Tuesday, March 15, 2011

जापान की प्राकृतिक आपदा में निहित संदेश…

हाल ही में, जापान में भूकंप और सुनामी के बाद जो हुआ, क्या वह हमारे लिये एक चेतावनी नहीं है? स्वयं को आधुनिक कहने वाली वर्तमान सभ्यता का हमेशा से ये विचार रहा है कि मनुष्य प्रकृति का स्वामी है। पश्चिमी विचारधारा ने प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर चलने के बजाय प्रकृति को जीतने का प्रयास किया और हमेशा इसमें विफलता पाई। मनुष्य चाहे स्वयं को कितना ही शक्तिशाली समझ ले, परंतु ऐसी प्राकृतिक आपदाओं के द्वारा हर बार ये साबित हो जाता है कि प्रकृति के शक्ति के सामने मनुष्य की शक्ति नगण्य है।

हम स्वयं को किस आधार पर इतना उन्नत और शक्तिशाली मानते हैं? प्रकृति का कुछ मिनट का तांडव हमारे सारे घमण्ड को हर बार चूर-चूर कर देता है। हमारा मौसम विभाग अक्सर मौसम का सही पूर्वानुमान लगा पाने में विफल रहता है। हर साल सर्दियों में कोहरा छा जाने पर हमारी यातायात व्यवस्था, रेलगाड़ियाँ, हवाई जहाज़ सब रूक जाते हैं। कुछ महीनों पहले बर्फ पड़ी तो आधा यूरोप कई दिनों तक ठप पड़ा रहा। अभी कल-परसों जापान में और कुछ वर्षों पूर्व इंडोनेशिया से लेकर भारत तक सुनामी ने जो कहर बरपाया, उसकी तो याद भी हमें सिहराने को काफी है।