Saturday, September 28, 2013

क्या सचमुच “राइट टू रिजेक्ट” से बहुत बड़ा परिवर्तन आएगा?


27 सितंबर 2013 को कई उत्साही मित्र फेसबुक और ट्विटर पर दिन भर यह चर्चा करते रहे कि सुप्रीम कोर्ट ने अब भारत के मतदाताओं को “राइट टू रिजेक्ट” का जो अधिकार दिया है, उससे देश में बहुत बड़ा राजनैतिक परिवर्तन होने वाला है

निश्चित रूप से ये भारत के लोकतांत्रिक और चुनावी इतिहास का एक महत्वपूर्ण निर्णय हो सकता है, लेकिन क्या सचमुच इससे एक बहुत बड़ा परिवर्तन आने वाला है? यह समझने के लिए मैंने इस निर्णय का पूरा विवरण सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट से प्राप्त किया और पढ़ा।

मैं कानूनी बारीकियां नहीं समझ सकता, लेकिन अपनी सामान्य बुद्धि से मेरी समझ में जो आया है, वह मैं यहाँ लिख रहा हूँ। अन्य बातों और निष्कर्षों पर आप स्वयं विचार करें और मुझे भी बताएँ:
  1. न्यायालय ने कहा है कि जिस तरह चुनाव में किसी उम्मीदवार को वोट देना एक मतदाता का अधिकार है, उसी तरह किसी भी उम्मीदवार को वोट न देना (right to vote and right not to vote) भी मतदाता का अधिकार है। प्रत्येक मतदाता यह तय करने के लिए स्वतंत्र है कि वह किस उम्मीदवार के पक्ष में मतदान करना चाहता है और उसी तरह वह यह तय करने के लिए भी स्वतंत्र है कि वह किसी उम्मीदवार को अपना मत नहीं देना चाहता।
  2. भारतीय संविधान और चुनाव नियमों के अनुसार यह अधिकार हम मतदाताओं को बहुत पहले
    (Image Source: http://www.orthodoxherald.com)
    से प्राप्त है। बात केवल इतनी है कि हममें से अधिकांश लोग इसके बारे में नहीं जानते थे।
  3. अभी तक के नियम के अनुसार यदि कोई मतदाता अपना वोट किसी उम्मीदवार को नहीं देना चाहता है, तो वह मतदान केन्द्र पर जाकर पीठासीन अधिकारी को इसकी सूचना दे सकता है। तब निर्वाचन अधिकारी एक रजिस्टर में मतदाता का नाम दर्ज करते हैं और इस पर मतदाता के हस्ताक्षर/अंगूठे का निशान लिया जाता है, जिससे यह दर्ज हो जाता है कि मतदाता ने किसी भी उम्मीदवार को वोट न देने का निर्णय लिया है।
  4. मतदान करने या न करने के अधिकार के साथ ही, प्रत्येक मतदाता का ये भी अधिकार है कि उसका वोट गुप्त रखा जाए। लेकिन, इस तरह रजिस्टर में नाम दर्ज करने पर उसके गुप्तता के अधिकार का हनन होता है क्योंकि ऐसा करने से पता चल जाता है कि उस मतदाता ने किसी उम्मीदवार को वोट नहीं दिया है। न्यायालय ने माना है कि इस अधिकार की रक्षा की जानी चाहिए।
  5. यदि मतदाता मतदान केन्द्र के लिए न जाए, तो भी उसका मत नहीं दर्ज होता, लेकिन ऐसी स्थिति में यह संभावना भी रहती है कोई अन्य व्यक्ति उस मतदाता के नाम से फर्जी मतदान कर दे। इसे रोकने के लिए यह आवश्यक है कि प्रत्येक मतदाता अपने वोट देने (या न देने) के अधिकार का उपयोग करे।
  6. पारंपरिक पेपर-बैलट (मतपत्र) से होने वाले चुनाव में मतदाता के पास इस गुप्तता को बनाए रखते हुए भी किसी को मतदान न करने का एक तरीका था। वह तरीका ये है कि मतदाता बूथ पर जाए, किन्तु निर्वाचन अधिकारी को ये न बताए कि वह किसी उम्मीदवार को वोट नहीं देना चाहता। इसके बजाए वह किसी भी उम्मीदवार के पक्ष में मुहर लगाए बिना, खाली पर्ची मतपेटी में डाल सकता था, जिससे मतगणना के समय उसका वोट न गिना जाए।
  7. लेकिन इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन में ऐसा कोई विकल्प नहीं है क्योंकि मतदाता को कोई न कोई बटन दबाना अनिवार्य है। यदि बटन न दबाए, तो पता चल जाता है कि मतदाता ने वोट नहीं डाला है।
  8. इसलिए न्यायालय ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया है कि इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों में उम्मीदवारों की सूची के नीचे अंत में NOTA (None of the Above/उपरोक्त में से कोई नहीं) का विकल्प दिया जाना चाहिए, ताकि जो मतदाता किसी भी उम्मीदवार के लिए मतदान नहीं करना चाहते, वे ऐसा कर सकें
  9. इसके द्वारा मतदाता का निर्णय गुप्त बना रहेगा और साथ ही उसके नाम पर किसी अन्य व्यक्ति द्वारा फर्जी मतदान कर देने की संभावना भी नहीं रहेगी।
  10. लेकिन इस निर्णय में ऐसा कोई उल्लेख कहीं नहीं है कि “राइट टू रिजेक्ट” का उपयोग करने वाले मतदाताओं की संख्या चुनाव परिणाम पर भी प्रभाव डालेगी। मतगणना के समय केवल उन्हीं मतों को गिना जाएगा, जो किसी उम्मीदवार को मिले हैं, “राइट टू रिजेक्ट” वाले वोटों की गिनती नहीं होगी। इसलिए जीत-हार अभी भी उसी उम्मीदवार की होगी, जिसे सबसे ज़्यादा वोट मिलेंगे।
क्या अभी भी आपको लगता है कि इस नए विकल्प से राजनैतिक व्यवस्था में कोई बहुत बड़ा परिवर्तन आने वाला है? कृपया अपनी राय दें...

