Tuesday, July 23, 2013

संघ और राजनीति


(श्री मा.गो.वैद्य के मराठी ब्लॉग पोस्ट का हिंदी अनुवाद)
'संघ और राजनीति' शीर्षक से लेख लिखने की प्रेरणा मुझे दिनांक 13 जून को प्रसिद्ध अंग्रेज़ी समाचार-पत्र 'इंडियन एक्सप्रेस' के सपादकीय लेख से मिली। 'इंडियन एक्सप्रेस' में छपे लेख का शीर्षक है "Coming Out"  हिंदी में इसका अनुवाद होगा 'प्रकटीकरण'। एक कारण और भी है। वो ये कि दिनांक 13 जून को ही Times Now चैनल के मुंबई के प्रतिनिधि मुझसे मिलने आए थे और उन्होंने भी 'संघ और राजनीति' इस विषय पर मुझसे बात की। आगामी रविवार को, अर्थात 16 (जून) तारीख को 'पॉलिटिक्स' शीर्षक के साथ 'टाइम्स नाऊ' पर एक घंटे की चर्चा प्रसारित होगी। उसी चर्चा के उद्देश्य से उन्होंने मुझसे बात की थी।

इस लेख का कारण
'इंडियन एक्सप्रेस' के संपादकीय लेख में निहित अर्थ ये है कि संघ को प्रत्यक्ष राजनीति में उतरना चाहिए। संघ को यह काल्पनिक कथा त्याग देनी चाहिए कि वह अराजनैतिक है। भाजपा के लिए नागपूर (अर्थात रा. स्व. संघ) ठीक वैसा ही है, जैसा काँग्रेस के लिए 10 जनपथ (अर्थात श्रीमती सोनिया गाँधी का निवासस्थान) है। संघ को उपदेश देने का अधिकार सभी को है। इसलिए 'इंडियन एक्सप्रेस' द्वारा यह लेख लिखा जाना गलत नहीं है। किन्तु उन्हें विचारपूर्वक इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि इस उपदेश से, संघ के संबंध में उनका अज्ञान और भ्रम ही प्रकट हो रहा है, इसीलिए मैं यह लेख लिख रहा हूँ।

'राष्ट्र' का अर्थ
यह सही है कि संघ अर्थात राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का सच्चा स्वरूप समझ पाना थोड़ा कठिन है। इसका कारण ये है कि सार्वजनिक जीवन में कार्यरत जो विभिन्न संगठन हैं, उनके दायरे में संघ नहीं आता। लोगों का ध्यान इस बात पर नहीं जाता कि संघ संपूर्ण समाज का संगठन है, यह समाज के भीतर एक संगठित गुट नहीं है। समाज मिश्रित (complex) होता है अर्थात समाज जीवन के विविध क्षेत्र होते हैं। राजनीति अथवा राजनैतिक क्षेत्र उन्हीं में से एक क्षेत्र है। एकमात्र क्षेत्र नहीं है। धर्म, शिक्षा, अर्थ, श्रम, उद्योग, कृषि, स्वास्थ्य, विज्ञान, साहित्य आदि अनेक क्षेत्र हैं। इसी प्रकार वनवासी, मजदूर, विद्यार्थी, शिक्षक, अधिवक्ता, डॉक्टर-वैद्य आदि हमारे समाज के विभिन्न घटक हैं। संपूर्ण समाज के संगठन का अर्थ है, समाज के सभी क्षेत्रों व सभी घटकों का संगठन। यही राष्ट्रीय संगठन है। राष्ट्र का अर्थ केवल राज्यव्यवस्था नहीं होता है। राष्ट्र का अर्थ है, लोग। People are the Nation यह तो सभी को ज्ञात ही है।

