Friday, August 19, 2011

सिविल सोसाइटी से कुछ सवाल …

“जनलोकपाल बिल को पारित करने की माँग को लेकर अण्णा हज़ारे के नेतृत्व में चल रहे “सिविल सोसाइटी” के आंदोलन की इन दिनों पूरे देश में चर्चा है। क्रिकेट, क्राइम और कॉमेडी की ख़बरों के प्रसारण में व्यस्त रहने वाले तमाम मीडिया चैनल भी अब 24 घंटे केवल इसी आंदोलन को कवर करने में लगे हुए हैं। उन्हें अब न तो क्रिकेट में भारत की जीत-हार की चिंता है, न राखी सावंत के डान्स की और न बिहार या बंगाल में बाढ़ की वीभिषिका की। अब न तो किसी हत्या, बलात्कार या लूटपाट की कोई खबर आ रही है और न ही किसी कॉमेडी सर्कस की। ऐसा लग रहा है, मानो देश सारे अपराधों और सारी समस्याओं से मुक्त हो चुका है और केवल भ्रष्टाचार को ही मिटाना बाकी रह गया है।
ये सही है कि भ्रष्टाचार इस देश की एक विकराल समस्या है और इसे दूर किया जाना बहुत आवश्यक है। लेकिन जनलोकपाल बिल के आ जाने से यह काम हो जाएगा, इसमें मुझे संदेह है। मेरे मन में प्रश्न ये है कि आखिर जनलोकपाल की नियुक्ति हो जाने से वह भ्रष्टाचार कैसे मिटेगा, ज़िसका सामना देश के आम नागरिकों को हर दिन, हर मोड़ पर करना पड़ता है? किसी ट्रैफिक सिग्नल पर खड़े पुलिसकर्मी द्वारा की जाने वाली वसूली किसी रेलगाड़ी में एक सीट/बर्थ दिलाने के बदले टीसी द्वारा ली जाने वाली रिश्वत या किसी सरकारी कार्यालय में शासकीय कर्मचारियों द्वारा आम आदमी से ली जाने वाली घूस जनलोकपाल के आने से कैसे बंद हो जाएगी? दूसरी बात ये कि जिस व्यक्ति को जनलोकपाल बनाया जाएगा, यदि वह स्वयं ही भ्रष्ट हो गया, तब क्या होगा?
सिविल सोसाइटी इस बात की माँग पर भी अड़ी हुई है कि जनलोकपाल के दायरे में प्रधानमंत्री व न्यायपालिका को भी लाया जाए। इससे बार-बार ये संदेह उत्पन्न होता है कि कहीं जनलोकपाल की आड़ में कोई ऐसी समिति बनाने की साजिश तो नहीं है, जो इस देश की संसद और न्यायपालिका पर भी नियंत्रण रख सके। यदि ऐसा होता है, तो ये लोकतंत्र के लिए बहुत घातक होगा। लोकपाल की चयन-समिति के सदस्यों में मैग्सेसे पुरस्कार विजेताओं को शामिल किए जाने का प्रावधान है। केजरीवाल व किरण बेदी स्वयं मैग्सेसे पुरस्कार विजेता हैं। इसी तरह ऐसे कानू्नविदों को भी शामिल किए जाने का प्रावधान हैं, जिनके पास उच्च व उच्चतम न्यायालयों में कार्य का अनुभव हो। इस तरह भूषण पिता-पुत्रों के लिए भी इसमें स्थान बना दिया गया है। इसमें भारतीय मूल के नोबेल पुरस्कार विजेताओं को रखा जाना भी प्रस्तावित है। इसका अर्थ यह हुआ कि भारतीय मूल के जो नोबेल विजेता भारत के नागरिक नहीं भी हैं, वे भी इस समिति में शामिल हो सकेंगे। तो क्या हम अपने देश का नियंत्रण ऐसे लोगों के हाथों में, जो भारत के नागरिक भी नहीं हैं, सौंपकर फिर से गुलाम होना चाहते हैं?
सिविल सोसाइटी में “स्वामी” अग्निवेश जैसे लोग शामिल हैं, जो नक्सलियों, आतंकियों और कश्मीरी अलगाववादियों का समर्थन करने के लिए कुख्यात हैं। इसमें भूषण पिता-पुत्र हैं, जिन पर भ्रष्टाचार में लिप्त होने के आरोप हैं।
एक और बड़ा सवाल ये है कि इतने बड़े आंदोलन को प्रायोजित कौन कर रहा है? अण्णा के पास तो कोई धन-संपत्ति नहीं है। लेकिन इतने बड़े आंदोलन के प्रचार, प्रबंधन और व्यवस्थापन का खर्च आखिर कौन उठा रहा है? क्या ये सही है कि केजरीवाल और किरण बेदी के गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) को अमेरिका के फोर्ड फाउंडेशन जैसे संस्थानों से लाखों डॉलर का चंदा मिला है? अगर ये सच है तो बात बहुत खतरनाक है क्योंकि ये जानना जरूरी है कि आखिर इन अमेरिकी संस्थानों की रूचि इसमें क्यों है? कहीं ये भारत पर नियंत्रण हासिल करने की अमेरिकी नीति का हिस्सा तो नहीं है? अगर ये झूठ है, तो ये पता चलना चाहिए कि आखिर इस आंदोलन की फंडिंग कौन कर रहा है।
अंतिम बात ये कहना चाहता हूँ कि भारत के संविधान के अनुसार कोई भी कानून बनाने का अधिकार सिर्फ और सिर्फ संसद का है। इस तरह किसी आंदोलन और आमरण अनशन के द्वारा संसद पर दबाव डालकर मनचाहा कानून बनवाने की जिद न सिर्फ लोकतंत्र के लिए बल्कि इस देश की पूरी व्यवस्था और सुरक्षा के लिए भी खतरनाक संकेत है। ऐसी बातों का समर्थन नहीं किया जाना चाहिए।”