Tuesday, December 25, 2012

आईटी एक्ट 2008 में किए गए नए संशोधन

कुछ माह पूर्व आउटलुक पत्रिका में प्रकाशित एक लेख के अनुसार 11 अप्रैल 2011 को भारत सरकार के सूचना एवं प्रौद्योगिकी विभाग ने सूचना प्रौद्योगिकी (संशोधित) कानून-2008 के अनुच्छेद 79 में कुछ कठोर नियम जोड़ दिए हैं, जिसके बाद सरकार इंटरनेट पर किसी भी ब्लॉग, वेबसाइट, फेसबुक व ट्विटर जैसी सोशल नेटवर्किंग साइटों व किसी भी व्यक्ति के ई-मेल व चैट संवादों की निगरानी कर सकती है व आपत्तिजनक प्रतीत होने पर किसी भी ब्लॉग या साइट को ब्लॉक कर सकती है। इस संशोधन की कुछ मुख्य बातें निम्नलिखित हैं:

1. नियम 43 ए व नियम 79 के अनुसार सरकार किसी भी इंटरमीडियरी (इंटरनेट सेवाएं देने वाली कोई कंपनी, जैसे गूगल) से किसी भी व्यक्ति का इलेक्ट्रॉनिक डेटा हासिल कर सकती है। इसके लिए सरकार को किसी से अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं होगी।

2. आईटी ऐक्ट के अनुच्छेद 2(डब्ल्यू) के अनुसार इंटरमीडियरी का अर्थ है, कोई भी ऐसा व्यक्ति/कंपनी जो किसी अन्य के लिए किसी तरह का कोई रिकॉर्ड एकत्र करता है, भेजता है या उस इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड से संबंधित कोई भी सेवा देता है। इनमें इंटरनेट व वेब-होस्टिंग सेवा प्रदाता, सर्च इंजन, ऑनलाइन ऑक्शन साइट्स, ऑनलाइन पेमेंट साइट्स, ऑनलाइन मार्केटप्लेस व साइबर कैफे शामिल हैं।

3. इस संशोधन के बाद अब सरकार इंटरनेट पर होने वाली आपकी बातें सुन सकती है, ईमेल पढ़ सकती है, चैट रिकॉर्ड देख सकती है और इनमें से किसी को भी आधार बनाकर आपके विरूद्ध कार्यवाही कर सकती है।

4. ये नियम इंटरनेट पर समस्त वेबसाइट होस्ट, ब्लॉग, सर्च-इंजन, सोशल नेटवर्किंग साइट्स, मीडिया साइट्स आदि सभी पर लागू होंगे और सरकार केवल एक पत्र भेजकर इंटरमीडियरी से कोई भी जानकारी हासिल कर सकती है।

5. यदि इंटरनेट पर लिखे गए किसी भी लेख, टिप्पणी या समाचार पर सरकार को आपत्ति हो, तो इंटरमीडियरी को 36 घंटों के भीतर उसे हटाना होगा। ऐसा न किए जाने पर सरकार कोई भी नोटिस दिए बिना उसके खिलाफ कार्रवाई कर सकती है। इसके परिणामस्वरूप 3 साल से लेकर उम्रकैद, 1 लाख से 10 लाख तक जुर्माना और आईटी एक्ट-2008 के अनुसार 5 करोड़ तक हर्जाना भरना पड़ सकता है।

देश के अनेक साइबर विशेषज्ञों की राय है कि ये संशोधन देश के नागरिकों को प्राप्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को अप्रत्यक्ष रूप से समाप्त करते हैं। विडंबना ये है कि भारत में इंटरनेट का नियमित प्रयोग करने वाले लगभग 10 करोड़ लोगों को अभी तक ये मालूम ही नहीं है कि इंटरनेट पर उनकी निजता और विचारों को व्यक्त करने की स्वतंत्रता पर कितने कठोर बंधन लादे जा चुके हैं और उन्हें फेसबुक या ट्विटर जैसी किसी साइट पर सरकार के खिलाफ कोई टिप्पणी करने के कितने घातक परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं।

