Friday, June 1, 2012

मजबूत संगठन निर्माण के लिए एकजुट हो कमर कस मैदान में उतरें

 (भाजपा के मुख-पत्र "कमल संदेश" के 1-15 जून 2012 अंक में श्री प्रभात झा का विशेष संपादकीय लेख)

पिछले दिनों भाजपा शासित राज्य कर्नाटक, गुजरात एवं राजस्थान भाजपा में जो कुछ हुआ उससे आम नागरिकों को काफी तकलीफ हुई। तकलीफ उनको भी हुई जो भाजपा के कार्यकर्ताहैं और समर्थक। घटना अच्छी होती तो तकलीफ नहीं होती। घटना दुःखद और भाजपा की प्रकृति के विरुद्ध होने के कारण सभी को तकलीफ हुई। खुश वे भी नहीं हुए होंगे, जिनके कारण देश और दल दुःखी हुआ। मूल में भाजपा की प्रकृति इस तरह की नहीं है। भाजपा नेता में अपने वजूद
के लिए लड़ाई लड़ने का स्वभाव नहीं रहा। यहां तो लोग वर्षों से पार्टी की वजूद के लिए लड़ते रहे। कक्षा का विद्यार्थी बिगड़े तो समझ में आता है पर यहां तो शिक्षक और प्रधानाचार्य पटरी से उतरने की तैयारी कर रहे हैं। पार्टी पटरी है और उस पर संगठन की रेल चलती है। बहुत यात्री आए और बहुत यात्री गए। रेल के डिब्बे में बैठे हैं तो कभी न कभी उतरना होगा और रेल है तो यात्री नए भी आएंगे। पुराने भी रहेंगे। कुछ चढ़ेंगे, कुछ उतरेंगे। कभी-कभी अधिक भीड़ होने से कुछ आवश्यक यात्री को भी स्टेशन पर ही रुक जाना पड़ता है। पर वह यात्री दूसरी रेल का इंतजार करता है। वह जल्दबाजी में न किसी यात्री को घसीटता है, न रेल पर पथराव करता है और न पटरी उखाड़ता है। फिर अपने हाथ से बिछाई पटरी को, अपने हाथ से बनाए रेल के डिब्बों को अगर रोज सफर करने वाले यात्री तोड़ने लगेंगे तो हम अपनी लक्षित यात्रा पर कैसे पहुंच पाएंगे? पार्टी व्यवस्थाओं से चलती है। व्यवस्थाएं पार्टी में कार्यरत लोगों द्वारा कायम रखी जाती हैं। पार्टी किसी एक के सहयोग से नहीं सभी के सहयोग से चलती है। सिर्फ मेरी ही चलेगी, मेरी नहीं तो किसी की नहीं चलेगी’, की तर्ज पर न संगठन चलता है, न समाज और न ही परिवार।

