Thursday, October 3, 2013

"पहले शौचालय, फिर देवालय"

आज दिन-भर मीडिया और सोशल मीडिया पर श्री नरेंद्र मोदी के एक बयान को लेकर खूब चर्चा होती रही। हर समाचार-पत्र में इस आशय की ख़बरें छपी और मीडिया चैनलों पर यह बार-बार दोहराया जाता रहा कि मोदी ने शौचालय को "मंदिर" से बेहतर बताया है। मोदी समर्थक और मोदी विरोधी, हिन्दुवादी और सेक्युलरवादी आदि आदि सभी प्रकार के लोगों ने इस पर अपने-अपने विचार भी रखे।
कुछ लोगों ने इसकी तुलना जयराम रमेश द्वारा पिछले वर्ष दिए गए एक बयान से की। कुछ ने पूछा कि ऐसे बयान पर जयराम रमेश से माफ़ी की मांग करने वाली भाजपा आज चुप क्यों है। कुछ ने निष्कर्ष निकाला कि मोदी अब वोटों का जुगाड़ भिड़ाने और किसी भी तरह सत्ता तक पहुंचने के लिए आतुर हैं और इसलिए वे अब हिन्दुवादी की छवि से निकलकर सेक्युलर बनना चाहते हैं।
स्वाभाविक रूप से मैंने भी अपनी बुद्धि के अनुसार जानने-समझने का प्रयास किया कि मोदी और जयराम रमेश ने क्या कहा था। मैं इस पोस्ट के द्वारा किसी के भी बयान या विचार का समर्थन या विरोध नहीं कर रहा हूँ । मैं बस वह जानकारी यहाँ दे रहा हूँ, बाकी निष्कर्ष आप निकालें और अपनी राय भी दें।

१. मोदी ने क्या कहा:
नरेंद्र मोदी कल दिल्ली में एक कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। यह एक एनजीओ द्वारा आयोजित कार्यक्रम था, जिसमें युवाओं ने देश की समस्याओं और चुनौतियों के बारे में मोदी से कुछ प्रश्न पूछे थे और कुछ युवाओं ने अपनी ओर से सुझाव भी दिए थे। इन्हीं में से एक प्रश्न सफ़ाई-व्यवस्था (Sanitation) के बारे में था। इस पर अपने विचार व्यक्त करते समय मोदी ने ये कहा:
"मित्रों, समस्याओं के समाधान खोजना, इसके लिए हमारे यहाँ प्रयास नहीं होता है। और उसी का नतीजा है कि हम संकटों में उलझे रहते हैं। यहाँ पर सैनिटेशन को लेकर बहुत चिंता जताई गई, बहुत स्वाभाविक है ये; इक्कीसवीं सदी में हम जी रहे हैं और आज भी हमारी माताओं-बहनों को खुले में शौच क्रिया के लिए जाना पड़े, क्या इससे बड़ी कोई शर्मिंदगी की बात हो सकती है? किसी को भी पीड़ा होती है मित्रों। लेकिन, जिस देश में गांधीजी जीवन भर स्वच्छता, सफ़ाई इसके लिए जीते रहे, जीवन भर ये उनकी प्राथमिकता थी, उस देश में हम इस स्थिति में हैं।
मित्रों, मेरी पहचान तो है हिन्दुत्ववादी की, लेकिन मेरी रियल सोच क्या है मैं आपको बताता हूँ। मैंने मेरे राज्य में बड़ी हिम्मत के साथ एक बात कही है, और लगातार कहता हूँ। जो मेरी छवि है वो ये हिम्मत नहीं कर सकता है। लेकिन मैं करता हूँ। मैं कहता हूँ, पहले शौचालय, फिर देवालय। हर गाँव में लाखों रूपये के  देवालय तो हैं, लेकिन शौचालय नहीं हैं।"
मोदी  का यह बयान आप इस वीडियो में सुन सकते हैं:

यहाँ ध्यान देना आवश्यक है कि मोदी ने कहीं भी "मंदिर" शब्द का उल्लेख नहीं किया है। उन्होंने केवल देवालय कहा है और मेरी समझ के अनुसार देवालय किसी भी धर्म या संप्रदाय का पूजा/उपासना-स्थल हो सकता है।लेकिन मीडिया ने इसकी रिपोर्टिंग करते समय "मंदिर/Temple" कहकर ही उल्लेख किया है, जो मुझे ठीक नहीं लगता है।

