Wednesday, November 14, 2012

'हम ऋषियों की परंपरा के वाहक हैं': पं. जवाहरलाल नेहरु

पं. जवाहरलाल नेहरु
आज १४ नवंबर नेहरुजी की जयंती है. आज जयंती पर उन्हें याद करने वालों को उनके एक भाषण की कुछ पंक्तियाँ भी अवश्य याद करनी चाहिए. सन १९४८ में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के दीक्षांत समारोह में छात्रों को संबोधित करते हुए नेहरु जी ने कहा था:
"मुझे अपनी विरासत और अपने उन पूर्वजों पर गर्व है, जिन्होंने भारत को एक बौद्धिक व सांस्कृतिक सर्वश्रेष्ठता प्रदान की. आप इस अतीत के बारे में कैसा महसूस करते हैं? मेरी तरह ही आप भी स्वयं को इसमें साझेदार महसूस करते हैं या नहीं? मेरी तरह ही आप भी इस विरासत को स्वीकार करते और इस पर गर्व करते हैं या नहीं? या आप स्वयं को इससे अलग मानते हैं और आप इस विरासत को समझे बिना ही इसे अगली पीढ़ी को सौंप देंगे? क्या आप यह सोचकर रोमांचित नहीं होते कि हम इस विशाल संपदा के न्यासी हैं?
मैं आपसे ये प्रश्न पूछ रहा हूँ क्योंकि हाल के वर्षों में अनेक शक्तियां लोगों का मन गलत रास्तों की ओर मोड़ने और इतिहास की धारा को विकृत करने के प्रयास में लगी हुई हैं. आप मुसलमान हैं और मैं एक हिंदू हूं. हम भिन्न-भिन्न धार्मिक आस्थाओं का पालन कर सकते हैं या हम नास्तिक भी हो सकते हैं; लेकिन इसके कारण हम उस सांस्कृतिक विरासत से दूर नहीं जा सकते, जो उतनी ही आपकी भी है, जितनी मेरी है. जबकि हमारा अतीत हमें एक साथ जोड़ता है, तो हम अपने वर्तमान या भविष्य को हमें विभाजित करने की अनुमति क्यों दें?"
अतः चाहे हमारे ईष्ट-देव कहीं भी हों, लेकिन भारत में हम ऋषियों की परंपरा के ही वाहक हैं. हमारी धार्मिक आस्था चाहे कोई भी हो, लेकिन हम सभी आध्यात्मिकता की उनकी परंपरा के उत्तराधिकारी हैं. आध्यात्मिकता का अर्थ क्या है? यह रिवाजों और सिद्धांतों का जमघट या पारलौकिकता नहीं है, बल्कि यह एकता के दृष्टिकोण पर, शाश्वत सिद्धांतों पर आधारित एक जीवन पद्धति है. अपनी शक्ति को संगठित करने के लिए हमें इन शाश्वत सिद्धांतों को जानना होगा, जो हमारी भिन्न धार्मिक आस्थाओं के बावजूद हम सभी को संगठित कर सकते हैं."

सेक्युलरिज्म के नाम पर हिंदुत्व का विरोध करने वालों और भारत की प्राचीन गौरवशाली परंपरा को सतत अपमानित करने वालों को नेहरु जी के इस भाषण से अवश्य प्रेरणा लेनी चाहिए. चाहे कोई भी स्वार्थ हो, कोई भी मजबूरी हो, लेकिन जो सत्य है, उसे बदला नहीं जा सकता और सत्य यही है कि  हम सब भारत के महान ऋषियों की परंपरा के ही वाहक हैं. हमारा धर्म या पूजा-पद्धति भले ही भिन्न हो, किंतु भारत के प्रति हमारे प्रेम और सम्मान में कोई भिन्नता नहीं होनी चाहिए. हमें अपनी परंपरा पर गर्व करना चाहिए और अपना इतिहास याद रखना चाहिए क्योंकि उज्ज्वल भविष्य की इमारत इतिहास की नींव पर ही खड़ी होती है. जो इतिहास को भुला देते हैं, वे कभी अपने भविष्य का निर्माण नहीं कर सकते. 

आशा है कि नेहरु जी का गुणगान करने वाले और उनके अनुयायी होने का दावा करने वाले लोग उनके इन विचारों का भी पालन करेंगे. संभवतः यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी.

1 comment:

  1. अपनी संस्कृति और भव्य अतीत को नकारना मजबूरी हो ही नहीं सकती, ये तो शुद्ध रूप से स्वार्थ ही हो सकता है।

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