Monday, September 8, 2008

'हिन्दी-दिवस'

भारत में प्रतिवर्ष १४ सितम्बर का दिन 'हिन्दी-दिवस' के रूप में मनाया जाता है. इस दिन विभिन्न शासकीय-अशासकीय कार्यालयों, शिक्षा संस्थाओं आदि में विविध गोष्ठियों, सम्मेलनों, प्रतियोगिताओं तथा अन्य कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है. कहीं-कहीं 'हिन्दी पखवाडा' तथा 'राष्ट्रभाषा सप्ताह' इत्यादि भी मनाये जाते हैं. विश्व की एक प्राचीन, समृद्ध तथा महान भाषा होने के साथ ही हिन्दी हमारी राष्ट्रभाषा भी है. अतः इसके प्रति अपना प्रेम और सम्मान प्रकट करने के लिए ऐसे आयोजन स्वाभाविक ही हैं. परन्तु, दुःख का विषय यह है की समय के साथ-साथ ये आयोजन केवल औपचारिकता मात्र बनते जा रहे हैं.
राष्ट्रगीत,राष्ट्रध्वज तथा राष्ट्रभाषा किसी भी राष्ट्र के मानबिंदु होते हैं. इनका रक्षण, पोषण तथा प्रसार करना प्रत्येक राष्ट्र का कर्तव्य है.अतः राष्ट्र भाषा होने के कारन हिन्दी का भी व्यापक प्रचार-प्रसार किया जाना आवश्यक है. परन्तु, ऐसा लगता है की भारत में कभी भी इस दृष्टि से विचार नहीं किया गया. स्वतंत्रता के बाद भी पश्चिमी शिक्षा-पद्धति को ही जारी रखने के कारण पश्चिम को ही श्रेष्ठ मानने की प्रवृत्ति उत्पन्न हो गई. इसी प्रकार अंग्रेज़ी का ज्ञान रखने वालों को ही विद्वान मानने की मानसिकता भी दिखाई देती है. इसका दुखद पहलू यह है कि केवल सामान्य जनता में ही नहीं, वरन, शासकों के मन में भी यही भावना विद्यमान है.इसका एक उदहारण यह है कि अपने पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटलबिहारी वाजपेयी ने जब सांसद के रूप में अपना प्रथम भाषण हिन्दी में प्रारम्भ किया, तो इसका विरोध करते हुए अनेक संसद-सदस्य उठकर सदन से बाहर चले गए. आज भी संसद में होने वाली बहस तथा चर्चाओं में बड़े पैमाने पर अंग्रेज़ी का ही प्रयोग होता हुआ दिखाई देता है।

