Sunday, November 7, 2010

मेरा भारत महान है?

छद्म-सेक्युलर भारत!

यहाँ गुजरात दंगों का ज़िक्र होता है, लेकिन गोधरा का नहीं,
कंधमाल की बात होती है, लेकिन स्वामी लक्ष्मणानंद जी की हत्या की नहीं,
काश्मीर में सेना पर पत्थर फेंकने वाले "मासूम" युवाओं की बात होती है,
लेकिन काश्मीरी पण्डितों की नहीं।

अफज़ल और कसाब जेल में शान से रहते हैं, साध्वी प्रज्ञा जैसे संत यातनाएँ सहते हैं,
नक्सली और आतंकी "भटके हुए नौजवान" कहलाते हैं, और बजरंग दल, शिवसेना के कार्यकर्ता आतंकवादी बताये जाते हैं,
अरुँधती और गिलानी राष्ट्रद्रोह करके भी मुक्त हैं,संघ के देशभक्त कार्यकर्ता आतंक के झूठे आरोपों से त्रस्त हैं।

शायद हिंदू विरोध ही इस देश की शान है, क्या इसीलिये मेरा भारत महान है?

Friday, November 5, 2010

दीपावली, आर्य चाणक्य और वर्तमान राजनेता

मित्रों, आप सभी को प्रकाश-पर्व दीपावली पर हार्दिक शुभकामनाएँ! दीपावली का उल्लेख हो और दीपों की बात न हो, ये संभव नहीं है। अमावस की रात में आने वाली दीपावली को ये छोटे-छोटे दीप ही रोशन करते हैं और हमें प्रेरणा देते हैं कि जिस तरह एक छोटा-सा दीपक अँधेरे को दूर कर देता है, उसी तरह हमारा एक छोटा प्रयास भी एक दिन कोई बड़ा परिवर्तन ला सकता है। बस! मन में उत्साह और अपने संकल्प की पूर्ति के लिये लगन होनी चाहिये।
ऐसी ही लगन आर्य चाणक्य के मन में थी और उन्होंने अपनी लगन से उसे पूरा करके दिखाया। अपने अदम्य उत्साह के बल पर उस एक अकेले व्यक्ति ने कितने सारे महान कार्य पूरे कर दिये। सिकंदर जैसे आक्रमणकारी को अपनी विशाल सेना के होते हुए भी सैनिकों सहित भारत से बाहर खदेड़ दिया। एक छोटे-से बालक को अपने योग्य-मार्गदर्शन में सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया। राजा धनानन्द की मज़बूत सत्ता को उखाड़कर सभी छोटे-बड़े राजाओं को मौर्य साम्राज्य के अधीन ले आए और पूरे भारत को फिर एक बार उसी तरह अखण्ड बना दिया, जैसा वह श्रीराम और श्रीकृष्ण के काल में था।

चाणक्य केवल एक विद्वान ब्राह्मण और अर्थशास्त्री ही नहीं, वरन् एक देशभक्त राजनीतिज्ञ भी थे। दीपावली के इस अवसर पर दीपों की बात निकली, तो मुझे चाणक्य के जीवन का एक प्रसंग आ रहा है। यूनान का एक दूत मौर्य साम्राज्य के मार्गदर्शक आर्य चाणक्य से मिलने के लिये गया। इतने बड़े साम्राज्य के निर्माता चाणक्य पाटलिपुत्र में गंगा के किनारे एक छोटी-सी कुटिय में निवास करते थे। रात का समय था। दूत ने देखा कि एक छोटा-सा दीप जल रहा है और उसके प्रकाश में कौटिल्य अपने लेखन में व्यस्त हैं। इस दूत के आने पर उन्होंने उसका स्वागत किया और जलता हुआ वह दीप बुझाकर एक दूसरा दीप जला दिया। दोनों में बात-चीत होने लगे। दूत ने कारण पूछा कि आखिर आपने पहला दीप बुझाकर दूसरा क्यों जलाया है? तब चाणक्य ने उत्तर दिया कि वह जो दीप है, वह मुझे शासकीय कार्य के लिये शासन की ओर से मिला है। उसका उपयोग मैं अपने व्यक्तिगत कार्यों के लिये कैसे कर सकता हूँ? ये जो दूसरा दीप है, ये मेरा है। जब आप आए, तो मैं शासकीय कार्य कर रहा था। इसलिये पहला वाला दीप जल रहा था। लेकिन आपसे जो मेरा वार्तालाप चल रहा है, ये मेरा निजी कार्य है। इसलिये मैंने पहला वाला दीप बुझाकर दूसरा वाला जला दिया!