परिवर्तन प्रकृति का नियम है। जब हम बने होंगे तब भी कोई हटा होगा। जब हम हटेंगे तब भी कोई बनेगा। धरा पर कौन हमेशा के लिए आया है। जो आया है वह जाएगा’, के अकाट्य सत्य को जानने के बाद भी लोग शृंगारित होने के पश्चात् निर्मात्री और जन्मात्री को ही क्यों कोसने लगते हैं? संगठन मां है। वह अपनी वात्सल्यता से हमारा निर्माण करती है। वर्षों लग जाते हैं किसी कार्यकर्ता के निर्माण में। विध्वंस क्षणिक होता है। निर्माण वर्षों का समय लेता है। निर्माण में एक नहीं अनेक की भूमिका होती है पर विध्वंस के लिए तो कोई एक ही काफी होता है।
हमें विचार करना होगा कि कहीं हमारी निर्माण पद्धति में कोई कमी तो नहीं आ गई। नींव से कलश तकके निर्माण में कहीं हम ठहर और सहम तो नहीं गए। आखिर उस वजह को तो ढूंढना ही होगा जो कलश के बाद कोलाहल की ओर बढ़ने लगती है। आखिर वह विचार क्यों नहीं करता कि उसे कलश किसने बनाया। क्या उसे कलश बनने में उसकी अकेले की भूमिका थी? क्या वह कलश नींव को हिलाने के लिए बना था? क्या कलश की प्रकृति यही होती है कि वह जिस नींव पर खड़ा रहे, उसी को हिलाता रहे। विचार तो इस पर भी करना होगा कि आखिर यह परिस्थिति क्यों बनती है? हम सभी जानते हैं कि संगठन से सत्ता का निर्माण होता है न कि सत्ता से संगठन का। विश्व का राजनीतिक इतिहास जब आंखों से गुजरता है तो लगता है कि सबने एक स्वर में कहा है ‘‘संगठन सर्वोपरि होता है।’’ जब राजा हुआ करते थे तब भी  वे धर्माचार्य की बात मानते थे। आज जब लोकतंत्र हैं तो धर्माचार्य की भूमिका संगठन की होती है। ऊंचाई पर हम जाते हैं तो हमारी समझ की ऊंचाई भी बढ़नी चाहिए। पर अक्सर देखा गया है कि अधिक ऊंचाई पर जाने पर आदमी यह जानते हुए कि उसे एक न एक दिन नीचे आना होगा, बावजूद उसके वह नीचे वालों पर आंखें तरेरता है। जरूरत से ज्यादा जब हम किसी की प्रशंसा करते हैं तो व्यक्ति के बिगड़ने की संभावना का द्वार हम स्वतः खोल देते हैं। इसी तरह जब हम व्यक्ति की बुराई की इंतहा कर देते हैं तो उसके बाहर जाने का द्वार भी हम ही खोल देते हैं।
संगठन को जमीनी पकड़ बनानी होगी। जब जमीनी पकड़ बनेगी तो जमीन और आसमान के बीच समन्वय रहेगा। आसमान इसलिए टिका है कि उसे यह पता है कि पृथ्वी गोल है और वह सदैव घूमती रहती है। जहां में कभी जो जमीनहोता है वह कभी आसमानहो सकता है और जो आसमान है वह कभी जमीन पर आ सकता है। हमको ना अपनों से और ना ही विरोधियों से लड़ना है। हम तो विचार की लड़ाई लड़ते हैं और यह सोचकर लड़ते हैं कि जो आज हमारा नहीं वह आनेवाले दिनों में हमारा हो जाएगा। हमें हमारे लोकव्यवहार पर भरोसा रखना चाहिए। हमारा लोक व्यवहार ही संगठन को विस्तार में कारगर साबित होगा। सोना तपता है, गलता है, तब किसी का शृंगार बनता है। अगर वह यह ठान ले कि मैं न तपूंगा, न गलूंगा, तो भला कौन उसे शृंगार मानेगा? सोना का ढेला गले में कोई नहीं लटकाता। लोग आभूषण पहनते हैं। अटलजी, आडवाणी जी और डा. जोशी जी भारतीय राजनीति के क्षितिज पर इसलिए वर्षों से चमक रहे हैं कि इन्होंने सदैव संगठन को सर्वोपरि माना है। अपने को भाजपा के भीतर रखा, बावजूद इसके कि उनका कद बहुत बड़ा है पर उन्होंने अपने कद को पार्टी के कद से ऊंचा नहीं बनाया। यही कारण है कि वह पद पर रहें या न रहें, उनका राजनीतिक कद दल में इतना बड़ा है कि इन्हें सभी नमन करते हैं। नमन देह को नहीं, समर्पण को किया जाता है। समर्पण सहज होता है प्रायोजित नहीं। हम जो आज हैं वो कल नहीं रहेंगे। जो कल होंगे वो परसों नहीं रहेंगे। एक समय ऐसा भी आएगा जब हम कुछ नहीं रहेंगे, पर क्या हम वैचारिक नाभि के संबंधों को भूल जाएंगे?
पिछले दिनों मध्यप्रदेश भाजपा कार्यालय में पूर्व सांसदों व पूर्व विधायकों की बैठक हुई। उस बैठक के समापन समारोह में 87 वर्षीय ज्येष्ठ और श्रेष्ठ नेता श्री सुंदरलाल पटवा ने कहा कि हम जितने लोग यहां बैठे हैं वे सभी पार्टी के कारण जाने जाते हैं। हम पर पार्टी का बहुत बड़ा अहसान है। हम जब तक जीवित हैं, हमें जो पार्टी ने समाज में महत्व दिया है उसके अहसान को नहीं भूलना चाहिए और जीवनपर्यन्त कार्य करके इस कर्जे से उबरते रहना चाहिए। सच में भारतीय जनता पार्टी वर्तमान राजनीति में देश की एक नई उम्मीद है। सब उसकी ओर देख रहे हैं। ऐसे समय में जिसके पास जो जवाबदारी है उसे अपने-अपने स्थानों पर अहम भूमिका निभानी होगी। तेरा-मेरा का चक्कर या अपने अस्तित्व का चक्कर भूलकर सिर्फ हम सभी को पार्टी के अस्तित्व के लिए एकजुट होकर कमर कसकर मैदान में आना होगा। जिस तरह शाखा में हम मुख्यशिक्षक का आदेश मानते हैं। यह हम नहीं देखते कि उसकी उम्र क्या है? वह हमसे छोटा है या बड़ा? हम यह देखते हैं कि वह शाखा का मुख्य शिक्षक है और शाखा पर उसका आदेश मानना प्रत्येक स्वयंसेवक का कत्र्तव्य है। आज किसके पास क्या दायित्व है, महत्व इस बात का नहीं है। जिसके पास जो दायित्व है हमें उनके दायित्व और व्यवस्था की प्रतिष्ठा तो रखनी ही होगी।

1 comment:

