Wednesday, February 13, 2013

इन अल्पसंख्यकों की उपेक्षा क्यों?


मैंने सुना है कि हमारे संविधान में भाषाई और धार्मिक अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा के लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं। अक्सर मैंने यह भी सुना है कि हमारी ‘धर्मनिरपेक्ष’ सरकारें अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध हैं। लेकिन साथ ही मैंने यह भी सुना है कि हमारे देश के अधिकांश क़ानून जम्मू और कश्मीर राज्य पर लागू नहीं हैं। संभवतः यही कारण है कि जम्मू-कश्मीर के अल्पसंख्यक हिन्दू समाज का एक व्यक्ति पिछले १३ दिनों से महात्मा गांधी के जन्म-स्थान पोरबंदर में आमरण अनशन कर रहा है किन्तु अधिकांश राजनीतिक दलों और मीडिया चैनलों ने अभी तक इस विषय पर ध्यान देना आवश्यक नहीं समझा है।

जम्मू-कश्मीर के शरणार्थी हिन्दुओं के संगठन “ऑल पार्टीज़ माइग्रेंट्स को-ऑर्डिनेशन कमिटी (एपीएमसीसी) के अध्यक्ष श्री विनोद पंडित ६ मांगों को लेकर ३० जनवरी से भूख-हड़ताल पर हैं। उनकी मांग है कि:
  1. पाक-अधिकृत कश्मीर में स्थित शारदापीठ मंदिर (जो कि १९४७ से बंद है) को पुनः खुलवाने और वहाँ तक तीर्थयात्रा की सुविधा प्रारंभ करने के लिए भारत सरकार पाकिस्तान के साथ बातचीत करे।
  2. जम्मू-कश्मीर में शारदापीठ विश्वविद्यालय की स्थापना की जाए।
  3. जम्मू-कश्मीर में ५०० मंदिरों व अन्य धार्मिक-स्थलों पर किए गए अवैध कब्जों की जांच की जाए।
  4. जम्मू-कश्मीर विधानसभा में लंबित मंदिर व श्राइन बिल को पारित किया जाए।
  5. आयु सीमा पार कर चुके कश्मीरी शरणार्थी युवाओं को एकमुश्त मुआवजा दिया जाए
  6. कश्मीर वादी के ग़ैर-शरणार्थी हिन्दुओं को विशेष रोज़गार पैकेज दिया जाए।
हमारे अधिकांश ‘समाचार’ चैनलों के पास किसी अभिनेत्री की फिल्मों पर चर्चा करने या क्रिकेट मैच की हर गेंद का विश्लेषण करने के लिए पर्याप्त समय होता है। उनके पास वैलेंटाइन डे का महत्व बताने, किसी आतंकी की फांसी पर मानवाधिकारों की बात करनेवालों और दूसरी ओर किसी प्रदेश के मुख्यमंत्री को बिना सुनवाई, बिना अदालत फांसी पर लटका देने की मांग करने वालों की बातें सुनाने-दिखाने के लिए भी समय होता है। किन्तु आश्चर्य है कि उनके पास इस बात के लिए समय नहीं है कि वे अपने ही देश में कई दशकों से निर्वासितों और शरणार्थियों का जीवन जीने को विवश कर दिए गए कश्मीरी हिन्दुओं की पीड़ा को वाणी दें। यही कारण है कि हममें से अधिकांश लोग पोरबंदर में पिछली ३० जनवरी से जारी इस आमरण अनशन से अनभिज्ञ हैं।

किसी अनशनकारी व्यक्ति कि किन मांगों को स्वीकार या अस्वीकार किया जाए, ये चर्चा और विवाद का विषय हो सकता है किन्तु क्या यह भी किसी चर्चा या विवाद का विषय हो सकता है कि जो हज़ारों नागरिक अपने ही देश में दशकों से निर्वासित जीवन बिताने पर विवश कर दिए गए हैं, उनकी बात सुनी जाए या नहीं? किसी आपराधिक घटना के विरोध में निकाले जाने वाली मोमबत्ती यात्रा या किसी विशिष्ट क़ानून को पारित करवाने की मांग को लेकर जंतर-मंतर पर किए जाने वाले किसी आंदोलन के लिए घंटों का कवरेज देने वाले मीडिया चैनल हज़ारों परिवारों और कई पीढ़ियों को प्रभावित करने वाले किसी मुद्दे पर पूरी तरह मौन रहे, क्या यही निष्पक्षता का पैमाना है? क्या ये कश्मीरी पंडित इस स्वतंत्र देश के नागरिक नहीं? क्या उन्हें अपनी धार्मिक स्वतंत्रता और अपनी संस्कृति की रक्षा के संवैधानिक अधिकार से वंचित रखा जा सकता है? यदि नहीं, तो क्या कारण है कि अधिकांश मीडिया चैनल और राजनैतिक दल इस मुद्दे पर मौन हैं? प्रश्न तो अनेक हैं किन्तु दुखद है कि सभी प्रश्न अनुत्तरित ही हैं।

श्री विनोद पंडित के आन्दोलन के प्रति मीडिया और सरकार की इस उपेक्षा के बीच हाल ही में सोशल नेटवर्किंग साइट ट्विटर पर देश के सजग युवाओं द्वारा श्री विनोद पंडित के समर्थन में एक अभियान चलाया गया, जिसके बाद इस मुद्दे पर जागरूकता बढ़ी है। पोरबंदर के प्रबुद्ध नागरिकों ने भी एक दिन का सांकेतिक बंद रखकर इस मुद्दे को समर्थन दिया है। आशा की जानी चाहिए कि इस बढ़ते समर्थन का सकारात्मक परिणाम होगा।

किन्तु प्रश्न केवल किसी एक व्यक्ति, विषय या संगठन का नहीं है। प्रश्न इस राष्ट्र की सामाजिक समरसता का है। प्रश्न विशिष्ट समुदाय, जाति या धर्म के आधार पर लगातार भेद-भाव किए जाने की भावना और इससे उपजते असंतोष का है। प्रश्न वोट-बैंक की राजनीति के आरोपों का है। प्रश्न जागरूक और ईमानदार पत्रकारिता व निष्पक्ष शासन-व्यवस्था का है।

प्रश्न यह भी है कि क्या हम कभी उस आदर्श स्थिति को प्राप्त कर सकेंगे कि सरकार चाहे किसी भी पार्टी की हो, किन्तु उसके शासन में प्रत्येक जाति, धर्म और समुदाय का व्यक्ति समानता का अनुभव कर सके, कोई भेद-भाव किसी को महसूस न हो? 

अन्य प्रश्नों की ही तरह फ़िलहाल यह प्रश्न भी अनुत्तरित ही है।

2 comments:

  1. समस्या काफी जटिल है और निकम्मे तथाकथित सेकुलर दिनों दिन उसे और जटिल बना रहे है
    इसे में देश के बहुसंख्यक समुदाय को सद्बुधि दे पाना भी काफी मुश्किल काम हो गया है

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  2. काश्मीर हमारे देश का एक ऐसा हिस्सा है जहाँ पर अल्पसंख्यकों के बारे बात करने वाले लोगों को बाकी के सारे देश में सांप्रदायिक समझा जाता है क्योंकि ऐसा समझने वाले, काश्मीर के बहुसंख्यकों को देश के अल्पसंख्यकों के वोट से जोड़ कर देखते हैं...यही तो विडंबना है और लोकतंत्र की कुछ बुराइयों में से एक, यह सोच आप कैसे समाप्त कर सकते हैं जबकि देश में राष्ट्रवाद की बात करना भी सांप्रदायिक गतिविधि माना जाता हो।

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