कुछ लोगों ने इसकी तुलना जयराम रमेश के बयान से की है। आइये देखें कि जयराम रमेश ने क्या कहा था।
२. जयराम रमेश ने क्या कहा था:
अक्तूबर  २०१२ में, "निर्मल भारत यात्रा" के बारे में बोलते हुए जयराम रमेश ने ये कहा था:
"अब तक यात्राएं विनाश के लिए हुई हैं। ये यात्रा असली विकास के लिए है। ये यात्रा एक सकारात्मक और रचनात्मक काम के लिए है। ये यात्रा वो चीज़ बनाने के लिए है, जो मैं समझता हूँ, मंदिर से भी पवित्र है. और वो है...शौचालय।"
जयराम रमेश का बयान आप इस वीडियो में सुन सकते हैं:



यहाँ हम स्पष्ट रूप से सुन सकते हैं कि श्री रमेश ने "मंदिर" शब्द का उल्लेख किया था और शौचालय से इसकी तुलना करते हुए शौचालय को मंदिर से भी पवित्र कहा था। लेकिन नरेंद्र मोदी ने न तो मंदिर शब्द का उल्लेख किया है और न ही ऐसी कोई तुलना की है।
तो क्या मोदी और जयराम रमेश के बयान को एक समान मानना सही होगा? निष्कर्ष आप स्वयं निकालें और इस पोस्ट पर कमेन्ट के रूप में अपनी राय मुझे भी बताएँ।

Monday, September 30, 2013

स्वामी विवेकानंदजी की १५०वीं जयंती के अवसर पर मुख्य वक्ता के रूप में शिकागो में डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी का उदबोधन (हिन्दी सारांश)

