Wednesday, November 26, 2014

क्या आप इन्हें पहचानते हैं?

क्या आप इन्हें पहचानते हैं? नहीं?चलिए, मैं इनका नाम बता देता हूँ…
ये हैं श्री तुकाराम ओम्बले….क्या आपने इन्हें अब भी नहीं पहचाना?
कोई बात नहीं…आप “अजमल कसाब” को तो ज़रूर पहचानते होंगे??
बहुत अच्छे….कितने अफसोस की बात है कि इस देश में कसाब को हर कोई जानता है, लेकिन ज्यादातर लोगों ने तुकाराम ओम्बले का नाम भी नहीं सुना…आइये मैं आपको उनके बारे में कुछ बताऊँ..
26 नवंबर 2008 को जब आतंकियों ने मुंबई पर हमला किया, तो मुंबई पुलिस के सहायक सब-इन्स्पेक्टर,48 वर्षीय श्री तुकाराम ओम्बले, नाइट ड्यूटी पर थे. लेपर्ड कैफे, ओबरॉय और होटल ताज में गोलीबारी की खबरें मिलने पर मुंबई पुलिस हरकत में आ चुकी थी. ओम्बले के वरिष्ठ अधिकारियों ने उन्हें मरीन ड्राइव में पोजीशन लेने को कहा. रात लगभग 12:45 बजे, उन्हें वॉकी-टॉकी पर चेतावनी संदेश मिला कि दो आतंकियों ने एक स्कॉडा कार को हाइजैक कर लिया है और वे गिरगाँव चौपाटी की ओर बढ़ रहे हैं. कुछ ही मिनटों बाद ओम्बले ने उस कार को गुज़रते हुए देखा.
ओम्बले ने तुरंत अपनी बाइक पर सवार होकर उस कार का पीछा किया. डीबी मार्ग पुलिस थाने की के टीम चौपाटी सिग्नल पर बैरिकेड लगाने की तैयारी कर रही थी.जैसे ही वह कार सिग्नल के पास पहुंची, आतंकियों ने पुलिस टीम पर अंधा-धुंध गोलीबारी शुरू कर दी, लेकिन बैरिकेड के कारण उन्हें कार की स्पीड कम कर देनी पड़ी. अपनी बाइक पर सवार ओम्बले ने कार को ओवरटेक किया और उसके सामने आकार बाइक रोक दी, जिसके परिणामस्वरूप ड्राइवर को कार दायीं ओर मोड़नी पड़ी और वह जाकर डिवाइडर से टकरा गई. एक पल के लिए आतंकी भौंचक्के रह गए. इस बात का लाभ उठाते हुए ओम्बले उनमें से एक की ओर झपटे और अपने दोनों हाथों से उसकी एके 47 राइफल का बैरल पकड़ लिया. वह आतंकी था- अजमल कसाब. बैरल को ओम्बले की ओर घुमाते हुए कसाब ने ट्रिगर दबा दिया, जिससे ओम्बले के पेट में गोलियाँ लगीं और वे ज़मीन पर गिर पड़े. लेकिन इसके बावजूद जब तक उनमें होश बाकी था, उन्होंने बन्दूक नहीं छोड़ी.”
शायद अब आप पहचान गए होंगे कि तुकाराम ओम्बले कौन हैं? तुकाराम ओम्बले मुंबई पुलिस के उस जांबाज़ सिपाही का नाम है, जिसने अपने प्राणों की आहुति देकर हम जैसे अनेकों की जिंदगी बचाई और जिसके कारण कसाब को जीवित पकड़ा जा सका.
क्या आप जानते हैं कि आज उनका परिवार कहाँ रहता है? क्या आप जानते हैं कि उनके परिवार-जन क्या काम करते हैं?शायद ये सब सोचने-जानने की फुर्सत हममें से किसी के पास नहीं है!!
लेकिन कम से कम एक बार तुलना करके देखिए कि भारत सरकार ने ओम्बले के परिवार को आर्थिक सहायता देने के लिए और आतंकी कसाब की सुरक्षा पर कितना खर्च किया?क्या इस पर हमें शर्म महसूस नहीं होनी चाहिए?
अफसोस है कि जिस वीर का नाम इतिहास के पन्नों में स्वर्णाक्षरों में लिखा जाना चाहिए था, ताकि भावी पीढियाँ उनसे प्रेरणा ले सकें, हम उनका नाम तक नहीं जानते. शहीद ओम्बले का जीवन और उनका बलिदान इस बात का प्रमाण है कि एक सामान्य व्यक्ति भी देश के लिए क्या कुछ कर सकता है.
अपनी इस अद्भुत वीरता और पराक्रम के लिए श्री तुकाराम ओम्बले को ‘अशोक-चक्र’ से सम्मानित किया गया. स्थानीय भाजपा सांसद श्री मंगल प्रभात ने ओम्बले के सम्मान में एक स्मारक भी बनवाया है, जो मुठभेड़ स्थल के निकट सड़क किनारे बना हुआ है. इस वर्ष 26 नवंबर को गिरगाँव चौपाटी पर ओम्बले की कांस्य प्रतिमा का भी अनावरण होगा.
कसाब का नाम देश के बच्चे-बच्चे को याद करवाने और उसकी हर छोटी से छोटी बात का प्रचार करने में व्यस्त मीडिया चैनलों के पास तो इतना समय नहीं है कि वे ऐसे देशभक्त बलिदानियों के बारे में देश को कुछ बताएँ. लेकिन क्या आप और हम भी इतने व्यस्त हैं कि ये जानकारी अधिक से अधिक लोगों तक शेयर करके ऐसी महान आत्माओं के प्रति अपनी श्रद्धांजलि भी अर्पित न कर सकें? आपके पास देश को देने के लिए कुछ और हो न हो, पर आप कम से कम इस लेख को शेयर तो कर ही सकते हैं न? तो ज़रूर कीजिए….वंदे मातरम!