पिछले कुछ वर्षों में वैश्वीकरण तथा उदारीकरण के नाम पर प्रत्येक क्षेत्र का पश्चिमीकरण करने का प्रयास लगातार जारी है।इसके साथ-साथ ही हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओं के स्थान पर अंग्रेज़ी को अधिकाधिक प्रसारित करने का कार्य भी चल रहा है।यह प्रचार भी किया जा रहा है की वैश्वीकरण के इस दौर में यदि भारत को एक विकसित राष्ट्र बनना है, तो अंग्रेज़ी का प्रयोग अनिवार्य है।इसी दुष्प्रचार से भ्रमित होकर छात्रों तथा अभिभावकों में अंग्रेज़ी माध्यम में ही शिक्षा प्राप्त करने की होड़ दिखाई देती है।परन्तु,वैज्ञानिक शोध इस बात को सिद्ध कर चुके हैं की बच्चों के मस्तिष्क, बुद्धि एवं तर्क शक्ति के सहज एवं संपूर्ण विकास के लिए मातृभाषा में शिक्षा प्राप्त करना ही सर्वाधिक सहायक है।इसी प्रकार यह तर्क भी ग़लत है की अंग्रेज़ी को अपनाए बिना प्रगति नहीं की जा सकती।फ्रांस, जर्मनी,जापान चीन आदि अनेक देश अपने व्यापार एवं व्यव्हार में सदैव सर्वत्र अपनी-अपनी मातृभाषा का ही प्रयोग करते हैं।यदि अंग्रेज़ी के प्रयोग के बिना भी ये सभी देश विकसित हो सकते हैं, तो भारत क्यो नही?यहाँ मैं यह स्पष्ट कर देना चाहता हूँ की एक भाषा के रूप में मेरा अंग्रेज़ी अथवा किसी अन्य भाषा के प्रति विरोध या विद्वेष नहीं है।परन्तु, मैं अंग्रेज़ी के अनावश्यक प्रयोग तथा प्रत्येक क्षेत्र में किए जा रहे अंधाधुंध अंग्रेजीकरण का विरोधी हूँ.विदेश व्यापर, सॉफ्टवेर, कॉल सेण्टर आदि कुछ ऐसे क्षेत्र हैं, जिनमें अंग्रेज़ी का प्रयोग आवश्यक एवं स्वाभाविक है.लेकिन, दैनिक जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अंग्रेज़ी का प्रयोग अनावश्यक तो है ही, साथ ही, यह हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओँ के लिए हानिकारक भी है.अतः एक विकसित राष्ट्र बनने के लिए पहली आवश्यकता यह है कि हम हिन्दी को हीन मानकर तिरस्कृत करने की बजाय उस पर गर्व करें एवं दैनिक जीवन में आग्रहपूर्वक इसका अधिकाधिक प्रयोग एवं प्रचार-प्रसार करें.
हिन्दी विश्व की एक प्राचीन, समृद्ध तथा सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाओँ में से एक है।६६ से अधिक देशों में हिन्दी जानने वाले लोग रहते हैं.विश्व के अनेक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में हिन्दी भाषा सीखने की व्यवस्था है.अपनी हिन्दी फिल्मों तथा गीत-संगीत का जादू सम्पूर्ण विश्व को मोहित कर रहा है.यह निश्चित ही हम सभी के लिए गर्व का विषय है.लेकिन, दूसरी और दुखद पहलू यह भी है की धीरे-धीरे अपने ही देश में हिन्दी उपेक्षित हो रही है. वित्ताकोशों(बैंक्स), कार्यालयों, शिक्षण-संस्थाओं इत्यादि में हिन्दी का प्रयोग लगातार कम होता जा रहा है. बाजारों तथा दुकानों में बिकने वाली सामान्य वस्तुओं जैसे दवाएं,साबुन इत्यादि से लेकर बड़े-बड़े उद्योगों तक में सर्वत्र अंग्रेज़ी का प्रयोग ही अधिक दिखाई देता है.यहाँ तक की हमारे देश की शासकीय विमान-सेवा का नाम भी राष्ट्र-भासः में न होकर अंग्रेज़ी में ही है . यह स्थिति बदलनी चाहिए.