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद
संघ की इस बारे में कुछ निश्चित धारणाएं हैं कि राष्ट्र किस लोकसमूह से मिलकर बनता है। प्रमुख धारणाएं तीन हैं। (1) हम जिस देश में रहते हैं, उस भूमि के बारे में हमारी भावना, (2) अपने पूर्वजों के बारे में हमारा ज्ञान और उनसे हमारा संबंध तथा उस लोकसमूह के इतिहास को अपना इतिहास मानने की भावना। ऐसा नहीं है कि इतिहास में सभी प्रसंग केवल विजय व अभिमान के ही होते हैं। पराजय और लज्जा के प्रसंग भी होते हैं। किन्तु सभी को ये महसूस होना चाहिए कि वे हमारे यश-अपयश और अभिमान-लज्जा के प्रसंग हैं तथा (3) सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सही-गलत का निर्धारण करने का समाज का मापदंड; अर्थात उसकी मूल्य-प्रणाली (Value System)। यह मूल्य-प्रणाली ही संस्कृति है; और संघ इसी को अपनी राष्ट्रीयता का आधार मानता है, इसीलिए हम कहते हैं कि यह हमारा राष्ट्रवाद है। ऊपर वर्णित तीन धारणाओं को धारण करने वाले लोगों के लिए प्रचलित नाम 'हिन्दू' होने के कारण यह हिन्दू राष्ट्र है। हिन्दू कोई रिलिजन या मजहब नहीं है। यह एक महासागर है, जो अपने भीतर अनेक रिलिजनों को समाये हुए है। डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने या किसी और ने यह कहा है कि Hinduism is not a religion, it is a commonwealth of many religions  हम 'धर्म' शब्द का अनुवाद 'रिलिजन' के रूप में करते हैं और इसी कारण अत्यधिक वैचारिक भ्रम उत्पन्न होता है। हमारे दैनिक उपयोग के कुछ शब्दों पर विचार करें, जैसे धर्मशाला, धर्मार्थ चिकित्सालय, धर्मकांटा, राजधर्म, पितृधर्म आदि और इन सभी शब्दों में आने वाले 'धर्म' शब्द के स्थान पर 'रिलिजन' या 'रिलिजस' शब्द का उपयोग करके देखिए कि यह कितना हास्यास्पद लगता है और इसका आनंद लीजिए।

अर्नेस्ट रेनाँ का प्रतिपादन
यहाँ मैं फ्रांसीसी लेखक अर्नेस्ट रेनाँ का एक वाक्य उद्धृत करना चाहूँगा। वह वाक्य इस प्रकार है।

"The soil provides the substratum, the field for struggle and labour, man provides the soul. Man is everything in the formation of this sacred thing that we call a people. Nothing that is material suffices here. A nation is a spiritual principle, the result of the intricate workings of history, a spiritual family and not a group determined by the configuration of the earth."

रेनाँ ने आगे कहा है-

"Two things which are really one go to make this soul or spiritual principle. One of these things lies in the past, the other in the present. The one is the possession in common of a rich heritage of memories and the other is actual agreement, the desire to live together and the will to make the most of the joint inheritance. Man cannot be improvised. The nation like the individual is the fruit of a long past spent in toil, sacrifice and devotion."

तात्पर्य यह है कि संघ का संबंध संपूर्ण राष्ट्रनीति से है; और राजनीति भी राष्ट्रनीति का एक भाग होने के कारण संघ का संबंध राजनीति से भी है। यह संबंध आज से नहीं है। बहुत पुराना है। संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार संघ की स्थापना के बाद 1930 में जंगल सत्याग्रह में सहभागी हुए और कारवास की सजा भुगती; और आपातकाल हटाने के लिए जो विशाल सत्याग्रह हुआ था, उस सत्याग्रह में संघ ने अर्थात संघ के स्वयंसेवकों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था। ये दोनों ही राजनैतिक आंदोलन थे। लेकिन उनका संबंध राष्ट्रजीवन से था।

