Friday, November 5, 2010

दीपावली, आर्य चाणक्य और वर्तमान राजनेता

मित्रों, आप सभी को प्रकाश-पर्व दीपावली पर हार्दिक शुभकामनाएँ! दीपावली का उल्लेख हो और दीपों की बात न हो, ये संभव नहीं है। अमावस की रात में आने वाली दीपावली को ये छोटे-छोटे दीप ही रोशन करते हैं और हमें प्रेरणा देते हैं कि जिस तरह एक छोटा-सा दीपक अँधेरे को दूर कर देता है, उसी तरह हमारा एक छोटा प्रयास भी एक दिन कोई बड़ा परिवर्तन ला सकता है। बस! मन में उत्साह और अपने संकल्प की पूर्ति के लिये लगन होनी चाहिये।
ऐसी ही लगन आर्य चाणक्य के मन में थी और उन्होंने अपनी लगन से उसे पूरा करके दिखाया। अपने अदम्य उत्साह के बल पर उस एक अकेले व्यक्ति ने कितने सारे महान कार्य पूरे कर दिये। सिकंदर जैसे आक्रमणकारी को अपनी विशाल सेना के होते हुए भी सैनिकों सहित भारत से बाहर खदेड़ दिया। एक छोटे-से बालक को अपने योग्य-मार्गदर्शन में सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया। राजा धनानन्द की मज़बूत सत्ता को उखाड़कर सभी छोटे-बड़े राजाओं को मौर्य साम्राज्य के अधीन ले आए और पूरे भारत को फिर एक बार उसी तरह अखण्ड बना दिया, जैसा वह श्रीराम और श्रीकृष्ण के काल में था।

चाणक्य केवल एक विद्वान ब्राह्मण और अर्थशास्त्री ही नहीं, वरन् एक देशभक्त राजनीतिज्ञ भी थे। दीपावली के इस अवसर पर दीपों की बात निकली, तो मुझे चाणक्य के जीवन का एक प्रसंग आ रहा है। यूनान का एक दूत मौर्य साम्राज्य के मार्गदर्शक आर्य चाणक्य से मिलने के लिये गया। इतने बड़े साम्राज्य के निर्माता चाणक्य पाटलिपुत्र में गंगा के किनारे एक छोटी-सी कुटिय में निवास करते थे। रात का समय था। दूत ने देखा कि एक छोटा-सा दीप जल रहा है और उसके प्रकाश में कौटिल्य अपने लेखन में व्यस्त हैं। इस दूत के आने पर उन्होंने उसका स्वागत किया और जलता हुआ वह दीप बुझाकर एक दूसरा दीप जला दिया। दोनों में बात-चीत होने लगे। दूत ने कारण पूछा कि आखिर आपने पहला दीप बुझाकर दूसरा क्यों जलाया है? तब चाणक्य ने उत्तर दिया कि वह जो दीप है, वह मुझे शासकीय कार्य के लिये शासन की ओर से मिला है। उसका उपयोग मैं अपने व्यक्तिगत कार्यों के लिये कैसे कर सकता हूँ? ये जो दूसरा दीप है, ये मेरा है। जब आप आए, तो मैं शासकीय कार्य कर रहा था। इसलिये पहला वाला दीप जल रहा था। लेकिन आपसे जो मेरा वार्तालाप चल रहा है, ये मेरा निजी कार्य है। इसलिये मैंने पहला वाला दीप बुझाकर दूसरा वाला जला दिया!