Wednesday, November 14, 2012

'हम ऋषियों की परंपरा के वाहक हैं': पं. जवाहरलाल नेहरु

पं. जवाहरलाल नेहरु
आज १४ नवंबर नेहरुजी की जयंती है. आज जयंती पर उन्हें याद करने वालों को उनके एक भाषण की कुछ पंक्तियाँ भी अवश्य याद करनी चाहिए. सन १९४८ में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के दीक्षांत समारोह में छात्रों को संबोधित करते हुए नेहरु जी ने कहा था:
"मुझे अपनी विरासत और अपने उन पूर्वजों पर गर्व है, जिन्होंने भारत को एक बौद्धिक व सांस्कृतिक सर्वश्रेष्ठता प्रदान की. आप इस अतीत के बारे में कैसा महसूस करते हैं? मेरी तरह ही आप भी स्वयं को इसमें साझेदार महसूस करते हैं या नहीं? मेरी तरह ही आप भी इस विरासत को स्वीकार करते और इस पर गर्व करते हैं या नहीं? या आप स्वयं को इससे अलग मानते हैं और आप इस विरासत को समझे बिना ही इसे अगली पीढ़ी को सौंप देंगे? क्या आप यह सोचकर रोमांचित नहीं होते कि हम इस विशाल संपदा के न्यासी हैं?
मैं आपसे ये प्रश्न पूछ रहा हूँ क्योंकि हाल के वर्षों में अनेक शक्तियां लोगों का मन गलत रास्तों की ओर मोड़ने और इतिहास की धारा को विकृत करने के प्रयास में लगी हुई हैं. आप मुसलमान हैं और मैं एक हिंदू हूं. हम भिन्न-भिन्न धार्मिक आस्थाओं का पालन कर सकते हैं या हम नास्तिक भी हो सकते हैं; लेकिन इसके कारण हम उस सांस्कृतिक विरासत से दूर नहीं जा सकते, जो उतनी ही आपकी भी है, जितनी मेरी है. जबकि हमारा अतीत हमें एक साथ जोड़ता है, तो हम अपने वर्तमान या भविष्य को हमें विभाजित करने की अनुमति क्यों दें?"
अतः चाहे हमारे ईष्ट-देव कहीं भी हों, लेकिन भारत में हम ऋषियों की परंपरा के ही वाहक हैं. हमारी धार्मिक आस्था चाहे कोई भी हो, लेकिन हम सभी आध्यात्मिकता की उनकी परंपरा के उत्तराधिकारी हैं. आध्यात्मिकता का अर्थ क्या है? यह रिवाजों और सिद्धांतों का जमघट या पारलौकिकता नहीं है, बल्कि यह एकता के दृष्टिकोण पर, शाश्वत सिद्धांतों पर आधारित एक जीवन पद्धति है. अपनी शक्ति को संगठित करने के लिए हमें इन शाश्वत सिद्धांतों को जानना होगा, जो हमारी भिन्न धार्मिक आस्थाओं के बावजूद हम सभी को संगठित कर सकते हैं."

सेक्युलरिज्म के नाम पर हिंदुत्व का विरोध करने वालों और भारत की प्राचीन गौरवशाली परंपरा को सतत अपमानित करने वालों को नेहरु जी के इस भाषण से अवश्य प्रेरणा लेनी चाहिए. चाहे कोई भी स्वार्थ हो, कोई भी मजबूरी हो, लेकिन जो सत्य है, उसे बदला नहीं जा सकता और सत्य यही है कि  हम सब भारत के महान ऋषियों की परंपरा के ही वाहक हैं. हमारा धर्म या पूजा-पद्धति भले ही भिन्न हो, किंतु भारत के प्रति हमारे प्रेम और सम्मान में कोई भिन्नता नहीं होनी चाहिए. हमें अपनी परंपरा पर गर्व करना चाहिए और अपना इतिहास याद रखना चाहिए क्योंकि उज्ज्वल भविष्य की इमारत इतिहास की नींव पर ही खड़ी होती है. जो इतिहास को भुला देते हैं, वे कभी अपने भविष्य का निर्माण नहीं कर सकते. 