हिंदुस्तान के रूप में भारत की पहचान
  • स्वामी रामकृष्ण परमहंस ने भविष्यवाणी की थी कि उनका शिष्य नरेन्द्रनाथ (स्वामी विवेकानंद) एक दिन
    अपनी बुद्धि और आध्यात्मिक शक्ति के द्वारा विश्व की नींव हिला देगा
    । स्वामी विवेकानंद ने अपने भाषणों और प्रवचनों के द्वारा यही किया भी। वे एक नए हिंदुस्तान की आवश्यकता पर बल दिया करते थे। वे चाहते थे कि भारत की सांस्कृतिक एकता को सभी भारतवासी बेझिझक स्वीकार करें।
  • शिकागो में विश्व धर्म संसद में स्वामी विवेकानंद ने उन बिंदुओं का उल्लेख किया था, जिन पर भारत में जन्मे सभी संप्रदाय सहमत हैं।
  • शिकागो से लौटने पर सन 1896 में लाहौर के एक भाषण में उन्होंने कहा था: “मेरे शब्दों को यद् रखो कि
    तभी और केवल तभी तुम हिन्दू हो, यदि हिन्दू शब्द सुनते ही तुम्हारे भीतर असीमित शक्ति का संचार होने लगता है। तभी और केवल तभी तुम हिन्दू हो, यदि किसी भी भाषा को बोलने वाले या किसी भी देश में रहने वाले प्रत्येक हिन्दू नाम वाले स्त्री-पुरुष सभी तुम्हें अपने लगते हैं। तभी और केवल तभी तुम हिन्दू हो, यदि किसी भी हिन्दू की पीड़ा तुम्हें अपने ही पुत्र या पुत्री की पीड़ा के समान व्यथित कर देती हो।
  • स्वामीजी ने ऐसे सात बिंदु बताए थे, जिन पर हिंदू और भारत में जन्मे अन्य संप्रदायों के विचार एक हैं:
  1. धर्म ज्ञान, अर्थात वेदों, के द्वारा प्राप्त होता है। वेदों से आशय कोई पुस्तक नहीं है, बल्कि विभिन्न ऋषियों द्वारा कई जन्मों के दौरान प्राप्त किए गए आध्यात्मिक नियमों का संग्रह ही वेद है।
  2. सृष्टि का कोई प्रारंभ या अंत नहीं है
  3. हम शरीर नहीं हैं, हम शरीर के भीतर रहने वाली आत्मा हैं।
  4. हमारा वर्तमान हमारे अतीत के कार्यों द्वारा और हमारा भविष्य हमारे वर्तमान कार्यों द्वारा निर्धारित होता है। प्रत्येक व्यक्ति अपने पूर्व जन्मों और वर्तमान जन्म में किए गए अच्छे-बुरे कर्मों के फल भोगता है।
  5. आत्मा का स्वरूप मुक्त, पवित्र, शुद्ध है। किन्तु आत्मा जन्म और मृत्यु के चक्र में उलझी रहती है।
  6. केवल विशुद्ध प्रेम के द्वारा ही उस सर्वशक्तिमान ईश्वर की पूजा की जानी चाहिए।
  7. जीवन का मूल उद्देश्य दिव्यता को प्राप्त करना, ईश्वर तक पहुंचना और ईश्वर के दर्शन करना ही है।
  • अपनी पुस्तक एकात्म मानववाद में दीनदयाल उपाध्याय जी ने हिंदुत्व की अवधारणा के आधुनिकीकरण के
    बारे में लिखा है: “हमें जैसा है-रहने दो वाली मानसिकता छोडनी होगी और नए युग में प्रवेश करना पड़ेगा। पुनर्निर्माण के हमारे प्रयास पूर्वाग्रहों या अतीत से प्राप्त सब-कुछ अस्वीकार करनेवाले नहीं होने चाहिए। इसी प्रकार अपने अतीत की उन परंपराओं से चिपके रहने की भी कोई आवश्यकता नहीं है, जो अब कालबाह्य हो चुकी हैं।
  • हिन्दू संस्कृति ही भारतीय सभ्यता का मूल है
  • स्वामी विवेकानंद ने अपनी आध्यात्मिक ऊर्जा विदेशी शासन के कारण मानसिक गुलामी में जकड़े हुए हिन्दू समाज को इससे मुक्त करने पर केंद्रित की। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि स्वामीजी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अग्रणी सेनानी थे और बाद में श्री अरविंद और महात्मा गांधी भी इसी मार्ग पर आगे बढ़े।
  • स्वामीजी ने कहा था, “यदि हिन्दू आध्यात्मिक नहीं है, तो मैं उसे हिन्दू नहीं मानता
  • इसलिए हम भारत को इस प्रकार परिभाषित करेंगे- “हिंदुस्तान, हिंदुओं और उन अन्य लोगों का राष्ट्र जो ये मानते हैं कि उनके पूर्वज हिन्दू थे”।
  • भारत हमारा भौतिक शरीर है और वैदिक मूल्य हमारी आत्मा हैं
  • चूंकि एक सहस्त्राब्दी पूर्व भारत में 100% लोग हिन्दू थे, इसलिए यदि आज कोई भिन्न मत वाले लोग यहाँ हैं, तो ऐसा तभी संभव हो सकता था, जब हिंदुओं का धर्मांतरण किया गया हो, इसलिए आज जो भिन्न मत वाले लोग हैं, उनके पूर्वज हिन्दू ही थे
  • इस प्रकार हम कह सकते हैं कि हिंदुस्तान केवल हिंदुओं का नहीं, बल्कि उन अन्य लोगों का भी देश है, जो स्वीकार करते हैं कि उनके पूर्वज हिन्दू थे

