Friday, July 9, 2010

कश्मीरी पण्डितों के दर्द को व्यक्त करती एक कविता…

मेरी बेटी की ओढ़नी
तार-तार की गई-
सब खामोश रहे।

मुझे विवश किया गया
अपना घर-द्वार छोड़कर
संस्थापित से विस्थापित बनने के लिये
कोई कुछ नहीं बोला।

मैं अपने परिवार के साथ
न्याय की गुहार लगाते हुए
वर्षों से दिल्ली के फुटपाथ पर हूँ
किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता।
कोई भी मानवाधिकारवादी
कोई भी टीवी चैनल
कोई भी राजनीतिक ध्वजाधारी
मेरे विषय में चर्चा नहीं करता,
मेरा आर्त्तनाद नहीं बनता
किसी भी प्रगतिवादी
साहित्यकार की
कथा का विषय।
मेरी त्रासभरी आँखें नहीं बनतीं
किसी भी जनवादी पत्रिका का मुख-पृष्ठ

मैं अपने प्रान्त से बहिष्कृत
अपने परिवेश से तिरस्कृत

अपने अवांछित अस्तित्व के लिये
हर कदम पे दण्डित हूँ
क्योंकि मैं
एक कश्मीरी पण्डित हूँ।

शायद यह मेरे पूर्व जन्म के पापों का
फलस्वरूप परिताप है
क्योंकि कश्मीर में हिन्दू होना
आज एक विडम्बना है, अभिशाप है!

(पाञ्चजन्य, नई दिल्ली 4 जुलाई 2009 अंक में प्रकाशित श्री शिव ओम अम्बर की कविता)