Monday, February 27, 2012

गोधरा के शहीदों को नमन

साबरमती एक्सप्रेस का S-6 कोच (चित्र: liveindia.tv से)
 
27 फरवरी 2002. 'आधुनिक' भारत के इतिहास का एक और काला दिन. इसी दिन इस 'स्वतंत्र' और "धर्मनिरपेक्ष" देश में सुबह 7:43 बजे गुजरात के गोधरा स्टेशन पर इसी देश के 58 नागरिकों (23 पुरुषों, 15 महिलाओं और 20 बच्चों) को साबरमती एक्सप्रेस के कोच S-6 में ज़िंदा जला दिया गया. उनका 'अपराध' शायद ये था कि वे अपनी धार्मिक आस्थाओं के अनुसार अयोध्या को श्रीराम की जन्मभूमि मानते थे और उसी अयोध्या की अपनी तीर्थयात्रा से लौट रहे थे.
मैंने सुना है कि इस देश में नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार प्राप्त है. मैंने ये भी सुना है कि इस देश में मानवाधिकारों और महिला-अधिकारों की रक्षा के लिए भी अनेक प्रावधान हैं. लेकिन मुझे ये नहीं मालूम कि ये अधिकार हिंदुओं के लिए भी हैं या नहीं. सुना तो मैंने ये भी है कि इस देश का मीडिया बहुत 'जागरूक', 'निष्पक्ष' और 'ज़िम्मेदार' मीडिया है. मीडिया में गोधरा के बाद पूरे गुजरात में हुए दंगों की खबरें खूब सुनने को मिलीं, लेकिन अफसोस! गोधरा में मारे गए लोगों के परिवार की व्यथा विश्व को सुनाने का समय शायद किसी चैनल, किसी अखबार को नहीं मिला.
मुस्लिम-बहुल गोधरा में दंगों का एक पुराना इतिहास रहा है. वीकिपीडिया पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार गोधरा में 1947-48, 1953-55, 1965, 1980-81 और 1985 में भी भीषण दंगे हुए थे, जिन्हें नियंत्रित करने के लिए कई बार सेना की मदद भी लेनी पड़ी. 27 फरवरी 2002 की घटना के बाद दंगों की इस गाथा में एक काला अध्याय और जुड़ गया है. गोधरा की इस भीषण घटना में जीवित बचे एक प्रत्यक्षदर्शी के अनुसार उस दिन सुबह गोधरा स्टेशन के पास 'सिग्नल फालिया' में लगभग 3000 लोग एकत्रित थे. द ट्रिब्यून (The Tribune) के अनुसार साबरमती एक्सप्रेस जैसे ही स्टेशन से आगे बढ़ी, गाड़ी में पहले से सवार हो चुके लोगों में से किसी ने चेन खींचकर ट्रेन रोक दी और तुरंत ही बाहर से भीड़ ने पथराव शुरू कर दिया. इससे बचने के लिए अंदर बैठे यात्रियों ने दरवाजे और खिड़कियाँ बंद कर लीं. कुछ ही देर बाद बाहर से पेट्रोल और केरोसीन छिड़ककर डिब्बे में आग लगा दी गई. गोधरा के एक पेट्रोल पंप पर काम करनेवाले दो कर्मचारियों के अनुसार एक दिन पूर्व ही कुछ लोगों द्वारा उनके पेट्रोल-पंप से 140 लीटर पेट्रोल खरीदा गया था.
 गोधरा-कांड की जांच के लिए गठित नानावती आयोग और साथ ही राज्य की SIT की रिपोर्ट के अनुसार गोधरा की घटना एक सुनियोजित षड्यंत्र का परिणाम थी. पूर्व रेल-मंत्री लालूप्रसाद यादव द्वारा नियुक्त बनर्जी कमीशन ने ट्रेन में सवार यात्रियों को ही इस अग्नि-कांड के लिए दोषी ठहराया था, लेकिन 13 अक्टूबर 2006 को गुजरात उच्च-न्यायालय ने इस रिपोर्ट को असंवैधानिक करार देते हुए निरस्त कर दिया. हत्याकांड के नौ वर्षों बाद 22 फरवरी 2011 को एक विशेष अदालत ने 31 लोगों को गोधरा की घटना के लिए दोषी करार दिया, जिनमें से 11 लोगों को मृत्यु-दंड और 20 को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई.
अपने सदभावना उपवास के दौरान श्री नरेन्द्र मोदी
हालांकि, कानूनी प्रक्रिया अभी लंबी चलेगी, लेकिन मेरे मन में सवाल ये है कि देश में होने वाली इस तरह की घटनाओं और सांप्रदायिक दंगों का सिलसिला आखिर कब रूकेगा? और रूकेगा भी या नहीं? आखिर इसका परिणाम क्या होगा? गोधरा हत्याकांड और उसके बाद पूरे गुजरात में हुए दंगे इस बात का एक खतरनाक संकेत हैं कि हमारे देश में शांति और सद्भाव को खत्म करने के लिए किसी विदेशी शक्ति की आवश्यकता नहीं है. दंगों के बाद मीडिया के माध्यम से शोर मचाकर तथाकथित 'सेक्युलर' समूहों और NGOs के बीच जिस तरह श्री नरेंद्र मोदी को दंगों का गुनहगार साबित करने की होड़ दिखाई दी, उससे फिर मुझे यही महसूस होता है कि हम आपस में ही लड़ने-मिटने को तैयार बैठे हैं. मेरे मन में प्रश्न ये है कि मोदी के खिलाफ शोर मचाने वालों के मन में इस देश के लोकतंत्र और न्याय-तंत्र पर विश्वास है या नहीं? गुजरात दंगों के बाद हुए दोनों विधानसभा चुनावों में मोदी जी के नेतृत्व में भाजपा ने गुजरात में जीत हासिल की है. साथ ही, उनके खिलाफ जो प्रकरण न्यायालय में दाखिल किए गए थे, उन पर निर्णय न्यायालय में होगा ही. फिर बेवजह शोर मचाकर देश में सांप्रदायिक वैमनस्य बढाने का प्रयास क्यों? मुझे आश्चर्य होता है कि गुजरात दंगों के दोषियों को कड़ी सज़ा दिलाने के लिए आंदोलन चलाने वाले कभी गोधरा के दोषियों के खिलाफ आवाज़ क्यों नहीं उठाते? नरेंद्र मोदी को गुनहगार बतानेवाले लोग 1984 के सिख दंगों पर मौन क्यों हैं? अल्पसंख्यकों के अधिकार और उनकी सुरक्षा जितनी महत्वपूर्ण है, क्या बहुसंख्यकों के अधिकारों और उनकी सुरक्षा को भी उतना ही महत्व नहीं दिया जाना चाहिए?
मुझे लगता है कि गुजरात दंगों जैसी घटनाओं के संदर्भ में अपनी सुविधानुसार निष्कर्ष निकालने वालों को पूर्वाग्रहों से बाहर निकलकर सत्य को स्वीकार करना चाहिए. गुजरात दंगों की बात गोधरा के बिना अधूरी है. झूठे आरोप-प्रत्यारोप किसी को तात्कालिक लाभ तो दिला सकते हैं, लेकिन ये देश और समाज को नुकसान ही पहुंचाते हैं. आवश्यकता इस बात की है कि हम संगठित होकर इस तरह के कुचक्रों का सामना करें और उन्हें परास्त करें. यही गोधरा के शहीदों के लिए हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी.