कथा भले ही छोटी-सी हो, लेकिन इसका मर्म बहुत गहरा है। हम हमेशा महापुरुषों की ऐसी अनेक कथाएँ और प्रसंग सुनते हैं, लेकिन जब हमारे सामने कोई ऐसा अवसर आता है, तो क्या हम स्वयं ऐसा व्यवहार करते हैं? हम इस बात पर गर्व करते हैं कि अतीत में भारत विश्व का सबसे शक्तिशाली, वैभव-संपन्न और समृद्ध राष्ट्र था, लेकिन क्या हम इस बात पर विचार करते हैं कि वर्तमान भारत इस दुःस्थिति में क्यों है? हम इस बात के लिये केवल विदेशी हमलावरों को दोष देकर अपने कर्तव्य से मुँह नहीं मोड़ सकते। विदेशी आक्रमणों की एक हजार वर्षों की श्रृँखला 1947 में टूट गई। लेकिन हमारे कुछ अदूरदर्शी और स्वार्थी राजनेताओं और शासकों की कृपा से देश आज भी असुरक्षित बना हुआ है। हम लगातार आंतरिक और बाह्य आक्रमणों से जूझ रहे हैं। क्या हमारे राजनेता आर्य चाणक्य से कोई सीख लेंगे?

आर्य चाणक्य जैसे महापुरुषों के जीवन का अध्ययन करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि अतीत में भारत विश्व-गुरु क्यों कहलाता था। अपने निजी कार्य के लिये शासकीय धन की एक पाई का भी प्रयोग न करने वाले उस महात्मा और शासकीय धन को अपने घर की संपत्ति समझने वाले वर्तमान राजनेताओं के बीच कोई तुलना भी नहीं की जा सकती। इनमें ज़मीन-आसमान का अंतर है और यही कारण है कि तत्कालीन बिश्व-गुरु भारत और वर्तमान संकट-ग्रस्त भारत में भी इतना अंतर है।

यदि हमें भारत को पुनः विश्व-गुरु बनाना है, तो फिर एक बार उसी मार्ग को अपनाना पड़ेगा, जो श्रीराम, श्रीकृष्ण और आर्य चाणक्य ने हमें दिखाया है। हम अमरीका, चीन, यूरोप, रूस या किसी भी अन्य देश की नकल करके कभी आगे बढ़ सकते। जब तक हम नकल करते रहेंगे, तब तक हमेशा किसी न किसी से पीछे ही रहेंगे। यदि हम भारत को इसका खोया हुआ वैभव और स्थान पुनः दिलाना चाहते हैं, तो इसके लिये दो बातों को अपनाना अनिवार्य है- निःस्वार्थ देशभक्ति और अपने कर्तव्य का ईमानदारी से पालन। ये दो ऐसे तत्व हैं, जिन्हें आप, मैं और देश का हर सामान्य नागरिक भी सहजता से अपना सकता है। हमें याद रखना चाहिये कि परिवर्तन तभी हो सकता है, जब समाज जागृत हो और समाज जागृत तभी होगा जब इसका प्रत्येक सदस्य अपने कर्तव्य का ईमानदारी और निष्ठा से पालन करे।

आइये, इस दीपावली पर एक दीप अपने राष्ट्र के नाम जलाएँ और ये संकल्प लें कि हम राष्ट्र-निर्माण में हरसंभव अपना योगदान देंगे। हर परिवर्तन अब हमें ही करना है क्योंकि राजनेताओं और राजनीति से तो अब कोई आशा करना भी शायद व्यर्थ है…शुभ दीपावली!!

Friday, July 9, 2010

कश्मीरी पण्डितों के दर्द को व्यक्त करती एक कविता…

मेरी बेटी की ओढ़नी
तार-तार की गई-
सब खामोश रहे।

मुझे विवश किया गया
अपना घर-द्वार छोड़कर
संस्थापित से विस्थापित बनने के लिये
कोई कुछ नहीं बोला।

मैं अपने परिवार के साथ
न्याय की गुहार लगाते हुए
वर्षों से दिल्ली के फुटपाथ पर हूँ
किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता।
कोई भी मानवाधिकारवादी
कोई भी टीवी चैनल
कोई भी राजनीतिक ध्वजाधारी
मेरे विषय में चर्चा नहीं करता,
मेरा आर्त्तनाद नहीं बनता
किसी भी प्रगतिवादी
साहित्यकार की
कथा का विषय।
मेरी त्रासभरी आँखें नहीं बनतीं
किसी भी जनवादी पत्रिका का मुख-पृष्ठ

मैं अपने प्रान्त से बहिष्कृत
अपने परिवेश से तिरस्कृत

अपने अवांछित अस्तित्व के लिये
हर कदम पे दण्डित हूँ
क्योंकि मैं
एक कश्मीरी पण्डित हूँ।

शायद यह मेरे पूर्व जन्म के पापों का
फलस्वरूप परिताप है
क्योंकि कश्मीर में हिन्दू होना
आज एक विडम्बना है, अभिशाप है!

