Friday, May 31, 2013

बौद्धिक नक्सलवाद की चुनौती


हाल ही में छत्तीसगढ़ में हुए भीषण नक्सल-आक्रमण के बाद से नक्सलवाद का मुद्दा फिर एक बार चर्चा में है। इसमें कोई संदेह नहीं कि आदिवासियों के अधिकारों की आड़ में भारत के संविधान को अस्वीकार करने वाले, लोकतंत्र को कमज़ोर करने वाले और निरपराधों को हत्या करने वाले नक्सलियों को कुचलना आवश्यक है, किन्तु इससे भी अधिक आवश्यक है उस मानसिकता को कुचलना, उस विचारधारा को कुचलना जिससे नक्सलवाद का जन्म हुआ है और जो आज भी उसको पोषण व संरक्षण दे रही है। ये वही विचारधारा है, जो नक्सलियों को ‘भटके हुए नौजवान’ बताती है, जो बस्तर में सीआरपीएफ के जवानों की निर्मम हत्या के लिए नक्सलियों को नहीं बल्कि ऑपरेशन ग्रीन-हंट को ज़िम्मेदार ठहराती है और जिसे सीमा पर रोज़ मरने वाले भारतीय सैनिकों की नहीं, बल्कि आतंकियों के मानवाधिकारों की ज़्यादा चिंता है। ये वही विचारधारा है जिसके समर्थक भारतीय सेना के खिलाफ़ कश्मीर से मणिपुर तक आंदोलन करते हैं, जिसके समर्थकों को देश के सामान्य नागरिकों की नहीं, बल्कि आतंकियों के मानवाधिकारों की चिंता ज़्यादा सताती है और ये वही विचारधारा है जिसे नरेंद्र मोदी ‘5-स्टार एक्टिविस्टों की जमात’ कहते हैं!

Image courtesy: internalconflict.csa-chennai.org

आश्चर्य है कि ये बौद्धिक नक्सलवादी भारतीय सीमा में चीनी सेना के अतिक्रमण पर मौन रहते हैं, बांग्लादेशी घुसपैठियों द्वारा असम में किए जाने वाले नरसंहार पर मुंह नहीं खोलते, लेकिन किसी आतंकी के मारे जाने पर इसे भारतीय सेना की क्रूरता का उदाहरण मानते हैं। इनका तर्क है कि नक्सली ‘भटके हुए नौजवान’ हैं, जिन्हें आदिवासियों के साथ लगातार होते आए अन्याय और अत्याचार के कारण ‘मजबूरन’ बन्दूकें उठानी पड़ी हैं। लेकिन वे कभी ये नहीं बताते कि इन ‘भटके हुए नौजवानों’ के पास इतने आधुनिक हथियार, गोला-बारूद आदि कहाँ से आते हैं, इन्हें प्रशिक्षण कौन देता है और ‘मजबूरन उठाए गए’ उनके हथियारों का लक्ष्य कौन है? एक और तर्क ये दिया जाता है कि आदिवासी इलाकों में विकास न होना नक्सलवाद का कारण है। लेकिन वास्तविक धरातल पर नक्सलवादी ही विकास का विरोध करते दिखाई दे रहे हैं। नक्सल-प्रभावित क्षेत्रों में जब सड़कें बनाई जाती हैं, तो ये ‘भटके हुए नौजवान’ बारूदी सुरंगों से सड़कें उखाड़ देते हैं, निर्माण-कार्य में लगे मजदूरों को ‘मजबूरन’ डरा-धमका कर भगा दिया जाता है और काम बंद करा दिया जाता है। यदि नक्सल-आन्दोलन विकास की मांग को लेकर है, तब तो नक्सलियों को इन विकास-कार्यों में सहयोग देना चाहिए था!
बौद्धिक नक्सलवादियों का एक तर्क यह है कि इन ‘भटके हुए नौजवानों’ ने आदिवासियों को उनके अधिकार दिलाने के लिए ‘बन्दूकें’ उठाई हैं। लेकिन जिन आदिवासियों के अधिकारों की बात हो रही है, वे स्वयं भी इन नक्सलियों से त्रस्त हैं। उनके १३-१४ वर्ष आयु के बच्चों को स्कूल जाने से रोका जाता है और जबरन नक्सली दलों में शामिल कराया जाता है। इन दलों में युवतियों और महिलाओं का हर तरह से शोषण होने के आरोप भी लगते रहे हैं। लोकतंत्र में सत्ता से बड़ा अधिकार और क्या है? किन्तु ‘आदिवासियों के अधिकारों के लिए लड़ने वाले’ यही नक्सली आदिवासी क्षेत्रों में नागरिकों को अपने मताधिकार के प्रयोग से रोकने का प्रयास करते हैं और ग्राम-पंचायतों के सदस्यों को अपने पद छोड़ने पर मजबूर किया जाता है। वास्तविकता यह है कि इनका उद्देश्य शोषण को मिटाना या समानता लाना नहीं है, बल्कि भय का वातावरण बनाना, लोकतंत्र को समाप्त करना एवं अंततः भारत पर अधिकार कर लेना है। ये ‘भटके हुए नौजवानों’ का झुण्ड नहीं है, बल्कि भारत की संप्रभुता को चुनौती दे रही विदेशी शक्तियों के मोहरों का गिरोह है। इनके साथ वही व्यवहार होना चाहिए, जो सीमा-पार से हमला करने वाले किसी शत्रु के साथ किया जाता है।
इस हिंसक नक्सलवाद को कुचलना जितना आवश्यक है, उतना ही इसे पोषण, संरक्षण व समर्थन देने वाले बौद्धिक नक्सवाद को समाप्त करना भी आवश्यक है। ये बौद्धिक नक्सलवादी भारत के भीतर और भारत के बाहर लगातार इन हिंसक कृत्यों का बचाव करने और भारतीय सैन्य-बलों का मनोबल गिराने के कार्य में लगे रहते हैं। जिस तरह किसी पौधे के विकास के लिए उपयुक्त मिट्टी, पोषक खाद और अनुकूल वातावरण आवश्यक होता है, उसी तरह इस आतंक और हिंसा के इस नक्सल आंदोलन के लिए ये बौद्धिक नक्सलवादी अनुकूल व पोषक वातावरण बनाने का कार्य करते हैं। इसलिए नक्सल समस्या को नष्ट करने के लिए पहले बौद्धिक नक्सलवाद को कुचलना आवश्यक है। अभिव्यक्ति की असीमित स्वतंत्रता के नाम पर किसी भी व्यक्ति को इस राष्ट्र को कमज़ोर करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।

2 comments:

  1. आयातित विचारधारा का कमाल है...छत्तीसगढ़ के आदिवासियों के लिए आंध्रा के आतंकवादी लाये जाते हैं...और भारत निर्माण करने वालों में इतना माद्दा नहीं है कि वो इन दुर्बुद्धजीवियों को संभाल सके क्योंकि कांग्रेस के पास कोई अपना तो ऐसा विचारधारा आधार है नहीं...तो वे इन पर निर्भर हैं...।

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    1. आप ठीक कहते हैं!

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