आशा है कि नेहरु जी का गुणगान करने वाले और उनके अनुयायी होने का दावा करने वाले लोग उनके इन विचारों का भी पालन करेंगे. संभवतः यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी.

Tuesday, November 13, 2012

कुछ मीठा हो जाए!

(http://www.stow.ac.uk/media/diwali.gif)
बधाई! दीपावली आ गई है, मेरे सारे शुभचिंतक न्यूज़ चैनल ये बताने में भिड़े हुए हैं कि दूध, खोवा, मिठाइयां सब मिलावटी हैं, सेहत के लिए हानिकारक हैं. ये मिलावट शायद सिर्फ़ इन्हीं दिनों में होती है, इसीलिए तो ये "ईमानदार और विश्वसनीय" चैनल ऐसी खबरें सिर्फ़ दीवाली से पहले ही दिखाते हैं.

जब ये चैनल बार-बार "कुछ मीठा हो जाए" बताते हैं, लेकिन कभी ये नहीं दिखाते कि वह "मीठी" चॉकलेट किन स्वास्थ्यवर्धक और शुद्ध पदार्थों से बनती है, तो मुझे मीठे ज़हर की याद आती है.

इन्होने मुझे ठंडा मतलब कोका-कोला तो सिखाया है, लेकिन कोक या पेप्सी में मुझे "ठंडा" करने के लिए क्या-क्या मिलाया हुआ है, ये कब बताएंगे?

मैंने तो ये भी सुना है कि सारा प्रदूषण दीपावली के पटाखों से ही होता है. शायद 31 दिसंबर की रात को दुनिया भर में होने वाली आतिशबाज़ी, बिना शोर और प्रदूषण वाली होती है, शायद रोज़ सडक पर रेंगने वाली लाखों गाड़ियाँ बिना धुंए के चलती हैं, शायद उनके हौर्न भी साइलेंट होते हैं, शायद रोज़ नदियों में छोड़ा जाने वाला गन्दा पानी प्रदूषण नहीं फैलाता.

जल की बर्बादी भी सिर्फ़ होली में ही होती है. रेन-डांस वाली पार्टियों में तो शायद सूखा-पानी उड़ाया जाता है.

चलिए ये सब छोड़िये, आइये कुछ मीठा हो जाए! "तो इस दीवाली पर आप किसे खुश करेंगे??"
शुभ दीपावली!

Sunday, November 4, 2012

स्कॉटलैंड में है पटना!

Patna, Bihar, India
पटना, बिहार (भारत)
यदि कोई आपसे पूछे कि “पटना” कहाँ है, तो संभवतः आपका जवाब होगा-“बिहार / भारत”. लेकिन यदि मैं कहूं कि पटना “स्कॉटलैंड” में है, तो क्या आप मानेंगे? आप शायद न मानें, लेकिन ये सच है. जी हाँ! भारत की ही तरह दूर यूरोप के स्कॉटलैंड में भी एक पटना है और नाम की यह समानता केवल एक संयोग नहीं बल्कि उस पटना का संबंध सचमुच बिहार के पटना शहर से है.

सन 1745 में स्कॉटलैंड के एक व्यवसायी विलियम फुलर्टन ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ बिहार आए थे, (उन दिनों यह बंगाल का ही एक भाग था). फुलर्टन यहां से ब्रिटेन को चावल भेजा करते थे. बाद में उनके भाई जॉन फुलर्टन भी वहां आ गए, जो ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में मेजर जनरल थे और पटना में तैनात थे. यहीं 1774 में उनके बेटे का जन्म हुआ और उसका नाम भी विलियम फुलर्टन ही रखा गया.