Tuesday, July 29, 2014

अकेलापन...

लोग आते रहे-जाते रहे
मैं अकेला था,
अकेला ही रहा।

हर बार कोई आने वाला,
कुछ साथ लिए आता है।
जाते-जाते जाने वाला,
टुकड़ा मन का ले जाता है।

ऐसे टुकड़े मेरे मन के,
बनते रहे, बिखरते रहे।
उन सभी अकेले टुकड़ों में,
मैं अकेला था, अकेला ही रहा।

जीवन एक यात्रा है अनंत,
सदियों तक चलती जानी है।
यह एक जन्म की व्यथा नहीं,
कई जन्मों की कहानी है।

सौ जन्मों की इस यात्रा में,
लोग मिलते रहे, बिछड़ते रहे।
उन सभी अकेले जन्मों में,
मैं अकेला था, अकेला ही रहा।

यही अकेलापन मेरा,
जन्मों-जन्मों का साथी है।
जब कोई साथ नहीं होता,
तब याद इसी की आती है।

इन बार-बार की यादों में,
ये आता रहा, जाता रहा।
इससे मिलकर मैंने जाना,
मैं अकेला न था, अकेला नहीं रहा।
-सुमंत.

Tuesday, July 22, 2014

झरना...


अब खुश और संतुष्ट लोग बहुत कम मिलते हैं.
हम किसी से भी बात करें - वह शिकायतों का पिटारा खोल देता है.
‘मेरे पास समय ही नहीं रहता, मेरे पास पैसे नहीं हैं, दुनिया की इस दौड़ में मैं कैसे टिकूंगा, ओह, आज तो बारिश हो रही है, आज मेरा मूड नहीं है!’
ये सब अपनी खुशी को ‘टालने’ के बहाने हैं.
कुछ काम ऐसे हैं, जिनसे हमें ही खुशी मिलेगी - लेकिन हम ही उन बातों की खुशी गंवा रहे हैं!
क्या यह अजीब नहीं लगता?
किसी फूल की खुशबू का मज़ा लेने में कितना समय चाहिए?
उगते-डूबते सूरज को देखने के पैसे लगते हैं?
कभी नहाते समय खुलकर गाइए, वहां कौन आपसे होड़ लगाने आता है?
बारिश हो रही है? कोई बात नहीं - उसमें भीगने का मज़ा लीजिए!
बिना कुछ किए आराम से बिस्तर में पड़े रहने के लिए ‘मूड’ बनाना पड़ता है?
इंसान जब जन्म लेता है, तो उसके हाथों की मुट्ठियां बंद होती हैं.
ईश्वर ने हमारी एक मुट्ठी में ‘खुशी’ और दूसरी में ‘संतुष्टि’ भरकर हमें इस दुनिया में भेजा था. जैसे-जैसे हम बड़े होते जाते हैं, उस बढ़ती उम्र के साथ धीरे-धीरे वह ‘खुशी’ और ‘संतुष्टि’ कहीं बिखरती जाती है.
अब हमें ‘खुश’ होने के लिए ‘किसी व्यक्ति’ पर, ‘किसी बात’ पर निर्भर होना पड़ता है. 
अब हम खुश और संतुष्ट होते हैं:
किसी के आने पर- किसी के जाने पर.
किसी के होने पर- किसी ने का होने पर.
कुछ हासिल कर लेने पर-कुछ गँवा देने पर.
किसी से बात करने पर- किसी से बात न करने पर.
वास्तव में खुशी का कभी न थमने वाला झरना अपने ‘भीतर’ ही है.
बस उसमें कूदने और मौज करने की देर है.
लेकिन इसके बावजूद...
हम सब सिर्फ उस झरने के किनारे खड़े हैं - पानी के टैंकर के इंतज़ार में!
जब तक हम इस तरह इंतज़ार करते रहेंगे, तब तक यह प्यास बुझना भी असंभव है!
दूसरों से तुलना करते करते, हम ‘और’ पैसे, ‘और’ कपडे, ‘और’ बड़ा घर, ‘और’ बड़ी पोजीशन, ‘और’ ज्यादा नंबर की चाह में उलझे रहते हैं..!!
इस ‘और’ के पीछे भागते-भागते, खुशी के उस झरने को हम कितना पीछे छोड़ आए हैं!