कथा भले ही छोटी-सी हो, लेकिन इसका मर्म बहुत गहरा है। हम हमेशा महापुरुषों की ऐसी अनेक कथाएँ और प्रसंग सुनते हैं, लेकिन जब हमारे सामने कोई ऐसा अवसर आता है, तो क्या हम स्वयं ऐसा व्यवहार करते हैं? हम इस बात पर गर्व करते हैं कि अतीत में भारत विश्व का सबसे शक्तिशाली, वैभव-संपन्न और समृद्ध राष्ट्र था, लेकिन क्या हम इस बात पर विचार करते हैं कि वर्तमान भारत इस दुःस्थिति में क्यों है? हम इस बात के लिये केवल विदेशी हमलावरों को दोष देकर अपने कर्तव्य से मुँह नहीं मोड़ सकते। विदेशी आक्रमणों की एक हजार वर्षों की श्रृँखला 1947 में टूट गई। लेकिन हमारे कुछ अदूरदर्शी और स्वार्थी राजनेताओं और शासकों की कृपा से देश आज भी असुरक्षित बना हुआ है। हम लगातार आंतरिक और बाह्य आक्रमणों से जूझ रहे हैं। क्या हमारे राजनेता आर्य चाणक्य से कोई सीख लेंगे?

आर्य चाणक्य जैसे महापुरुषों के जीवन का अध्ययन करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि अतीत में भारत विश्व-गुरु क्यों कहलाता था। अपने निजी कार्य के लिये शासकीय धन की एक पाई का भी प्रयोग न करने वाले उस महात्मा और शासकीय धन को अपने घर की संपत्ति समझने वाले वर्तमान राजनेताओं के बीच कोई तुलना भी नहीं की जा सकती। इनमें ज़मीन-आसमान का अंतर है और यही कारण है कि तत्कालीन बिश्व-गुरु भारत और वर्तमान संकट-ग्रस्त भारत में भी इतना अंतर है।

यदि हमें भारत को पुनः विश्व-गुरु बनाना है, तो फिर एक बार उसी मार्ग को अपनाना पड़ेगा, जो श्रीराम, श्रीकृष्ण और आर्य चाणक्य ने हमें दिखाया है। हम अमरीका, चीन, यूरोप, रूस या किसी भी अन्य देश की नकल करके कभी आगे बढ़ सकते। जब तक हम नकल करते रहेंगे, तब तक हमेशा किसी न किसी से पीछे ही रहेंगे। यदि हम भारत को इसका खोया हुआ वैभव और स्थान पुनः दिलाना चाहते हैं, तो इसके लिये दो बातों को अपनाना अनिवार्य है- निःस्वार्थ देशभक्ति और अपने कर्तव्य का ईमानदारी से पालन। ये दो ऐसे तत्व हैं, जिन्हें आप, मैं और देश का हर सामान्य नागरिक भी सहजता से अपना सकता है। हमें याद रखना चाहिये कि परिवर्तन तभी हो सकता है, जब समाज जागृत हो और समाज जागृत तभी होगा जब इसका प्रत्येक सदस्य अपने कर्तव्य का ईमानदारी और निष्ठा से पालन करे।

आइये, इस दीपावली पर एक दीप अपने राष्ट्र के नाम जलाएँ और ये संकल्प लें कि हम राष्ट्र-निर्माण में हरसंभव अपना योगदान देंगे। हर परिवर्तन अब हमें ही करना है क्योंकि राजनेताओं और राजनीति से तो अब कोई आशा करना भी शायद व्यर्थ है…शुभ दीपावली!!

2 comments:

  1. भाई! किसी भटक गये देश को उसका अतीत उसका इतिहास,मार्गदर्शन देता है...लेकिन मार्गदर्शक ही भ्रष्ट हो तो, कैसा मार्ग और कैसा दर्शन।हमको समझना होगा कि हमारा नेतृत्व, जिसे हम चुन रहे हैं वो योग्य, ईमानदार और दूरदृष्टा हो। उसमे बलिदान की तीव्र इच्छा हो...अन्यथा नाती-पोते तो रावण के भी थे...वे भी नहीं बचे...।

    ReplyDelete
    Replies
    1. आपकी टिप्पणी के लिए धन्यवाद! मैं आपकी बात से सहमत हूँ.

      Delete