 वेदांतिक मूल्य: संरचनात्मक प्रतिमान
  • वेदांत पर आधारित कोई धर्मशास्त्र कट्टरतावादी नहीं हो सकता। स्वयं वेदों में कहा गया है कि ईश्वर तक पहुंचने के अनेक मार्ग हैं।
  • सन 1951 से आज तक हिंदुत्व के विषय में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए सभी निर्णयों में इस धारणा को अस्वीकार किया गया है कि हिंदुत्व धर्मनिरपेक्षता का विरोधी है
  • सन 1947 में मिली स्वतंत्रता के बाद जवाहरलाल नेहरू और उनके वामपंथी सलाहकारों की सेक्युलर रूढ़िवादिता का ही परिणाम था कि सरकार ने मंदिरों का नियंत्रण अपने हाथों में ले लिया, हिंदू पर्सनल लॉ को लागू किया और धार्मिक उत्सवों के लिए नियम बना दिए, जबकि मुस्लिमों और ईसाइयों के धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं किया
  • कर्नाटक से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार 1997-2002 के दौरान राज्य सरकार ने नियंत्रण वाले 25,000 मंदिरों से 391.40 करोड़ रूपये का राजस्व चढ़ावे के रूप में मिला, लेकिन इसमें से केवल 84 करोड़ रूपये ही मंदिरों पर खर्च किए गए; जबकि इन मंदिरों से प्राप्त इस धन में से 180.60 करोड़ रूपये मदरसों और हज यात्रा के लिए तथा 44 करोड़ रूपये चर्चों को डे दिए गए। अर्थात हिन्दू मंदिरों को प्राप्त दान का 78.58% भाग मुसलिम, ईसाई और अन्य गैर-हिन्दू गतिविधियों के लिए दिया गया!
 राष्ट्रीय पुनर्जागरण के लिए वेदांतिक मूल्यों का एजेंडा
  • हिंदुस्तान की अवधारणा भारत की पहचान को परिभाषित करती है
  • भारत की पहचान को बनाए रखने के लिए संस्कृत की शिक्षा को प्रोत्साहित करना और देश की संपर्क भाषा के रूप में संस्कृत को बढ़ाना आवश्यक है
  • हिंदुओं को और उन सभी लोगों को जिन्हें अपने हिंदू अतीत पर गर्व है, उन्हें भारत का वास्तविक इतिहास जानना चाहिए।
  • वैदिक मूल्यों पर विश्वास रखने वाले एक विराट समाज का निर्माण, जो आक्रमण का प्रत्युत्तर दे सके
  • पुनर्जागरण का आधार एकात्म मानववाद होना चाहिए
 इस एजेंडा के कार्यान्वयन के बारे में कुछ टिप्पणियाँ
  • आधुनिकता और धर्मनिरपेक्षता के बहाने आज हिंदुत्व के प्रति निष्ठा को कम करने के प्रयास किए जा रहे हैं। आज एक अच्छा हिन्दू होने का अर्थ केवल प्रार्थना और ईश्वर की भक्ति करने, मंदिरों में जाने और धार्मिक त्यौहार मनाने तक सीमित माना जाने लगा है।
  • चुनावी राजनीति ने मुद्दों को और भी बिगाड़ दिया है और भारतीय समाज लगातार विभाजित और भ्रमित होता जा रहा है। जातियों में बंटे हुए हिन्दू समाज के लोग धीरे-धीरे अपने ही शत्रु बनते जा रहे हैं। राष्ट्र के शत्रु बहुत सरलता से इन स्थितियों से लाभ उठा रहे हैं।