(Image Source: Google Images)
(Whatsapp पर मिले एक मराठी संदेश का हिन्दी अनुवाद)

Friday, July 4, 2014

हृदय-ज्योति परिवार


स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि ‘जीवित वही हैं, जो दूसरों के लिए जीते हैं। सिर्फ खुद के लिए जीने वाले लोग तो मृत ही हैं’।
छोटी-छोटी बातों को लेकर शिकायत करते रहने वाले और दूसरों की मदद से बचने के बहाने बनाने वाले कई लोग मैंने देखे हैं। किसी न किसी स्वार्थ के कारण ही दूसरों के लिए कुछ करने वाले और थोड़ी-सी मदद के बदले बहुत-कुछ पाने की चाह रखनेवाले भी मैंने देखे हैं। लेकिन जब अपनी खुद की ज़िंदगी ही खतरे में हो, तब भी अपने दुखों और कष्टों की परवाह किए बिना, निस्वार्थ भाव से दूसरों के लिए कुछ करने वाले लोगों को देखना सचमुच अविश्वसनीय किन्तु उतना ही सुखद और प्रेरणादायी लगता है।
कुछ दिनों पहले मैं ऐसी ही एक महिला से मिला, जो जन्म से ही दिल की एक बेहद जटिल और असामान्य बीमारी से ग्रस्त हैं, जिनके लिए हर एक पल मौत से संघर्ष का पल है, कब धड़कन रुक जाए, इसका कोई ठिकाना नहीं है, लेकिन इसके बावजूद भी वे अपना दुःख भूलकर इस बीमारी से जूझ रहे बच्चों की सहायता में जुटी रहती हैं। उस जुझारू प्रेरणादायी व्यक्तित्व का नाम है - सुश्री ज्योति मुंगसे।
पुणे के औंध में रहने वाली ज्योति जी के हृदय में जन्म से ही छिद्र है और इस असाध्य जटिलता के कारण डॉक्टरों ने बचपन में ही कह दिया था कि वे बहुत ज्यादा समय तक नहीं जी सकेंगी। लेकिन यह सुनकर निराश होने के बजाय ज्योतिजी ने मौत से लड़ने की ठान ली और पिछले चालीस वर्षों से वे हर पल मौत को हराकर आगे बढ़ती जा रही हैं। जिस उम्र में बच्चे खिलौनों से खेलते हैं, उसी उम्र से ऑक्सीजन सिलिंडर उनका साथी है।
कुछ मित्रों के साथ मैं ज्योति जी से मिला (Jyotiji in red)
बचपन में डॉक्टरों ने उनके माता-पिता को सलाह दी थी कि वे ज्योति को स्कूल न भेजें क्योंकि वह ज़रा भी  तनाव और भागदौड़ नहीं सह सकेगी। लेकिन माता-पिता ने हिम्मत की और उन्हें स्कूल में दाखिल करवाया। इसी से ज्योति को भी जीवन में संघर्ष करने और हार न मानने की प्रेरणा मिली। शरीर साथ नहीं दे रहा था, लेकिन यह उनकी दृढ़ और अदम्य इच्छा-शक्ति ही है कि इतनी कठिन परिस्थिति के बावजूद भी उन्होंने न सिर्फ अपनी स्कूली पढ़ाई पूरी की, बल्कि सामाजिक विज्ञान विषय में एमए की परीक्षा भी उत्तीर्ण की। इसी दौरान सन 1997 में उनके दोनों फेफड़े खराब हो गए। इस कारण कई अन्य समस्याएं और जटिलताएं भी उत्पन्न हुईं। लेकिन सभी तरह के संकटों पर मात करके ज्योति का संघर्ष जारी रहा। डॉक्टरों की सलाह थी कि उन्हें यात्रा बिल्कुल नहीं करनी चाहिए। लेकिन अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति के बल पर उन्होंने वैष्णोदेवी की कठिन चढ़ाई सहित कई स्थानों की यात्रा सफलतापूर्वक पूरी की। यहाँ तक कि उन्होंने पैरासेलिंग जैसा जोखिम भरा अनुभव भी लिया।
अपनी इस जटिल बीमारी से हार मान लेने और निराश होने के बजाय ज्योतिजी ने अपनी ही तरह हृदय की इस जटिल बीमारी से जूझ रहे लोगों की सहायता में अपना जीवन लगा देने का निश्चय किया। इसी उद्देश्य से उन्होंने सन 2004 में ‘हृदयज्योत परिवार’ नामक एक सामाजिक संस्था की स्थापना की। इस संगठन के माध्यम से अब तक उन्होंने 50 से ज्यादा बच्चों के उपचार और सर्जरी के लिए आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई है। साथ ही, उन्होंने हृदय-दोष की जानकारी देने वाली एक शॉर्ट-फिल्म भी बनाई है। (नीचे वीडियो देखें)