Patna, Scotland
पटना, स्कॉटलैंड
जॉन फुलर्टन ने भारत में अंतिम साँसें लीं. इसके बाद फुलर्टन परिवार स्कॉटलैंट लौट गया. तब तक यह परिवार संपन्न और जमींदार परिवार बन चुका था. विलियम फुलर्टन तब तक खदानों के कारोबार शुरू कर चुके थे. अपनी खदानों में काम करने वाले मज़दूरों के रहने के लिए उन्होंने सन 1802 में स्कॉटलैंड के ईस्ट एर्शायर (East Ayrshire) में एक बस्ती बसाई और भारत के पटना शहर के नाम पर उन्होंने इसे भी “पटना” नाम दिया.

Doon River
दून नदी
स्कॉटलैंड के सबसे बड़े शहर ग्लासगो के पास बसे पटना की दूरी लंदन ने 650 किमी है और अपने बिहार की राजधानी पटना से यह लगभग 10,000 किमी की दूरी पर है. इस गाँव की जनसंख्या लगभग 3500 है. गाँव में एक प्राथमिक स्कूल (सेंट ज़ेवियर्स प्राइमरी स्कूल), एक पुस्तकालय, एक शल्य-चिकित्सक, एक फुटबॉल मैदान, एक पेट्रोल पंप, एक गोल्फ़ क्लब और छोटा-सा बाज़ार है. यह गांव “दून” नामक नदी के किनारे बसा हुआ है, जो मछलियों के शिकार के लिए प्रसिद्ध है.

अब अगली बार जब कहीं पटना का ज़िक्र आए, तो आप पटना स्कॉटलैंड में होने की बात कहकर सामने वाले व्यक्ति को चौंका सकते हैं! :)

(स्रोत: 1. http://en.wikipedia.org/wiki/Patna,_East_Ayrshire
2. http://en.wikipedia.org/wiki/East_Ayrshire
3. http://en.wikipedia.org/wiki/William_Fullarton
4. http://en.wikipedia.org/wiki/River_Don,_Aberdeenshire
5. Lokmat Samachar, Pune (4 November 2012))

Wednesday, October 10, 2012

आपकी कला देश से बड़ी कैसे?

सीमा-पार पड़ोसी देशों से भारत में होने वाली घुसपैठ पिछले कुछ वर्षों से कला के क्षेत्र में भी हो रही है. कभी कोई गायक, कोई संगीतकार, कोई स्टैंड-अप कॉमेडियन, कोई अभिनेत्री और कभी क्रिकेटर इस देश में आ रहे हैं. भले ही पाकिस्तान में भारतीय गायकों-कलाकारों और चैनलों पर रोक लगी हो, लेकिन भारत में पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे शत्रु-देशों से आने वाले कलाकारों का समर्थन करने वालों की कमी नहीं है. इनके समर्थक भारतीय कलाकार अक्सर ये तर्क देते हैं कि "कला की कोई सीमा नहीं होती" या "हम सिर्फ कलाकार हैं, हमें राजनीति से कोई सरोकार नहीं है".

लेकिन आश्चर्य होता है कि चुनावों के समय यही "कलाकार", "जिन्हें सिर्फ कला से मतलब है, राजनीति से कोई लेना-देना नहीं है", राजनैतिक दलों के उम्मीदवारों के लिए प्रचार करते और चुनावी सभाओं में भीड़ जुटाते दिखाई देते हैं और फिर भी राजनीति से दूर होने का दावा करते हैं. आश्चर्य होता है कि यही "कलाकार" राजनैतिक दलों के टिकट पर चुनाव लड़ते हैं और फिर भी राजनीति से दूर होने का दावा करते हैं. आश्चर्य होता है कि यही "कलाकार" राजनेताओं के लिए चुनावी भाषण लिखते हैं या उनके खिलाफ चल रहे किसी आन्दोलन के मंच पर भी दिखाई देते हैं और फिर भी राजनीति से दूर होने का दावा करते हैं. ये कैसा दोहरा मापदंड है कि आप अपने लाभ और सुविधा के अनुसार कभी राजनेताओं के पास और कभी उनसे दूर खड़े दिखाई देंगे? आप राजनीति से, राजनैतिक दलों से और आम-जनों से प्रशंसा, मान-सम्मान और धन तो लेंगे, लेकिन आलोचना से बचने के लिए अपनी कला को अपनी ढाल बनाएंगे!! ये कैसे स्वीकार किया जाए?