विशिष्ट कार्यपद्धति
लेकिन संघ की एक विशिष्ट कार्यपद्धति है। संघ को जिस क्षेत्र में संगठन की आवश्यकता महसूस होती है, उस क्षेत्र में वह अपने कार्यकर्ताओं को भेजता है। कुछ क्षेत्रों के मामले में पहल दूसरों ने की थी और संघ ने उन्हें अपने कुछ कार्यकर्ता दिए। भारतीय जनसंघ की स्थापना डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने की थी। संघ ने उसके लिए पं. दीनदयाल उपाध्याय, अटलबिहारी वाजपेयी, नानाजी देशमुख, सुंदरसिंग भंडारी, कुशाभाऊ ठाकरे, डॉ. महावीर आदि श्रेष्ठ कार्यकर्ता दिए। इनमें से डॉ. महावीर के अतिरिक्त अन्य सभी लोग संघ के पूर्णकालिक प्रचारक थे। डॉ. मुखर्जी की अकाल मृत्यु के कारण, पार्टी को चलाने और बढ़ाने का उत्तरदायित्व इन्हीं लोगों पर आ पड़ा और उन्होंने उस भली-भांति निभाया। 1977 में जनता पार्टी में जनसंघ के विलय के साथ ही जनसंघ एक प्रकार से समाप्त ही हो गया। किन्तु जनता पार्टी के कार्यकर्ता संघ के स्वयंसेवक नहीं रह सकते, ऐसा मुद्दा पार्टी में उछाले जाने के कारण, वे स्वयंसेवक जनता पार्टी से बाहर आ गए, जो संघ से अपना संबंध बनाए रखना चाहते थे और 1980 में उन्होंने भारतीय जनता पार्टी की स्थापना की। जनता पार्टी से बाहर निकलकर भाजपा की स्थापना के लिए पहल करने वाले संघ के स्वयंसेवक थे। संघ की कार्यपद्धति की विशेषता यह है कि विभिन्न क्षेत्रों के कार्यकर्ताओं को ही अपने-अपने क्षेत्र का संचालन करना चाहिए और कार्य को बढ़ाना चाहिए। इस दृष्टि से देखा जाए, तो वे क्षेत्र स्वतंत्र एवं स्वायत्त हैं। अर्थात उनका स्वतंत्र संविधान होता है। संस्था के लिए आवश्यक धन एकत्र करने की उनकी अपनी पद्धति होती है। कोई भी क्षेत्र धन के लिए संघ पर निर्भर नहीं होता है।
मुझे इस बात का अहसास है कि अन्य क्षेत्रों की चर्चा यहाँ अप्रासंगिक होगी। किन्तु, मैं यह बताना आवश्यक समझता हूँ कि वनवासी कल्याण आश्रम की स्थापना श्री बालासाहब देशपांडे ने की थी, जो कि सरकारी अधिकारी थे। प्रारंभ में उन्हें संघ ने दो कार्यकर्ता दिए थे। भारतीय मजदूर संघ की स्थापना दत्तोपंत ठेंगडी ने की थि, जो कि संघ के कार्यकर्ता थे; जबकि विश्व हिन्दू परिषद की स्थापन में तत्कालीन सरसंघचालक श्री मा. स. गोलवलकर उपाख्य श्रीगुरुजी ने स्वयं पहल की थी। किन्तु वे विहिप के अध्यक्ष नहीं बने। पद के आकर्षण से कार्य प्रारंभ करने वालों को यदि श्रीगुरुजी का यह व्यवहार विचित्र और समझ से परे लगे, तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