(पाञ्चजन्य, नई दिल्ली 4 जुलाई 2009 अंक में प्रकाशित श्री शिव ओम अम्बर की कविता)

Friday, May 7, 2010

तस्वीरों के पार

मैं अपनी तस्वीरों में हूँ भी और नहीं भी
मैं अपने पोस्टर में हूँ भी और नहीं भी
इसमें न कोई विरोध
न कोई विरोधाभास.

तस्वीर आत्मा जैसी नहीं है
वह तो पानी में भीगती है
आग में जलती है
बह भीगे या जले
मुझे कुछ नहीं होता

आप मुझे मेरी तस्वीर में या पोस्टर में
खोजने का मिथ्या प्रयत्न न करें.
मैं तो निश्चिंत बैठा हूँ
अपने आत्मविश्वास में-
अपनी वाणी, व्यवहार और कर्म में
आप मुझे मेरे कर्मों से जानें
कर्म ही मेरा जीवन-काव्य है
लयताल है.

घर में गीतासार
आंगन में कर्मधार
आप सभी के लिए अकारण आर्द्र
कोमल प्यार है

आप मुझे तस्वीर में नहीं
पसीने की खुशबू में खोजें
योजनाओं के अम्बार की थकावट में
मेरी आवाज़ की गूँज पहचानें
मेरी आँखों में आप ही की छवि है।

(श्री नरेंद्र मोदी की कविता का पाञ्चजन्य में प्रकाशित हिन्दी अनुवाद)

2011 की जनगणना में हमारी भूमिका

2011 की जनगणना में प्रत्येक व्यक्ति से उसकी मातृभाषा पूछी जाएगी। चूँकि भारत एक बहु-भाषी देश है,अतः प्रत्येक व्यक्ति से यह भी पूछा जाएगा कि उसे और कौन-सी भाषाओं का ज्ञान है। जिनकी मातृभाषा कोई भारतीय भाषा है, स्वाभाविक रूप से उन्हें कम से कम 50% संस्कृत शब्दों का उच्चारण करना आता है। जैसे- जल, वायु, अग्नि, मार्ग, नेत्र, विवाह, भोजन आदि। इसका कारण यह है कि संस्कृत ही समस्त भाषाओं की जननी है। करोड़ों भारतीय,विशेषतः हिन्दू,अनेक स्तोत्र-मंत्रों, आरतियों,गीता-पाठ आदि के माध्यम से प्रातः काल से रात्रि तक दिन-भर संस्कृत का ही उच्चारण करते रहते हैं। अधिकांश हिन्दुओं के नाम भी संस्कृतनिष्ठ ही होते हैं, जैसे- राजेन्द्र, सुरेश, सुरेन्द्र, मीनाक्षी, सुरभि, निधि, स्वाति, सुमंगल आदि। हम दिन में अनेक बार इन नामों का उच्चारण करते हैं। अतः स्पष्ट है कि हममें से अधिकांश भारतीयों को संस्कृत का थोड़ा बहुत ज्ञान अवश्य है और हम इस भाषा का बड़े पैमाने पर प्रयोग भी करते हैं।

