाम क्या देते हैं? और जब वे हिन्दी के लिए देवनागरी लिपि में परिणाम दे सकते हैं, तो उनका उपयोग करके हिंदी लिखने की बजाय हम क्यों रोमन में ही लिखें?
यह विचार पूरी तरह गलत लगता है कि हिंदी को बचाने की कोशिश में उसकी लिपि को ही मार दिया जाए। यह तर्क ऐसा ही है, जैसे मैं सारे अंडे एक साथ पाने की कोशिश में अपनी मुर्गी को ही मार दूं। चाहे गूगल हो या माइक्रोसॉफ्ट या दुनिया की कोई और बड़ी कंपनी हो, ये सब अपने उत्पाद और सेवाएं हिंदी में उपलब्ध करवाने के लिए लाखों डॉलर खर्च कर रही हैं। माइक्रोसॉफ्ट के विण्डोज़ ऑपरेटिंग सिस्टम सहित, उनके लगभग सारे उत्पाद देवनागरी लिपि वाली हिंदी में उपलब्ध हैं। गूगल सर्च और जीमेल सहित, गूगल के भी लगभग सारे उत्पाद और सेवाएं देवनागरी लिपि वाली हिंदी में उपलब्ध हैं। यहां तक कि फेसबुक, ट्विटर और वॉट्सऐप जैसी सोशल मीडिया सुविधाएं भी देवनागरी वाली हिन्दी में उपलब्ध हैं। जहां तक हिन्दी में लिखने की बात है, तो गूगल इनपुट टूल्स नामक सरल सॉफ्टवेयर के उपयोग द्वारा आज बहुत आसानी से अपने फोन या कंप्यूटर पर हम हिंदी में लिख सकते हैं।
मैं अपने लैपटॉप में विण्डोज़ 8.1 का हिन्दी संस्करण उपयोग करता हूं। मेरे एण्ड्रॉइड स्मार्टफोन का पूरा इंटरफेस हिंदी में है। मैं जीमेल, फेसबुक, ट्विटर, वॉट्सऐप सबका हिंदी संस्करण उपयोग करता हूं और यह सब देवनागरी में है, रोमन हिंदी में नहीं। इसलिए यह कहना पूरी तरह गलत है कि अंग्रेज़ी या रोमन हिंदी के बिना हम आधुनिक तकनीक का उपयोग नहीं कर सकते।
ये सही है कि रोमन हिंदी बॉलीवुड के पोस्टरों और विज्ञापनों में प्रचलित है। ये भी हो सकता है कि हिंदी फिल्मों के स्क्रीनप्ले रोमन हिंदी में लिखे जा रहे हैं। लेकिन अगर बॉलीवुड के कुछ कलाकार और निर्देशक हिन्दी नहीं सीखना चाहते, तो क्या हिन्दी को ही ख़त्म कर दिया जाए? यह कहना सिर्फ भ्रम फैलाने का प्रयास है कि आज की तकनीक-आधारित ज़िंदगी में देवनागरी लिपि को शामिल करना बहुत कठिन काम है। यह तर्क यूनिकोड तकनीक के आने से पहले चल सकता था, लेकिन अब यूनिकोड के कारण हिंदी या किसी भी भाषा का उपयोग किसी भी वेबसाइट, सॉफ्टवेयर, सोशल मीडिया या फोन पर करने में कोई दिक्कत नहीं रह गई है।