इस बात से मैं भी सहमत हूँ कि विभिन्न देशों के लोगों के बीच कला, संस्कृति, साहित्य, खेल आदि के माध्यम से संवाद व संपर्क विकसित हों और विचारों का आदान-प्रदान हो. लेकिन ये सब किन देशों के साथ करना है और किस सीमा तक करना है, क्या इस पर विचार नहीं होना चाहिए? खेल दोस्तों के बीच खेला जाता है, दुश्मनों से सिर्फ युद्ध किया जाना चाहिए. एक ओर पाकिस्तान और बांग्लादेश लगातार हम पर प्रत्यक्ष और परोक्ष आक्रमण कर रहे हैं और दूसरी ओर हमारे ही देश के कलाकार और खिलाड़ी उन देशों के साथ एक मंच पर दिखाई दे रहे हैं. एक ओर आप पाकिस्तानी आतंकवाद के विरोध में मोमबत्तियां जलाकर रैली निकालेंगे, कसाब की फांसी की मांग करेंगे और दूसरी ओर उसी पाकिस्तान के साथ दोस्ती के गीत गाएंगे, ये कैसे हो सकता है?

मैं न कला का विरोधी और न कलाकारों का. मैं भी इस बात से सहमत हूँ कि कला को देश की सीमाओं में नहीं बांधा जाना चाहिए. लेकिन क्या इसका अर्थ ये है कि कलाकार का तमगा लगाकर कोई भी, कहीं से भी इस देश में आ जाए और हम उसकी जय-जयकार करने लगें! क्या ऐसे लोगों का समर्थन करने वालों को भी अपनी सीमा का ध्यान नहीं रखना चाहिए? आप चाहे कितने ही महान कलाकार, गायक, अभिनेता या खिलाड़ी क्यों न हों, लेकिन आप अपनी मातृभूमि से बड़े कैसे हो सकते हैं? आप उस राष्ट्र से बड़े कैसे हो सकते हैं, जिसने आपका पालन-पोषण किया और जिससे आपको यश, सम्मान और धन मिला? क्या उसके प्रति आपका कोई कर्तव्य नहीं?

भारत में कलाओं और कलाकारों की कभी कमी नहीं रही. लेकिन ऐसे अनेक श्रेष्ठ कलाकार हुए हैं, जिन्होंने हमेशा अपने देश को अपनी कला से अधिक महत्व दिया.चाहे वीर सावरकर हों, बंकिमचन्द्र चटर्जी हों, रामप्रसाद बिस्मिल हों, अशफाक़उल्ला खां हों या आधुनिक युग में अटलबिहारी वाजपेयी जैसे लेखक और कवी हों. इन्होंने अपनी कला के बजाय अपने देश की स्वतंत्रता और सम्मान को अधिक महत्व दिया.यह न तो संभव है, न आवश्यक है और न ही अपेक्षित है कि हर गायक, कलाकार या खिलाड़ी अपना सर्वस्व त्यागकर समाजसेवा में लग जाए, लेकिन कम से कम इतना तो करें कि शत्रु-देशों के साथ किसी भी तरह के संबंध न रखें, उनके साथ एक मंच पर न आएं. पाकिस्तानी आतंकवादी और बांग्लादेशी घुसपैठिये लगातार भारत पर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से आक्रमण करये आ रहे हैं और हमारे सैनिक हर मोर्चे पर उनसे लड़ रहे हैं. यदि हमारे देश के कलाकार पाकिस्तानियों और बांग्लादेशियों के साथ मंच साझा करने के बजाय सीमा पर लड़ रहे सैनिकों का हौसला बढ़ाने में सहायता करें तो क्या ये ज़्यादा बेहतर नहीं होगा?आप भले ही "राजनीति से दूर" रहते हों, लेकिन कम से कम अपने राष्ट्र से और राष्ट्रभक्ति से दूर मत जाइए!