स्वतंत्र और स्वायत्त
संघ क्या करता है? प्रारंभ में वह एक कार्यकर्ता या अनेक कार्यकर्ता देता है। वे कार्यकर्ता, अपने-अपने क्षेत्र में स्वायत्त रूप से कार्य करते रहते हैं। यदा-कदा संघ से परामर्श लेते ही हैं। संघ की अ. भा. प्रतिनिधि सभा में इन सभी क्षेत्रों के प्रतिनिधि उपस्थित रहते हैं। किन्तु इससे यह अर्थ लगाना गलत है कि संघ ही इन पदाधिकारियों का चयन करता है। यह राजनैतिक दल ही तय करता है कि उसका पदाधिकारी कौन हो? इन पदाधिकारियों में संघ द्वारा अधिकृत रूप से भेजा गया कार्यकर्ता भी हो सकता है। किन्तु निर्णय उस विशिष्ट संगठन द्वारा ही किया जाता है। किस चुनाव क्षेत्र से लोकसभा का उम्मीदवार कौन हो, ये संघ नहीं बताता। किस राज्य में भाजपा का अध्यक्ष कौन हो, यह भी संघ तय नहीं करता। 'इंडियन एक्सप्रेस' के विद्वान संपादक पहले ये बताएं कि क्या 10 जनपथ भी ऐसा ही करता है और इसके बाद ही संघ से तुलना करें।
किसी विशिष्ट मुद्दे के संदर्भ में, विभिन्न क्षत्रों के लोग संघ के अधिकारियों से परामर्श लेते हैं। किन्तु निर्णय वे ही करते हैं। संघ की अपेक्षा केवल इतनी होती है कि वह विशिष्ट संगठन राष्ट्र को स्वयं से ऊपर माने। अर्थात समाज को और समाज की मूल्य-प्रणाली को श्रेष्ठ माना जाना चाहिए। आप चाहे इसे सही मानें या गलत, किन्तु संघ यह बताता है कि व्यक्ति श्रेष्ठ नहीं है, संगठन श्रेष्ठ है और संगठन से भी अधिक श्रेष्ठ राष्ट्र है। संघ में यही पद्धति प्रचलित है। इसीलिए संघ में 'डॉ. हेडगेवार की जय' या 'श्रीगुरुजी की जय' जैसे नारे नहीं हैं। संघ का एक ही घोषवाक्य है और वो है 'भारत माता की जय'। मुझे लगता है कि इसका आशय समझना कठिन नहीं होना चाहिए।

आडवाणी प्रसंग
अभी हाल का प्रसंग श्री लालकृष्ण आडवाणी के त्यागपत्र का है। उनके त्यागपत्र का वास्तविक कारण वे ही बता सकेंगे। अपने त्यागपत्र के साथ भेजे पत्र में उन्होंने पार्टी से कुछ अपेक्षाएं व्यक्त की हैं। वे अपेक्षाएं ठीक ही हैं। उनको त्यागपत्र अचानक आने के कारण सभी को अचंभा हुआ ही था। सरसंघचालक जी को भी हुआ होगा। मेरे पास यह जानकारी है कि भाजपा के ही किसी वरिष्ठ नेता ने सरसंघचालक जी को इस बात की जानकारी दी और अनुरोध किया कि सरसंघचालक जी को आडवाणी जी से बात करनी चाहिए। पहले किसने फोन मिलाया? आडवाणीजी ने या भागवतजी ने?-ऐसा प्रश्न पूछना निरर्थक है। भाजपा में संकट उत्पन्न हुआ है और वह दूर होना चाहिए ऐसा भाजपा के सभी शुभचिंतकों को लगना स्वाभाविक ही है। अन्यथा भाजपा के संसदीय दल ने आडवाणीजी का त्यागपत्र तुरंत ही स्वीकार कर लिया होता और प्रश्न वहीं समाप्त हो जाता। किन्तु उनका त्यागपत्र अस्वीकार कर दिया गया। क्योंकि निश्चित रूप से उन्हें ऐसा लगा होगा कि आडवाणीजी जैसे वयोवृद्ध, अनुभवसमृद्ध, वरिष्ठ नेता को पार्टी में बने रहना चाहिए और यही सोचकर उनमें से किसी ने सरसंघचालकजी से अनुरोध किया होगा। इसमें गलत क्या है? अपने कार्यकर्ताओं द्वारा चलाए जा रहे कार्य अच्छी तरह चलते रहें, उनके बीच मतभेद भले ही हो, किन्तु मनभेद नहीं होना चाहिए, क्या ऐसा लगना स्वाभाविक नहीं है?