अतः जिन भारतीय नागरिकों की प्रथम भाषा संस्कृत न हो, उन सभी को अवश्य ही अपनी द्वितीय-भाषा के रूप में संस्कृत का उल्लेख करना चाहिए। तीसरी भाषा से संबंधित प्रश्न के उत्तर में किसी भी अन्य भारतीय भाषा का नाम लिया जा सकता है। पिछली जनगणना में 2,26,449 नागरिकों ने अपनी प्रथम भाषा के रूप में अंग्रेज़ी का उल्लेख किया था। 8,60,00,000 नागरिकों ने इसे अपनी द्वितीय भाषा और 3,90,00,000 नागरिकों ने तीसरी भाषा बताया। इन सभी आँकड़ों को जोड़कर यह स्थापित करने का प्रयास किया गया कि देश में हिन्दी के बाद सर्वाधिक बोली जाने वाली या सर्वाधिक ज्ञात भाषा अंग्रेज़ी है। यह कुछ और नहीं, बल्कि भारतीयों की गौरवहीनता का ही परिणाम है, अन्यथा भारत में जो स्थान संस्कृत का है, उसे अंग्रेज़ी कैसे हथिया लेती? संस्कृत विश्व की प्रथम भाषा होने के साथ-साथ मानव-इतिहास की सर्वाधिक समृद्ध भाषा भी है। यह अत्यंत दुःखद है कि शेष विश्व ने पहले ही उसे लुप्तप्राय भाषाओं की श्रेणी में डाल दिया है। परंतु, इससे भी अधिक दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य यह है कि संस्कृत के जन्मस्थान भारत में भी इसे हाशिये पर डालने का प्रयास चल रहा है। जो भाषा हमारी सभी भाषाओं की जननी है, क्या उसकी रक्षा किये बिना हम अपनी मातृभाषा की रक्षा कर सकेंगे? यह संस्कृत की उपेक्षा का ही परिणाम है कि आज सभी भाषाएँ मिश्रित भाषाएँ बन गईं हैं और कुछ लोग निर्लज्जतापूर्वक यह आग्रह करते हैं कि इन भाषाओं को इसी प्रकार उनके अशुद्ध रूप में ही प्रयोग किया जाए। यह केवल एक भूल ही नहीं,वरन् हमारी अपनी भारतीय भाषाओं को नष्ट करने का अपराध है, जिसमें हम सभी जाने-अनजाने सम्मिलित हो रहे हैं। यह हम सभी का कर्तव्य है कि हम संस्कृत को नष्ट होने से बचाने में योगदान दें,ताकि हमारी सभी भारतीय भाषाओं की भी रक्षा की जा सके। अतः यह आवश्यक है कि हम सभी अपनी प्रथम,द्वितीय अथवा तृतीय भाषा के रूप में संस्कृत का उल्लेख अवश्य करें तथा साथ ही अपने दैनिक जीवन में संस्कृत के अधिक-से-अधिक शब्दों का प्रयोग भी करें। यदि हम अपने दैनिक वार्तालाप में अधिक-से-अधिक संस्कृतनिष्ठ शब्दों का प्रयोग करने लगेंगे,तो इससे न केवल संस्कृत का प्रचार-प्रसार होगा,वरन् हमारी अन्य भारतीय भाषाएँ का शुद्ध स्वरूप भी बना रहेगा। संस्कृत सभी भाषाओं की माँ है। जिस प्रकार माता का दूध जीवनदायी होता है,उसी प्रकार संस्कृत का प्रयोग अन्य सभी भारतीय भाषाओं को शक्ति प्रदान करेगा व साथ ही इससे समाज का मन और बुद्धि भी स्वस्थ रहेंगे।

पिछली जनगणना में अपनी मातृभाषा के रूप में संस्कृत का उल्लेख करने वालों की संख्या 14,135 है। अतः सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाओं की सूची में इसका स्थान 118वां है। वहीं दूसरी ओर, 51, 728 नागरिकों ने अपनी मातृभाषा अरबी बताई है। परिणामस्वरूप, सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाओं की सूची में अरबी का स्थान 78वां, अर्थात् संस्कृत से भी ऊपर, है। यह कैसा क्रूर मज़ाक है! क्या भारत में अरबी की संतानें अधिक हैं और संस्कृत के सपूत कम?अतः संस्कृत को जनभाषा बनाने के लिये एक अभियान चलाए जाने की आवश्यकता है और हम सभी को इसमें अवश्य योगदान करना चाहिए।

यह केवल हमारी उदासीनता व अज्ञान का ही परिणाम है कि सहस्त्रों शब्दों के माध्यम से अनेक भाषाओं में प्रयोग की जाने वाली और जाने-अनजाने में लाखों-करोड़ों भारतीयों द्वारा बोली जाने वाली संस्कृत भाषा को आज लुप्त-प्राय कहने का साहस किया जा रहा है। जिस भाषा में विश्व के सर्वश्रेष्ठ साहित्य की रचना हुई, जिस भाषा में वेदों, उपनिषदों व पुराणों का लेखन हुआ, जिस भाषा में सर्वोच्च कोटि के महाकाव्य रचे गए, वह भाषा आज अपने ही देश में उपेक्षित है। यह हम सभी का कर्तव्य है कि हम सभी संस्कृत को पुनर्जीवित करने में अपना योगदान दें,ताकि यह भाषा विश्व-मंच पर अपना गौरव पुनः प्राप्त कर सके। यदि हमने इस कार्य में सहयोग न किया,तो यह एक ऐसा अपराध होगा, जिसके लिये आने वाली पीढ़ियां हमें कभी क्षमा नहीं करेंगी।

अतः आइये, हम सभी मिलकर संस्कृत के प्रसार में अपना योगदान करें तथा 2011 की जनगणना में अपनी प्रथम, द्वितीय अथवा तृतीय भाषा के रूप में अवश्य ही संस्कृत का उल्लेख करें।

-सुमन्त.
(संस्कृत-भारती, नई दिल्ली के श्री श्रीश देवपुजारी के लेख के आधार पर)