4 comments:

  1. Excellent analysis Sumant. Pl keep it up. Join AHWAN.

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  2. धन्यवाद! I will surely join the group. Please mail me the link at Sumant@Sumant.in.

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  3. बहुसंख्यक बंटे हुए होने से और अल्पसंख्यको को अन्तराष्ट्रीय सहयोग मिलते रहने से एवं भारतीय राजनीति की बागडोर उनके हाथों मे जो विदेशियों के अभिकर्ता हे से देश का बंटाधार हो रहा है।
    गोधरा के बाद हुई प्रतिक्रिया से उन ताकतों के हौसले थोडे़ पस्त जरूर हूए है पर निष्क्रिय नहीं।
    2002 को को सदैव याद रखते हुए हमें गोधरा कभी नहीं भूलना चाहिये।

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    1. आपकी टिप्पणी के लिए धन्यवाद!
      मैं सहमत हूँ कि हमें संगठित होना चाहिए, लेकिन बहुसंख्यकों और अल्पसंख्यकों के रूप में नहीं, बल्कि भारतीयों के रूप में. ये सही है कि अल्पसंख्यकों को अंतर्राष्ट्रीय सहयोग मिलता है, लेकिन सहयोग देने वालों का उद्देश्य सामाजिक या धार्मिक न होकर विशुद्ध रूप से सैन्य और राजनैतिक है. भारत के खिलाफ यह परोक्ष सैनिक युद्ध और प्रत्यक्ष कूटनीतिक/राजनैतिक युद्ध है. इसलिए इसका सामना तब तक नहीं किया जा सकता, जब तक बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक, सभी 'भारतीय' के रूप में एकजुट न हो जाएं.
      नरेन्द्र मोदी जी ने गुजरात में यह करके दिखाया है. 'सबका साथ-सबका विकास' के सिद्धांत पर चलकर उन्होंने सबका समान विकास किया है और सबको एक साथ जोड़ा है. अब यही आशा है कि वे प्रधानमंत्री बनें, ताकि पूरा देश इसी भावना के साथ एकजुट हो सके.

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