8 comments:

  1. सर्वोच्च न्यायालयाचा नकाराधिकाराचा निर्णय निरुपयोगी म्हणावा इतका कुचकामी आहे. या तरतुदीमुळे व्यवस्थेत सकारात्मक बदल होतील असे मानणे हा बालिशपणा आहे.

    http://www.loksatta.com/sampadkiya-news/supreme-court-gives-right-to-reject-power-to-voters-208751/

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    1. मी तुमच्या विचारांशी सहमत आहे...

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  2. dekhiye aisa hona chaahie ki jahaan nakaaraatmak maton kee sankhya adhik ho, vahaan chunaav nirast kar dobaaraa karaae jaaen, naheen to ye bhee dhaak ke teen paat hee rahega

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    1. आपकी टिप्पणी के लिए धन्यवाद! मेरा आशय यही था कि वर्तमान स्वरूप में इस "राइट टू रिजेक्ट" से कुछ हासिल होने वाला नहीं है.

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  3. अगर इसे वास्तविक राइट टू रिजेक्ट अधिकार की दिशा में एक कदम माना जाए तो इसे एक अच्छी शुरुआत कहा जा सकता है...लेकिन इस शुरुआत का सही उपयोग तभी होगा जब वोटों का गिनती का परिणाम बताते समय इस "उपरोक्त में से कोई नहीं" विकल्प को चुनने वालों की संख्या को भी बताया जाये।

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    1. मैं तो ये मानता हूँ कि ऐसा कोई क़ानून आना ही चाहिए, जो "उपरोक्त मेरे से कोई नहीं" चुनने वालों की संख्या ज्यादा हो जाने पर चुनाव को निरस्त करवा दे. मैं राइट टू रिजेक्ट और राइट टू रीकॉल दोनों का विरोधी हूँ.

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  4. सुमंत जी आपका आलेख पढ़ा ,वर्तमान में यह चर्चा प्रासंगिक है ,प्रभाव नहीं पढने वाला यह तथ्य तो सर्व विदित है ,यहाँ विचार केवल इस बात का है की यदि ऐसे मतों की संख्या भी बताई जाये उन पर गौर किया जाये तो टिकिट की मारा मारी ,निर्धारण में पार्टियों को सोचने और बताने का मौकाभविष्य में मिलेगा !

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    1. श्री महेशजी, टिप्पणी के लिए आपका आभार. मैं सहमत हूँ कि यदि ऐसे मतों की संख्या भी बताई जाए, या उनके आधार पर कोई चुनाव रद्द होने लगे, तभी इसका कोई प्रभाव होगा. लेकिन ये भी सही है कि अधिकाँश लोगों को इस NOTA के वर्तमान स्वरूप की कोई जानकारी नहीं है. वे यही मानकर चल रहे हैं कि NOTA का बटन दबाकर वे गलत उम्मीदवार को आने से रोक सकते हैं, जबकि ऐसा नहीं है. सही ये है कि गलत उम्मीदवार को रोकने का फिलहाल एक यही तरीका है कि सही उम्मीदवार को वोट दिया जाए.
      और व्यक्तिगत रूप से मैं राइट टू रिजेक्ट और राइट टू रीकॉल जैसे प्रावधानों के खिलाफ़ हूँ.

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