Saturday, September 8, 2012

राष्ट्रीय सुरक्षा और चीन की चुनौती: भावी खतरे का स्पष्ट संकेत


 पिछले कुछ वर्षों में भारत की सीमाओं पर लगातार बढ़ते तनाव से उत्पन्न सुरक्षा चुनौतियां उस खतरे का स्पष्ट संकेत हैं, जिसका सामना निकट भविष्य में भारत को करना पड़ेगा। देश के भीतर लगातार बढ़ रही हिंसा की घटनाएं भी इसी का प्रतिफल हैं। देश में जगह-जगह हो रहे बम-विस्फोटों, आतंकी हमलों, सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं, नक्सलवाद, आतंकवाद, पड़ोसी देशों से हो रही घुसपैठ आदि को अलग-अलग नहीं देखा जाना चाहिए। ये सभी कहीं-न-कहीं एक दूसरे से जुड़े हुए हैं और भारत के सबसे बड़े व खतरनाक पड़ोसी चीन द्वारा भारत को अस्थिर बनाए रखने के प्रयास ही इन सभी समस्याओं का मूल है।

चीन न केवल भारतीय सीमा पर लगातार सैन्य-दबाव बना रहा है, बल्कि भारत की सीमा का बार-बार अतिक्रमण करते हुए सैन्य व असैन्य संपत्ति को क्षति पहुँचा रहा है और सीमावर्ती क्षेत्रों के नागरिकों को आतंकित कर रहा है। भारत का यह सबसे बड़ा व सबसे खतरनाक पड़ोसी चारों ओर से भारत को घेरने के सुनियोजित प्रयास कर रहा है। भारत के अन्य पड़ोसी देशों में चीन की सैन्य-उपस्थिति, वहां उसके द्वारा सैनिक-अड्डों का विकास और उन देशों के साथ चीन के लगातार बढ़ रहे रणनीतिक संबंधों को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। भारत के विरुद्ध पाकिस्तान का सशस्त्रीकरण, पाक-अधिकृत कश्मीर में चल रहे भारत-विरोधी आतंकी कैंपों को संरक्षण व इस क्षेत्र में चीन की सैन्य-सक्रियता, माओवाद के माध्यम से नेपाल में शासन का सूत्रधार बनने का प्रयास तथा बांग्लादेश, म्यांमार व श्रीलंका में चीनी सैन्य विशेषज्ञों की उपस्थिति भारत पर हो रही इस चीनी घेराबंदी के कुछ स्पष्ट उदाहरण हैं।

इसके अलावा सीमा पार से देश में आतंकवाद को बढ़ावा देने, पूर्वोत्तर के उग्रवादी गुटों को सक्रिय सहयोग प्रदान करने एवं देश के भीतर नक्सलवाद को प्रोत्साहित करके भारत में आंतरिक विद्रोह व अशांति फैलाने के चीनी प्रयत्न भारत की एकता व अखंडता को सीधी चुनौती हैं। इसके अलावा अपने साइबर-योद्धाओं (हैकर्स) के माध्यम से लगातार देश के सूचना व संचार तंत्र में सेंध लगाने की घटनाएं एवं भारत के विभिन्न संवेदनशील स्थानों के आस-पास विकसित होने वाली परियोजनाओं के लिए अत्यंत कम मूल्य पर निविदाओं के माध्यम से हो रहा चीनी गुप्तचर तंत्र का प्रवेश भी भारत की सुरक्षा के लिए एक गंभीर संकट है।

Friday, June 1, 2012

मजबूत संगठन निर्माण के लिए एकजुट हो कमर कस मैदान में उतरें

 (भाजपा के मुख-पत्र "कमल संदेश" के 1-15 जून 2012 अंक में श्री प्रभात झा का विशेष संपादकीय लेख)