अगर किसी एक लिपि को अपना लेना देश की एकता में बहुत बड़ा कदम होगा, तो क्यों न भारत में अंग्रेजी के लिए रोमन की बजाय देवनागरी लिपि ही अपना ली जाए? आज हिंदी को रोमन में लिखने की बात करने वाले कल शायद मराठी, बांग्ला, गुजराती, पंजाबी, तमिल, तेलुगु आदि सभी भाषाओं को रोमन में लिखने की वकालत करने लगेंगे। तो क्यों न इतनी मेहनत करने के बजाय अकेली अंग्रेज़ी को ही देवनागरी में लिखा जाए? ‘आप कैसे हैं?’ को ‘Aap kaise hain?’ लिखने की बजाय क्यों न हम ‘How are you?’ को भी हाऊ आर यू?’ लिखना शुरू कर दें? रोमन को ग्लोबल स्क्रिप्ट कहकर इसे अपनाने का तर्क देने से बेहतर यह होगा कि हम अपने देश में और दुनिया भर में अपनी भाषा के लिए अपनी लिपि का ज्यादा से ज्यादा उपयोग करके इसे भी एक ग्लोबल स्क्रिप्ट का दर्जा दिलाएं। चीनी मैंडरिन को बोलने वालों की संख्या शायद दुनिया में सबसे ज्यादा है, लेकिन उसकी लिपि रोमन नहीं है। यूएन में अरबी सहित कई आधिकारिक भाषाएं हैं, लेकिन वे भाषाएं अपनी-अपनी लिपि का उपयोग करती हैं, सभी भाषाओं में सिर्फ रोमन लिपि में ही काम नहीं होता। सबकी एक लिपि करने से विविधता भी नष्ट हो जाएगी और भाषा का सौंदर्य भी ख़त्म हो जाएगा।
अंग्रेजी और हिन्दी दोनों की अपनी-अपनी उपयोगिता है, इसलिए हिंदी पर रोमन लिपि थोपकर इसे भाषाओं के बीच संघर्ष का रंग देने से अच्छा ये है कि हम दोनों भाषाओं की मूल लिपि का ही उपयोग करके उनके सौंदर्य और उपयोगिता दोनों को बनाए रखें।
भगतजी, आय होप माय पॉइंट इज़ क्लीयर टू यू!

Wednesday, November 26, 2014

क्या आप इन्हें पहचानते हैं?

क्या आप इन्हें पहचानते हैं? नहीं?चलिए, मैं इनका नाम बता देता हूँ…
ये हैं श्री तुकाराम ओम्बले….क्या आपने इन्हें अब भी नहीं पहचाना?
कोई बात नहीं…आप “अजमल कसाब” को तो ज़रूर पहचानते होंगे??
बहुत अच्छे….कितने अफसोस की बात है कि इस देश में कसाब को हर कोई जानता है, लेकिन ज्यादातर लोगों ने तुकाराम ओम्बले का नाम भी नहीं सुना…आइये मैं आपको उनके बारे में कुछ बताऊँ..
26 नवंबर 2008 को जब आतंकियों ने मुंबई पर हमला किया, तो मुंबई पुलिस के सहायक सब-इन्स्पेक्टर,48 वर्षीय श्री तुकाराम ओम्बले, नाइट ड्यूटी पर थे. लेपर्ड कैफे, ओबरॉय और होटल ताज में गोलीबारी की खबरें मिलने पर मुंबई पुलिस हरकत में आ चुकी थी. ओम्बले के वरिष्ठ अधिकारियों ने उन्हें मरीन ड्राइव में पोजीशन लेने को कहा. रात लगभग 12:45 बजे, उन्हें वॉकी-टॉकी पर चेतावनी संदेश मिला कि दो आतंकियों ने एक स्कॉडा कार को हाइजैक कर लिया है और वे गिरगाँव चौपाटी की ओर बढ़ रहे हैं. कुछ ही मिनटों बाद ओम्बले ने उस कार को गुज़रते हुए देखा.
