Saturday, September 8, 2012

राष्ट्रीय सुरक्षा और चीन की चुनौती: भावी खतरे का स्पष्ट संकेत


 पिछले कुछ वर्षों में भारत की सीमाओं पर लगातार बढ़ते तनाव से उत्पन्न सुरक्षा चुनौतियां उस खतरे का स्पष्ट संकेत हैं, जिसका सामना निकट भविष्य में भारत को करना पड़ेगा। देश के भीतर लगातार बढ़ रही हिंसा की घटनाएं भी इसी का प्रतिफल हैं। देश में जगह-जगह हो रहे बम-विस्फोटों, आतंकी हमलों, सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं, नक्सलवाद, आतंकवाद, पड़ोसी देशों से हो रही घुसपैठ आदि को अलग-अलग नहीं देखा जाना चाहिए। ये सभी कहीं-न-कहीं एक दूसरे से जुड़े हुए हैं और भारत के सबसे बड़े व खतरनाक पड़ोसी चीन द्वारा भारत को अस्थिर बनाए रखने के प्रयास ही इन सभी समस्याओं का मूल है।

चीन न केवल भारतीय सीमा पर लगातार सैन्य-दबाव बना रहा है, बल्कि भारत की सीमा का बार-बार अतिक्रमण करते हुए सैन्य व असैन्य संपत्ति को क्षति पहुँचा रहा है और सीमावर्ती क्षेत्रों के नागरिकों को आतंकित कर रहा है। भारत का यह सबसे बड़ा व सबसे खतरनाक पड़ोसी चारों ओर से भारत को घेरने के सुनियोजित प्रयास कर रहा है। भारत के अन्य पड़ोसी देशों में चीन की सैन्य-उपस्थिति, वहां उसके द्वारा सैनिक-अड्डों का विकास और उन देशों के साथ चीन के लगातार बढ़ रहे रणनीतिक संबंधों को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। भारत के विरुद्ध पाकिस्तान का सशस्त्रीकरण, पाक-अधिकृत कश्मीर में चल रहे भारत-विरोधी आतंकी कैंपों को संरक्षण व इस क्षेत्र में चीन की सैन्य-सक्रियता, माओवाद के माध्यम से नेपाल में शासन का सूत्रधार बनने का प्रयास तथा बांग्लादेश, म्यांमार व श्रीलंका में चीनी सैन्य विशेषज्ञों की उपस्थिति भारत पर हो रही इस चीनी घेराबंदी के कुछ स्पष्ट उदाहरण हैं।

इसके अलावा सीमा पार से देश में आतंकवाद को बढ़ावा देने, पूर्वोत्तर के उग्रवादी गुटों को सक्रिय सहयोग प्रदान करने एवं देश के भीतर नक्सलवाद को प्रोत्साहित करके भारत में आंतरिक विद्रोह व अशांति फैलाने के चीनी प्रयत्न भारत की एकता व अखंडता को सीधी चुनौती हैं। इसके अलावा अपने साइबर-योद्धाओं (हैकर्स) के माध्यम से लगातार देश के सूचना व संचार तंत्र में सेंध लगाने की घटनाएं एवं भारत के विभिन्न संवेदनशील स्थानों के आस-पास विकसित होने वाली परियोजनाओं के लिए अत्यंत कम मूल्य पर निविदाओं के माध्यम से हो रहा चीनी गुप्तचर तंत्र का प्रवेश भी भारत की सुरक्षा के लिए एक गंभीर संकट है।