Tuesday, May 28, 2013

कौन हैं वीर सावरकर?

28 मई 1883 को जन्मे विनायक दामोदर सावरकर एक अद्वितीय क्रांतिकारी महापुरुष हैं, जिनका पूरा जीवन एक अद्वितीय पराक्रम की शौर्य-गाथा है। लेकिन दुर्भाग्य है कि हममें से अधिकांश लोग आज भी उनके बारे में बहुत कम जानते हैं। सावरकर जी संपूर्ण राजनैतिक स्वतंत्रता को भारत का लक्ष्य निर्धारित करने वाले पहले राजनेता थे। वही पहले राजनेता थे, जिन्होंने पहली बार विदेशी वस्त्रों की होली जलाई। कर्ज़न वायली की हत्या के लिए मदनलाल धींगरा जो प्रेरित करने वाले व्यक्ति सावरकर जी ही थे। लंदन में उनकी गिरफ़्तारी ने ब्रिटिश न्यायालयों के लिए कठिनाई उत्पन्न कर दी थी और उनके मामले का उल्लेख आज भी फ़रार अपराधियों के अधिनियम और बंदी प्रत्यक्षीकरण की व्याख्या के लिए किया जाता है (रेक्स बनाम गवर्नर ऑफ़ ब्रिक्सटन प्रिज़न, एक्स-पार्टे सावरकर) इंग्लैंड में गिरफ़्तारी के बाद समुद्री-मार्ग से भारत लाए जाते समय वे जहाज से कूदकर भाग निकले और समुद्र में 32 मील तैरते हुए फ्रांस की भूमि पर पहुंच गए, जहां ब्रिटिश सैनिकों ने उन्हें पुनः गिरफ़्तार कर लिया। फ़्रांसीसी भूमि पर ब्रिटिश सैनिकों के प्रवेश को लेकर विवाद उत्पन्न हुआ और सावरकर जी ऐसे पहले राजनैतिक कैदी बन गए, जिनकी गिरफ़्तारी का मामला अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में चला।
सावरकर जी विश्व के पहले ऐसे राजनैतिक कैदी भी हैं, जिन्हें दो जन्मों के कारावास की सज़ा सुनाई गई थी, जो कि ब्रिटिश साम्राज्य के पूरे इतिहास में अद्वितीय मामला है। सज़ा सुनाए जाने पर सावरकर जी ने कहा था, “मुझे इस बात की प्रसन्नता है कि मुझे दो जन्मों के कारावास की सज़ा सुनाकर ब्रिटिशों ने हिन्दुओं के पुनर्जन्म के सिद्धांत को स्वीकार कर लिया है।” अंडमान में कालापानी की भीषण यातनाएं भी उन्हें तोड़ न सकीं। जेल में रहते हुए भी उन्होंने न केवल वहां के कैदियों को संगठित किया, बल्कि जेल प्रशासन द्वारा कैदियों के साथ होने वाले बर्बर व्यवहार का कड़ा विरोध भी किया, जिसके परिणामस्वरूप वहां अनेक सुधार हुए। उनकी पुस्तक ‘मेरा आजीवन कारावास’ में इसका विस्तृत वर्णन मिलता है।
क्रांतिकारी सावरकर जी के भीतर एक लेखक और कवि की आत्मा बसती थी। वे विश्व के पहले कवि हैं, जिन्होंने अंडमान की जेल में कागज़ और कलम के अभाव में भी अपनी कविताओं की रचना की और उन्हें कीलों व नाखूनों से जेल की दीवारों पर लिखा। उन्होंने वर्षों तक प्रयास करके अपने काव्य की दस हज़ार पंक्तियां स्वयं कंठस्थ कर लीं और जिन साथी कैदियों ने भी उन्हें याद कर लिया था, उनके माध्यम से अपनी काव्य-रचनाएं भारत तक पहुंचाई। लगभग 15 वर्षों तक अंडमान में रखने के बाद ब्रिटिश सरकार ने उन्हें महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले में नज़रबंद कर दिया। अपनी इस नज़रबंदी के दौरान सावरकर जी सामाजिक कार्यों में सक्रिय बने रहे। उन्होंने अस्पृश्यता को मिटाने का संकल्प लिया और इसके लिए अनेक कार्यक्रम आयोजित किए। उन्होंने ही रत्नागिरी में पतित-पावन मंदिर की स्थापना भी की थी, जहां अस्पृश्य कहे जाने वाले लोगों को भी प्रवेश का अधिकार मिला।
सन 1966 में सावरकर जी ने महसूस किया कि उनके जीवन का उद्देश्य अब पूरा हो गया है। तब उन्होंने   योग की उच्चतम परंपरा के अनुसार आत्म समर्पण  के द्वारा इच्छा-मृत्यु को स्वीकार किया और वे इस लोक से विदा हो गए।
ब्रिटिश शासन में तो उन पर अनेक अत्याचार हुए और अनेक प्रकार से उन्हें अपमानित भी किया जाता रहा, किन्तु भारत की स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद भी यह क्रम समाप्त नहीं हुआ। 1948 में गांधीजी की हत्या के मामले में सावरकर जी को भी आरोपी बनाया गया, किन्तु न्यायालय ने उन्हें ससम्मान बरी कर दिया। उनके जीवन-काल में और उसके बाद भी उन पर सांप्रदायिकता के आरोप लगते रहे हैं। कुछ छद्म-सेक्युलर मित्र तो यहाँ तक कहते हैं कि भारत-विभाजन के लिए जिन्ना नहीं, बल्कि सावरकर ही ज़िम्मेदार थे।
2004 में हुए लोकसभा चुनाव के बाद जब यूपीए की सरकार बनी और आदरणीय मणिशंकर अय्यर जी ने पेट्रोलियम मंत्रालय सँभाला तो उन्होंने अंडमान की सेल्यूलर जेल के बाहर लगी सावरकर जी की कविताओं को हटवाकर वहां महात्मा गांधी के वचनों का बोर्ड लगवा दिया। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि “जिन्ना और सावरकर में कोई अंतर नहीं है” (http://en.wikipedia.org/wiki/Mani_Shankar_Aiyar#Controversies)। संभवतः यह बोर्ड हटाने से सेक्युलरिज्म मज़बूत हुआ होगा।
किन्तु इतने विरोध, दुष्प्रचार और अपमान के बावजूद सावरकर जी आज भी लाखों लोगों के प्रेरणा-स्रोत हैं। उनके सम्मान में अंडमान के हवाई-अड्डे को उनका नाम दिया गया है। मुंबई के दादर में स्थित वीर सावरकर प्रतिष्ठान, उनके कार्यों की जानकारी देने वाली वेबसाइट www.savakar.org आदि अनेक स्रोत हैं, जिनके माध्यम से सावरकर जी के जीवन व कार्यों की जानकारी लोगों तक पहुंच रही है।
इतिहास में जो बीत गया, उसे बदला नहीं जा सकता। किन्तु इसमें कोई संशय नहीं है कि अपने जीवन, विचारों व कार्यों से सावरकर जी भारतीय इतिहास में अमर हो चुके हैं। मुझे विश्वास है कि आने वाली पीढ़ियां उनके कार्य को समझेंगी और सावरकर जी के प्रति आज तक किया गया अन्याय और अपमान एक दिन अवश्य दूर होगा।

2 comments:

  1. Excellent collection of information and brief presentation! best efforts!!
    Sudarshan Harshe

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