संघ का निश्चय
'इंडियन एक्सप्रेस' के संपादकों ने यह उपदेश दिया है कि संघ को प्रत्यक्ष राजनीति में उतरना चाहिए। किन्तु संघ इस उपदेश को नहीं मानेगा। क्योंकि उसे राजनीति के बजाय राष्ट्रनीति अधिक महत्वपूर्ण लगती है; और संघ की अपेक्षा यह है कि राजनीति को भी राष्ट्रनीति की श्रेष्ठता स्वीकार करनी चाहिए। चुनावी राजनीति में उतरने से संघ को कोई भी रोक नहीं सकता। किन्तु संघ की भूमिका और निश्चय यही है कि उसे राजनीति, जो कि समाज-जीवन का एक क्षेत्र है, से एकरूप नहीं होना है। अपने शास्त्रों में आत्मतत्व या प्राणतत्व का संपूर्ण ऐहिक जीवन से जो और जैसा संबंध रहता है, वैसा ही संघ का इन सभी क्षेत्रों से संबंध है। इसलिए संघ इन सभी क्षेत्रों से संबद्ध है भी और संबद्ध नहीं भी है। ईशोपनिषद में आत्मतत्व के इस ऊपरी तौर पर विरोधाभासी लगने वाले व्यवहार का वर्णन इस प्रकार किया गया है-
तदेजति तनैजति। तद् दूरे तद्वन्तिके।
तदन्तरस्य सर्वस्य। तदु सर्वस्यास्य बाह्यत:।
इस मंत्र का सरल अर्थ इस प्रकार है- "उसमें सक्रियता होती है, और उसमें सक्रियता नहीं होती है। वह दूर है और वह पास है। वह सभी के भीतर है और वह सभी के बाहर है।"
अपने नाम के प्रथम शब्द "राष्ट्रीय" के अनुरूप ही संघ राष्ट्रजीवन के आत्मतत्व या प्राणतत्व के समान है।
-मा. गो. वैद्य
नागपूर
दि. 14-06-2013
babujivaidya@gmail.com
(मूल पोस्ट: http://mgvaidya.blogspot.in/2013/06/blog-post.html)

Friday, July 19, 2013

भारतीय जनता पार्टी की केन्द्रीय चुनाव अभियान समिति


श्री अटल बिहारी वाजपेयी, श्री लालकृष्ष्ण आडवाणी एवं श्री राजनाथ सिंह के मार्गदर्शन में व श्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में निम्न रहेगी:-
1. श्री (डॉ.) मुरली मनोहर जोशी
2. श्री वैंकैंया नायडू
3. श्री नितिन गडकरी
4. श्रीमती सुषमा स्वराज
5. श्री अरूण जेटली
6. श्री अनत कुमार
7. श्री थावरचंद गहलोत
8. श्री रामलाल
9. श्री शिवराज सिंह चौहान
10. श्री (डॉ.) रमन सिंह
11. श्री मनोहर परिकर

भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री राजनाथ सिंह तथा केन्द्रीय चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा चुनाव अभियान की दृष्टि से विभिन्न समितियाँ व उनके नाम घोषित किये हैं, जो निम्नानुसुसार हैं:-
1. घोषणा पत्र: अध्यक्ष - डॉ. मुरली मनोहर जोशी
सदस्य - श्री जसवंत सिंह, श्री यशवंत सिन्हा, श्री प्रेम कुमार धूमल, श्री सुशील कुमार मोदी, श्री जुएल उराव, प्रो. विजय कुमार मल्होत्रा, प्रोलक्ष्मीकान्ता चावला, श्री सत्यपाल मलिक, श्री बंडारु दत्तात्रेय, श्रीमती विजया चक्रवर्ती, श्री सत्यनारायण जटिया, श्री शाहनवाज हुसैन, श्री महेश चन्द्र शर्मा, श्री कंचन गुप्ता, श्री षणमुखनाथन।
2. विज़न डॉक्यूमेंट: श्री नितिन गड़करी,श्री ओम प्रकाश कोहली, श्री विनय सहस्त्रबुद्धे, प्रो. हरी बाबू।
3. प्रचार एवं प्रसिद्धि समिति: श्रीमती सुषमा स्वराज, श्री अरूण जेटली, श्री अमित शाह, डॉ. सुधाँशु त्रिवेदी।
4. रैलियाँ: श्री अनतं कुमार, श्री वरुण गाँधी।
5. संसदीय सम्मेलन: श्री थावरचंद गेहलोत, श्री जे.पी. नड्डा, श्री पुरुषोत्तम रुपाला, श्री विनोद पांडे, श्री एल. गणेशन।
6. वर्गवार सम्मेलन: श्री मुरलीधर राव, श्री विनय कटियार, श्री श्याम जाजू, श्री कृष्ण दास, श्रीमती लुईस मरांडी, श्री विजय सोनकर शास्त्री, श्री महेन्द्र पाण्डेय। (सभी मोर्चों व प्रकोष्ठों के संयोजकों का सहयोग रहेगा।)
7. नव-मतदाता अभियान: श्री अमित शाह, श्री नवजोत सिंह सिद्धू, श्री त्रिवेन्द्र रावत, श्रीमती पूनम महाजन।
8. पारंपरिक अभियान: श्रीमती स्मृति ईरानी, कै. अभिमन्यू, सुश्री वाणी त्रिपाठी।
9. बुद्धिजीवी सम्मेलन व Friends of BJP: श्री राजीव प्रताप रुडी, श्री प्रकाश जावेडकर, डॉ. तमिल ईसाई
10. विशेष संपर्क अभियान: श्री नितिन गडकरी, सुश्री उमा भारती, डॉ. सी.पी. ठाकुर, डॉ. जे.के जैन, श्रीमती मृदला सिन्हा, श्री कलराज मिश्र, श्रीमती किरण माहेश्वरी।
11. चुनावी संगठन: श्री रामलाल, श्री वी. सतीश, श्री सौदान सिंह।
12. कांग्रेस UPA के खिलाफ आरोप पत्र: श्री गोपीनाथ मुंडे, श्री रविशंकर प्रसाद, श्रीमती आरती मेहरा, श्री किरीट सोमैया, श्रीमती निर्मला सीतारमन, श्रीमती मिनाक्षी लेखी।
13. Information Communication Campaign: श्री पीयूष गोयल (IT & Communication Cell का सहयोग रहेगा)
14. जन समीक्षा और जन भागीधारी: श्री धर्मेन्द्र प्रधान, श्री रामेश्वर चैरसिया, श्री मनोहर लाल खट्टर, श्री नलिन कोहली।
15. साहित्य निर्माण: श्री बलबीर पुंज, श्री प्रभात झा, श्री विनय सहस्त्रबुद्धे, श्रीमती सुधा मलैया।
16. कार्यक्रम और यातायात: श्री मुख्तार अब्बास नक्वी, डॉ. अनिल जैन, श्री अरुण सिंह।
17. उत्तर-पूर्व अभियान: श्री एस.एस. अहलवालिया, श्री तापिर गावं, श्री पद्मनाभ आचार्य, श्री किरन रिज्जू।
18. चुनाव आयोग और कानून संबंधी: श्री सतपाल जैन, श्री भूपेन्द्र यादव, श्री रामकृष्ण, श्रीमती पिंकी आनंद।
19. बूथ समिति संकलन: श्री राजीव प्रताप रुडी, श्रीमती सुधा यादव, श्रीमती रेणु कुशवाहा।
20. विशेष:
  • रैलियाँ, संसदीय सम्मेलन, बुद्धिजीवी सम्मेलन व Friends of BJP विभागों का मार्गदर्शन श्रीवेंकैया नायडू करेंगे।
  • विज़न डाक्यूमेंट व विशेष संपर्क के साथ वर्गवार सम्मेलन व नव-मतदाता अभियान का मार्गदर्शन श्री नितिन गडकरी करेंगे।
भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री राजनाथ सिंह द्वारा श्री नितिन गडकरी को दिल्ली प्रदेश विधानसभा चुनाव की ओर विशेष ध्यान देने के लिए नियुक्त किया है। श्री नवजोत सिंहं सिद्धू उनका सहयोग करेंगे।
(स्त्रोत: twitdoc.com/26VU)