  1. Chandrakant Vajpeyi. >> Prabhat JHA
    21 hours ago ·
    ‎01 / 06 / 2012.
    प्रिय प्रभात जी, सम्पादक " कमल सन्देश "
    ' यह अनुभव करके बहुत प्रसन्नता हुई कि मेरे दो निजी विचारों और आपके द्वारा अभिव्यक्त विचारों में मूलभूत रूप से समानता है तथा आपनें इन विचारों पर अपनी ओर से मेरे विचार जानें बिना अनजानें में हरी झंडी दी है, इस हेतु आपको हार्दिक धन्यवाद।'
    मेरे दोनों निजी विचार निम्नानुसार है :--
    (१) मेरा सदैव मानना रहा है कि
    " राजनीति से जुड़े व्यक्ति की पद पर स्थापना केवल राष्ट्र-निर्माण के अधिष्ठाता के रूप में होती है,अतएव उन्होंने व्यक्ति विशेष अथवा समूह विशेष से ऊपर रहकर पूर्ण निर्भीक होकर अपना कर्तव्य करना चाहिए, क्योकि वह राजनीतिज्ञ जनता का यानी देश का प्रतिनिधि होता है। वह किसी संगठन, समूह या व्यक्ति विशेष का गुलाम नहीं होता कि केवल उनके इशारों पर चले।"
    '' उन्होंने हर हालत में केवल देशहित व नागरिकों के विचारों को
    प्राथमिकता देते हुवे अपनें कदम बढाने चाहिए और इसी दिशा में सामूहिक निर्णय लेनें चाहिए।''
    " यदि किसी संगठन विषय में कर्तव्य करना हो तो संगठन के मूल उद्देश्यों कि पूर्ति के लिए ही पूरी तरह से समर्पित व प्रतिबद्ध रहकर सामुहिक निर्णय लेनें चाहिए न कि किसी व्यक्ति या समूह विशेष के प्रति नतमस्तक होकर काम करना चाहिए। "
    कमल सन्देश के सम्पादकीय में उपरोक्त आशय व्यक्त किया गया है इसके लिए " आभार व हार्दिक अभिनन्दन "
    (२) चिकित्सकीय आधार पर यह पाया गया कि औसतन ६० वर्ष की आयु के उपरांत कोई भी शासकीय कर्मचारी सेवा के अनुकूल नहीं होता है। अत: यह नियम बनाया गया था कि इस आयु की पूर्णता पर प्रत्येक शासकीय अधिकारी और कर्मचारी को अनिवार्यत: ससम्मान सेवा निवृत्त किया जाए। सभी सरकारी विभागों में इस नियम का अक्षरश: पालन किया गया है। इस आयु के उपरांत किसीभी पद के लिए शासकीय निधिका वितरण करना विशिष्ट परिस्थिति-अपवाद छोड़कर अयोग्य निर्देशित है।
    श्री प्रभात जी, यह कैसी विडम्बना है की यह नियम केवल सरकारी
    नौकर पेशा और अधिकारी वर्ग के लिए ही लागू है, 'जनप्रतिनिधि' पद के लिए यह नियम लागू नहीं है। अतएव मेरे विचार से :--
    [१] उक्त असमान नियमों के कारण देशभरमें अनेक वृद्ध व शारीरिक रूप से अक्षम व्यक्ति भी "सेवा" के नाम पर सरकारी मलाई का आनंद उठा रहे है और देश को आर्थिक नुकसान पहुँचानें के साथ साथ गर्त में ढकेलने में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष योगदानदे रहें है।
    [२] जेष्ठनागरिक बनचुके जनप्रतिनिधि सक्षम युवाओं का हक़ नहीं छीन रहे है।
    [३] जनप्रतिनिधि उक्त नियम से मुक्त रहनें के कारण आम भारतीय नागरिक जुल्म (अन्याय) व अपमान का शिकार हो रहा है।
    " आज वोट-बैंक की राजनीति से वशीभूत होकर कुछ राज्यों में सेवा निवृत्ति आयु बढ़कर ६२ वर्ष कर दी गयी है।"
    ' मेरा चिंतन रहा है कि देश में जनप्रतिनिधि सहित सभी को सामान सेवा निवृत्ति आयु ६० अथवा ६२ वर्ष कर देना चाहिए।'
    मुझे ख़ुशी है की मेरे विचारों को श्रद्धेय ' नाना देशमुख जी ' नें सार्थक किया था और अब "श्री प्रभात झा साहाब " भी ६२ वर्ष की आयु पूर्ण होने के साथ सक्रीय राजनीति या जनप्रतिनिधि पद से सदा के लिए मुक्त रहकर मेरे विचारों को सार्थक करनें की घोषणा कर चुके है।
    श्री प्रभातजी को उक्त आदर्श प्रस्तुति के लिए अग्रिम धन्यवाद तथा सुस्वास्थ्य-समृद्धि की कामना । आपकी शालीन प्रामाणिक-बेदाग़ छबि सदा कायम रहे और श्रेष्ठतम राष्ट्र निर्माण का कार्य संपादित होवे, प्रभु से यही विनम्र प्रार्थना।

    'मोदी की जल्दबाजी कर रही है बीजेपी का बंटाधार'
    khabar.ibnlive.in.com
    पार्टी अध्यक्ष गडकरी पर आडवाणी के निशाना साधने के बाद बीजेपी के मुखपत्र कमल संदेश के संपादक प्रभात झा ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी पर हमला बोला है।
    Like · · Share

    ReplyDelete