  • इसलिए अब धर्मनिरपेक्षता की इस भ्रमित और घृणित अवधारणा को पूरी तरह अस्वीकार करने का समय आ चुका है। सच्ची और छद्म धर्मनिरपेक्षता के बीच विकल्प के रूप में इसे पुनर्परिभाषित करने की आवश्यकता भी नहीं है। इसके बजाय हमें स्पष्ट रूप से यह कहना पड़ेगा कि हम इस अस्पष्ट धर्मनिरपेक्षता को अस्वीकार करते हैं और हम भारत को वैदिक मूल्यों पर आधारित आध्यात्मिक समाज बनाना चाहते हैं।
  • वैदिक मूल्यों में सर्व पंथ समभाव भी सम्मिलित है और इस प्रकार हिन्दू धर्मशास्त्र किसी भी अन्य संप्रदाय के विरुद्ध नहीं हैं
  • जो लोग संविधान द्वारा प्रदत्त समानता और भाईचारे के लोकतांत्रिक ढांचे में हिंदुओं के साथ नहीं रह सकते थे, उनके लिए हमने हिंदुस्तान के एक चौथाई भाग का विभाजन कर दिया था।
  • जब तक हम यह न पहचान लें कि हमें किससे लड़ना है, तब तक हम राष्ट्र के अस्तित्व पर मंडरा रहे संकट का सामना नहीं कर सकते। यह संकट गज़नी, घोरी या क्लाइव के समय जितना बड़ा था, आज उससे कई गुना बड़ा हो चुका है।
  • जो लोग चाहते हैं कि भारत कमज़ोर बना रहे, उनकी मुख्य रणनीति यही है कि भारतीयों का स्वाभिमान जगने न दिया जाए।
  • हमें स्पष्ट रूप से यह देख लेना चाहिए कि जहाँ भी मुस्लिमों का बहुमत होगा, वहाँ हिंदुओं की स्थिति वही होगी जो काश्मीर में या उप्र के मेरठ या केरल के मल्लपुरम में है। यहाँ मुसलिम बहुमत द्वारा हिंदू अल्पसंख्यकों के साथ वैसा ही व्यवहार किया जाता है, जैसा सउदी अरब में हिंदुओं के साथ होता है।
  • साथ ही,जो राष्ट्र-भक्त जन इस राष्ट्र के वैदिक आधार की रक्षा के प्रति चिंतित हैं, उन्हें ईसाइयों द्वारा किएजाने वाले धर्मांतरण पर भी ध्यान देना चाहिए। सन 2006 में ग्लोबल पास्टर्स नेटवर्क ने अमेरिका के डलास में एक सम्मेलन में यह घोषणा की थी कि यह संगठन पूरे विश्व में पचास लाख नए चर्च बनाने और 100 करोड़ लोगों को ईसाई बनाने के लिए आर्थिक सहायता प्रदान करेगा। एवेंजेलिस्ट पेट रॉबर्टसन के अनुसार, अकेले भारत से ही 10 करोड़ लोगों को ईसाई बनाने का लक्ष्य रखा गया है
  • सन 1857 में हुए पहले स्वतंत्रता आंदोलन में हुई हार से उपजी निराशा से लेकर सन 1863 में स्वामी विवेकानंद के जन्म से लेकर 1947 में स्वतंत्रता की प्राप्ति तक की हमारी यह यात्रा बहुत ही आश्चर्यजनक रही है1947 से मात्र 90 वर्षों पूर्व ही ब्रिटिश साम्राज्यवादियों ने भारतीयों का मत इस प्रकार बदल दिया था, ताकि हम अपनी पवित्र स्मृतियों को भूल जाएं
लोकतंत्र में चुनाव लड़ना अपना एजेंडा लागू करने के संघर्ष का एक बहुत महत्वपूर्ण भाग है। इसके लिए आवश्यक है कि वैदिक मूल्यों को मानने वाले और हिन्दू सभ्यता की परंपरा को स्वीकार करने वाले सभी मतदाता संगठित हों। भारत में स्थिति यह है कि यदि केवल हिन्दू मतदाता भी संगठित होकर मतदान करें, तो दो-तिहाई बहुमत से सरकार बनाई जा सकती है। राष्ट्रीय पुनर्जागरण की इच्छा रखने वालों और वैदिक मूल्यों का पालन करने वालों के लिए मुक्ति का मार्ग केवल यही है।
 