ओम्बले ने तुरंत अपनी बाइक पर सवार होकर उस कार का पीछा किया. डीबी मार्ग पुलिस थाने की के टीम चौपाटी सिग्नल पर बैरिकेड लगाने की तैयारी कर रही थी.जैसे ही वह कार सिग्नल के पास पहुंची, आतंकियों ने पुलिस टीम पर अंधा-धुंध गोलीबारी शुरू कर दी, लेकिन बैरिकेड के कारण उन्हें कार की स्पीड कम कर देनी पड़ी. अपनी बाइक पर सवार ओम्बले ने कार को ओवरटेक किया और उसके सामने आकार बाइक रोक दी, जिसके परिणामस्वरूप ड्राइवर को कार दायीं ओर मोड़नी पड़ी और वह जाकर डिवाइडर से टकरा गई. एक पल के लिए आतंकी भौंचक्के रह गए. इस बात का लाभ उठाते हुए ओम्बले उनमें से एक की ओर झपटे और अपने दोनों हाथों से उसकी एके 47 राइफल का बैरल पकड़ लिया. वह आतंकी था- अजमल कसाब. बैरल को ओम्बले की ओर घुमाते हुए कसाब ने ट्रिगर दबा दिया, जिससे ओम्बले के पेट में गोलियाँ लगीं और वे ज़मीन पर गिर पड़े. लेकिन इसके बावजूद जब तक उनमें होश बाकी था, उन्होंने बन्दूक नहीं छोड़ी.”
शायद अब आप पहचान गए होंगे कि तुकाराम ओम्बले कौन हैं? तुकाराम ओम्बले मुंबई पुलिस के उस जांबाज़ सिपाही का नाम है, जिसने अपने प्राणों की आहुति देकर हम जैसे अनेकों की जिंदगी बचाई और जिसके कारण कसाब को जीवित पकड़ा जा सका.
क्या आप जानते हैं कि आज उनका परिवार कहाँ रहता है? क्या आप जानते हैं कि उनके परिवार-जन क्या काम करते हैं?शायद ये सब सोचने-जानने की फुर्सत हममें से किसी के पास नहीं है!!
लेकिन कम से कम एक बार तुलना करके देखिए कि भारत सरकार ने ओम्बले के परिवार को आर्थिक सहायता देने के लिए और आतंकी कसाब की सुरक्षा पर कितना खर्च किया?क्या इस पर हमें शर्म महसूस नहीं होनी चाहिए?
अफसोस है कि जिस वीर का नाम इतिहास के पन्नों में स्वर्णाक्षरों में लिखा जाना चाहिए था, ताकि भावी पीढियाँ उनसे प्रेरणा ले सकें, हम उनका नाम तक नहीं जानते. शहीद ओम्बले का जीवन और उनका बलिदान इस बात का प्रमाण है कि एक सामान्य व्यक्ति भी देश के लिए क्या कुछ कर सकता है.
अपनी इस अद्भुत वीरता और पराक्रम के लिए श्री तुकाराम ओम्बले को ‘अशोक-चक्र’ से सम्मानित किया गया. स्थानीय भाजपा सांसद श्री मंगल प्रभात ने ओम्बले के सम्मान में एक स्मारक भी बनवाया है, जो मुठभेड़ स्थल के निकट सड़क किनारे बना हुआ है. इस वर्ष 26 नवंबर को गिरगाँव चौपाटी पर ओम्बले की कांस्य प्रतिमा का भी अनावरण होगा.
कसाब का नाम देश के बच्चे-बच्चे को याद करवाने और उसकी हर छोटी से छोटी बात का प्रचार करने में व्यस्त मीडिया चैनलों के पास तो इतना समय नहीं है कि वे ऐसे देशभक्त बलिदानियों के बारे में देश को कुछ बताएँ. लेकिन क्या आप और हम भी इतने व्यस्त हैं कि ये जानकारी अधिक से अधिक लोगों तक शेयर करके ऐसी महान आत्माओं के प्रति अपनी श्रद्धांजलि भी अर्पित न कर सकें? आपके पास देश को देने के लिए कुछ और हो न हो, पर आप कम से कम इस लेख को शेयर तो कर ही सकते हैं न? तो ज़रूर कीजिए….वंदे मातरम!