भारत विश्व के प्रमुख एवं महत्वपूर्ण देशों में से एक है. संपूर्ण विश्व के विकास एवं सकल मानव-जाति के कल्याण में भारत के योगदान को उपेक्षित नहीं किया जा सकता.संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना के समय से ही भारत इसका सक्रिय सदस्य रहा है.इसके द्वारा संचालित सभी कार्यक्रमों एवं अभियानों को सफल बनने में भारत ने सदैव ही पूर्ण सहयोग दिया है.परन्तु, दुःख का विषय है कि इसकी अधिकृत भाषाओँ की सूची में अंग्रेज़ी, चीनी, फ्रेंच, रूसी, अरबी इत्यादि भाषों को तो स्थान दिया गया है, परन्तु, करोड़ों लोगो द्वारा प्रयोग की जाने वाली हिन्दी भाषा को अब तक उस सूची में स्थान नहीं मिल सका है.इसका एक कारण यह भी है कि हिन्दी को स्वयं अपने देश में ही यथोचित सम्मान नहीं मिल रहा है. संयुक राष्ट्र संघ की सभाओं एवं बैठकों को संबोधित करनेवाले हमारे सभी प्रधानमंत्रियों में से श्री वाजपेयी के अलावा शायद ही किसी और ने इस मंच पर हिन्दी का प्रयोग किया है.
जिस प्रकार यह सत्य है की हिन्दी की चिंताजनक स्थिति के लिए हम सभी दोषी हैं, उसी प्रकार यह भी सत्य है की इसके विकास एवं प्रचार-प्रसार के लिए कार्य करना भी हम सभी का उत्तरदायित्व है. यदि हम अपने सामान्य दैनिक जीवन में छोटी-छोटी बैटन का ध्यान रखें एवं कुछ सरल सुझावों का पालन करें, तो हम सभी अपने अल्प प्रयास के द्वारा ही हिन्दी के विकास में बड़ा योगदान दे सकते हैं. हमें अपने दैनिक वार्तालाप में हिन्दी का अधिक से अधिक प्रयोग करना चाहिए. समस्त पात्र व्यव्हार का माद्यम हिन्दी ही होना चाहिए.कार्यालयों,न्यायालयों,शिक्षा-संस्थाओं आदि को भेजे जाने वाले आवेदन-पत्र इत्यादि भी हिन्दी में ही भेजें. अंतरताना (इन्टरनेट) पर अनु-डाक(ऐ-मेल) भेजनेवाले भी सरलता से हिन्दी का प्रयोग कर सके हैं. आजकल अनेक वेब-साइटों पर हिन्दी में -मेल भेजने की सुविधा उपलब्ध है.इसी प्रकार अनेक लिप्यान्तरण (ट्रांस्लितेरेशन) सॉफ्टवेर भी विकसित हो चुके हैं, जिनके द्वारा सरलता से हिन्दी में लिखा जाता है. जैसे :- यदि हम अंग्रेज़ी में 'नमस्ते' लिखें, तो यह संगणक के पटल(स्क्रीन) पर हिन्दी में 'नमस्ते' लिखा हुआ दिखाई देगा.सचल दूरभाष(मोबाइल फोन्स) में भी हमें हिन्दी अ विकल्प चुनना चाहिए एवं संदेश आदि भी हिन्दी में ही भेजने चाहिए.इसी प्रकार अपने घरों के बाहर लगाई जाने वाली नाम-पट्टिका(नेम-प्लेट) भी हम हिन्दी में ही लगवाएं तथा विभिन्न अवसरों पर भेजे जाने वाले बधाई संदेश, शोक संदेश आदि भी हिन्दी में ही भेजें.इस प्रकार की चोटी-चोटी बों को अपनाकर प्रत्येक व्यक्ति हिन्दी के विकास में योगदान दे सकता है.विभिन्न सामाजिक संस्थाओं द्वारा भी स्वयं हिन्दी का अधिकाधिक प्रयोग करते हुए समाज के प्रत्येक व्यक्ति को हिन्दी सीखने के लिए प्रेरित किया जन चाहिए.अहिन्दी भाषी राज्यों के लोगों को भी हीनी के महत्व एवं आवश्यकता की जानकारी दी जनि चाहिए.जिस प्रकार हम अंग्रेज़ी आदि विदेशी भाषाओं को सीखने का प्रयास करते हैं, उसी प्रकार प्रत्येक भारतीय को हीनी भी सीखनी चाहिए.
परन्तु,केवल सामान्य जनों एवं कुछ संस्थाओं के प्रयास ही पर्याप्त नहीं हैं.शासन को भी इस विषय में प्रयास करने होंगे.हिन्दी के विकास के लिए कार्य करनेवाले लेखकों,कवियों,गायकों,संगीतकारों एवं अन्य कलाकारों को पुरस्कृत किया जन चाहिए.सभी विदेशी नेताओं, राजनयिकों एवं प्रतिनिधियों से होने वाली औपचारिक चर्चाओं, बैठकों तथा वार्तालाप आदि भी अनुवादकों तथा दुभाषियों की सहायता से हिन्दी में ही होने चाहिए.इसी प्रकार अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताएं में देश का प्रतिनिधित्वा करनेवाले खिलाड़ियों के गणवेश पर अंग्रेज़ी में 'इंडिया' लिखने की बजाय हिन्दी में 'भारत' लिखा जन चाहिए. ऐसे छोटे-छोटे कार्य हिन्दी के प्रचार-प्रसार में बहुत लाभदायक होंगे।

प्रत्येक भारतीय के मन में हिन्दी के प्रति गर्व एवं प्रेम की भावना उत्पन्न करना हम सभी का कर्तव्य है. अतः हमें प्रयास करना चाहिए की 'हिन्दी-दिवस' जैसे आयोजन केवल औपचारिकता मात्र न रहकर हिन्दी के प्रति सम्मान प्रकट करने का मध्यम बनें.अन्यथा, यदि हमारे द्वारा हिन्दी की इसी प्रकार उपेक्षा होती रही, तो सम्भव है की हिन्दी भाषा के समाप्त होने का दुखद-काल भी हमें अपनी आंखों से देखना पड़े और आने वाली पीढियों के लिए १४ सितम्बर का दिन हिन्दी के प्रति सम्मान का दिन बन्ने की बजाय हिन्दी का 'स्मृति-दिवस' बनकर रह जाए. यदि ऐसा हुआ, तो इसके जिम्मेदार हम सब ही होंगे.