(स्त्रोत: श्री रामप्रकाश बागडी से प्राप्त मूल अंग्रेज़ी उदबोधन)

Saturday, September 28, 2013

क्या सचमुच “राइट टू रिजेक्ट” से बहुत बड़ा परिवर्तन आएगा?


27 सितंबर 2013 को कई उत्साही मित्र फेसबुक और ट्विटर पर दिन भर यह चर्चा करते रहे कि सुप्रीम कोर्ट ने अब भारत के मतदाताओं को “राइट टू रिजेक्ट” का जो अधिकार दिया है, उससे देश में बहुत बड़ा राजनैतिक परिवर्तन होने वाला है

निश्चित रूप से ये भारत के लोकतांत्रिक और चुनावी इतिहास का एक महत्वपूर्ण निर्णय हो सकता है, लेकिन क्या सचमुच इससे एक बहुत बड़ा परिवर्तन आने वाला है? यह समझने के लिए मैंने इस निर्णय का पूरा विवरण सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट से प्राप्त किया और पढ़ा।

मैं कानूनी बारीकियां नहीं समझ सकता, लेकिन अपनी सामान्य बुद्धि से मेरी समझ में जो आया है, वह मैं यहाँ लिख रहा हूँ। अन्य बातों और निष्कर्षों पर आप स्वयं विचार करें और मुझे भी बताएँ:
  1. न्यायालय ने कहा है कि जिस तरह चुनाव में किसी उम्मीदवार को वोट देना एक मतदाता का अधिकार है, उसी तरह किसी भी उम्मीदवार को वोट न देना (right to vote and right not to vote) भी मतदाता का अधिकार है। प्रत्येक मतदाता यह तय करने के लिए स्वतंत्र है कि वह किस उम्मीदवार के पक्ष में मतदान करना चाहता है और उसी तरह वह यह तय करने के लिए भी स्वतंत्र है कि वह किसी उम्मीदवार को अपना मत नहीं देना चाहता।
  2. भारतीय संविधान और चुनाव नियमों के अनुसार यह अधिकार हम मतदाताओं को बहुत पहले
    (Image Source: http://www.orthodoxherald.com)
    से प्राप्त है। बात केवल इतनी है कि हममें से अधिकांश लोग इसके बारे में नहीं जानते थे।
  3. अभी तक के नियम के अनुसार यदि कोई मतदाता अपना वोट किसी उम्मीदवार को नहीं देना चाहता है, तो वह मतदान केन्द्र पर जाकर पीठासीन अधिकारी को इसकी सूचना दे सकता है। तब निर्वाचन अधिकारी एक रजिस्टर में मतदाता का नाम दर्ज करते हैं और इस पर मतदाता के हस्ताक्षर/अंगूठे का निशान लिया जाता है, जिससे यह दर्ज हो जाता है कि मतदाता ने किसी भी उम्मीदवार को वोट न देने का निर्णय लिया है।
  4. मतदान करने या न करने के अधिकार के साथ ही, प्रत्येक मतदाता का ये भी अधिकार है कि उसका वोट गुप्त रखा जाए। लेकिन, इस तरह रजिस्टर में नाम दर्ज करने पर उसके गुप्तता के अधिकार का हनन होता है क्योंकि ऐसा करने से पता चल जाता है कि उस मतदाता ने किसी उम्मीदवार को वोट नहीं दिया है। न्यायालय ने माना है कि इस अधिकार की रक्षा की जानी चाहिए।
  5. यदि मतदाता मतदान केन्द्र के लिए न जाए, तो भी उसका मत नहीं दर्ज होता, लेकिन ऐसी स्थिति में यह संभावना भी रहती है कोई अन्य व्यक्ति उस मतदाता के नाम से फर्जी मतदान कर दे। इसे रोकने के लिए यह आवश्यक है कि प्रत्येक मतदाता अपने वोट देने (या न देने) के अधिकार का उपयोग करे।
  6. पारंपरिक पेपर-बैलट (मतपत्र) से होने वाले चुनाव में मतदाता के पास इस गुप्तता को बनाए रखते हुए भी किसी को मतदान न करने का एक तरीका था। वह तरीका ये है कि मतदाता बूथ पर जाए, किन्तु निर्वाचन अधिकारी को ये न बताए कि वह किसी उम्मीदवार को वोट नहीं देना चाहता। इसके बजाए वह किसी भी उम्मीदवार के पक्ष में मुहर लगाए बिना, खाली पर्ची मतपेटी में डाल सकता था, जिससे मतगणना के समय उसका वोट न गिना जाए।
  7. लेकिन इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन में ऐसा कोई विकल्प नहीं है क्योंकि मतदाता को कोई न कोई बटन दबाना अनिवार्य है। यदि बटन न दबाए, तो पता चल जाता है कि मतदाता ने वोट नहीं डाला है।
  8. इसलिए न्यायालय ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया है कि इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों में उम्मीदवारों की सूची के नीचे अंत में NOTA (None of the Above/उपरोक्त में से कोई नहीं) का विकल्प दिया जाना चाहिए, ताकि जो मतदाता किसी भी उम्मीदवार के लिए मतदान नहीं करना चाहते, वे ऐसा कर सकें
  9. इसके द्वारा मतदाता का निर्णय गुप्त बना रहेगा और साथ ही उसके नाम पर किसी अन्य व्यक्ति द्वारा फर्जी मतदान कर देने की संभावना भी नहीं रहेगी।
  10. लेकिन इस निर्णय में ऐसा कोई उल्लेख कहीं नहीं है कि “राइट टू रिजेक्ट” का उपयोग करने वाले मतदाताओं की संख्या चुनाव परिणाम पर भी प्रभाव डालेगी। मतगणना के समय केवल उन्हीं मतों को गिना जाएगा, जो किसी उम्मीदवार को मिले हैं, “राइट टू रिजेक्ट” वाले वोटों की गिनती नहीं होगी। इसलिए जीत-हार अभी भी उसी उम्मीदवार की होगी, जिसे सबसे ज़्यादा वोट मिलेंगे।
क्या अभी भी आपको लगता है कि इस नए विकल्प से राजनैतिक व्यवस्था में कोई बहुत बड़ा परिवर्तन आने वाला है? कृपया अपनी राय दें...