पिछले दिनों भाजपा शासित राज्य कर्नाटक, गुजरात एवं राजस्थान भाजपा में जो कुछ हुआ उससे आम नागरिकों को काफी तकलीफ हुई। तकलीफ उनको भी हुई जो भाजपा के कार्यकर्ताहैं और समर्थक। घटना अच्छी होती तो तकलीफ नहीं होती। घटना दुःखद और भाजपा की प्रकृति के विरुद्ध होने के कारण सभी को तकलीफ हुई। खुश वे भी नहीं हुए होंगे, जिनके कारण देश और दल दुःखी हुआ। मूल में भाजपा की प्रकृति इस तरह की नहीं है। भाजपा नेता में अपने वजूद
के लिए लड़ाई लड़ने का स्वभाव नहीं रहा। यहां तो लोग वर्षों से पार्टी की वजूद के लिए लड़ते रहे। कक्षा का विद्यार्थी बिगड़े तो समझ में आता है पर यहां तो शिक्षक और प्रधानाचार्य पटरी से उतरने की तैयारी कर रहे हैं। पार्टी पटरी है और उस पर संगठन की रेल चलती है। बहुत यात्री आए और बहुत यात्री गए। रेल के डिब्बे में बैठे हैं तो कभी न कभी उतरना होगा और रेल है तो यात्री नए भी आएंगे। पुराने भी रहेंगे। कुछ चढ़ेंगे, कुछ उतरेंगे। कभी-कभी अधिक भीड़ होने से कुछ आवश्यक यात्री को भी स्टेशन पर ही रुक जाना पड़ता है। पर वह यात्री दूसरी रेल का इंतजार करता है। वह जल्दबाजी में न किसी यात्री को घसीटता है, न रेल पर पथराव करता है और न पटरी उखाड़ता है। फिर अपने हाथ से बिछाई पटरी को, अपने हाथ से बनाए रेल के डिब्बों को अगर रोज सफर करने वाले यात्री तोड़ने लगेंगे तो हम अपनी लक्षित यात्रा पर कैसे पहुंच पाएंगे? पार्टी व्यवस्थाओं से चलती है। व्यवस्थाएं पार्टी में कार्यरत लोगों द्वारा कायम रखी जाती हैं। पार्टी किसी एक के सहयोग से नहीं सभी के सहयोग से चलती है। सिर्फ मेरी ही चलेगी, मेरी नहीं तो किसी की नहीं चलेगी’, की तर्ज पर न संगठन चलता है, न समाज और न ही परिवार।

Monday, February 27, 2012

गोधरा के शहीदों को नमन

साबरमती एक्सप्रेस का S-6 कोच (चित्र: liveindia.tv से)
 
27 फरवरी 2002. 'आधुनिक' भारत के इतिहास का एक और काला दिन. इसी दिन इस 'स्वतंत्र' और "धर्मनिरपेक्ष" देश में सुबह 7:43 बजे गुजरात के गोधरा स्टेशन पर इसी देश के 58 नागरिकों (23 पुरुषों, 15 महिलाओं और 20 बच्चों) को साबरमती एक्सप्रेस के कोच S-6 में ज़िंदा जला दिया गया. उनका 'अपराध' शायद ये था कि वे अपनी धार्मिक आस्थाओं के अनुसार अयोध्या को श्रीराम की जन्मभूमि मानते थे और उसी अयोध्या की अपनी तीर्थयात्रा से लौट रहे थे.
मैंने सुना है कि इस देश में नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार प्राप्त है. मैंने ये भी सुना है कि इस देश में मानवाधिकारों और महिला-अधिकारों की रक्षा के लिए भी अनेक प्रावधान हैं. लेकिन मुझे ये नहीं मालूम कि ये अधिकार हिंदुओं के लिए भी हैं या नहीं. सुना तो मैंने ये भी है कि इस देश का मीडिया बहुत 'जागरूक', 'निष्पक्ष' और 'ज़िम्मेदार' मीडिया है. मीडिया में गोधरा के बाद पूरे गुजरात में हुए दंगों की खबरें खूब सुनने को मिलीं, लेकिन अफसोस! गोधरा में मारे गए लोगों के परिवार की व्यथा विश्व को सुनाने का समय शायद किसी चैनल, किसी अखबार को नहीं मिला.