इस संस्था के माध्यम से जन्मतः हृदय दोष (Congenital Heart Disease) से पीड़ित लोगों को हार्ट-सर्जरी के लिए आर्थिक सहायता प्राप्त करने में सहयोग दिया जाता है। साथ ही ट्रस्ट द्वारा गाँव-गाँव जाकर हृदय-रोगों के बारे में जन-जागरण करने, रोगियों व उनके माता-पिता को परामर्श व सहयोग प्रदान करने जैसे कार्य भी किए जाते हैं।
आज समाज में जन्म से ही विभिन्न तरह के हृदय रोगों से जूझ रहे रोगियों की संख्या हज़ारों में है। इनमें से कई रोगी ऐसे हैं, जिनकी समस्या को ऑपरेशन के द्वारा दूर किया जा सकता है। लेकिन आर्थिक रूप से कमज़ोर परिवारों के लिए इस तरह के जटिल ऑपरेशन का खर्च उठा पाना संभव नहीं हो पाता। यदि समाज के हम सभी लोग अपनी क्षमता के अनुसार सहयोग करें, तो न जाने हमारे सामूहिक सहयोग से कितने लोगों की जान बचाई जा सकेगी।
मैंने स्वयं ज्योतिजी से मिला हूँ और मैंने उनके कार्य की जानकारी ली है। इसलिए मुझे विश्वास है कि यदि हम उनके इस कार्य में सहयोग करें, तो निश्चित ही इसका सदुपयोग ही होगा। हम सभी को व्यक्तिगत स्तर पर अपनी क्षमता के अनुसार सहयोग करना चाहिए और साथ ही कॉर्पोरेट स्तर पर CSR के माध्यम से भी यथासंभव सहायता दिलाने हेतु प्रयास भी करना चाहिए। मेरा अनुरोध है कि हम इस कार्य में योगदान करें।
अधिक जानकारी के लिए आप इस पते पर संपर्क कर सकते हैं:

हृदय-ज्योत परिवार
ई-21, श्रीराम नगर, डी.पी. रोड, औंध,
पुणे- 411007 
फोन: (020) - 25889467
(सुश्री ज्योति मुंगसे: 9850973132)

Saturday, June 21, 2014

भाषाएं, सरकारें और लोग...

जबसे मोदी सरकार बनी है, लोगों में उम्मीद भी जागी है कि हिन्दी और भारतीय भाषाओं को अब प्रोत्साहन मिलेगा और इनका विकास होगा. इसमें कोई शक नहीं कि मोदीजी हिन्दी को जल्दी ही ‘अंतर्राष्ट्रीय ब्रांड’ बना देंगे. लेकिन जब तक आम लोग खुद अपनी भाषाओं का उपयोग नहीं करते और अंग्रेज़ी को श्रेष्ठ मानने की मानसिकता से बाहर नहीं निकलते, तब तक ज्यादा कुछ होने वाला नहीं है.
मैं हमेशा देखता हूँ कि मॉल्स, मल्टिप्लेक्स, मैकडोनाल्ड और पिज्ज़ा हट जैसी दुकानों, रेलवे के एसी डब्बों और हवाई जहाजों/हवाई अड्डों जैसी जगहों पर ज्यादातर लोग अक्सर अंग्रेज़ी में ही बात करते हैं. कोई फोन रिसीव करें, तो शुरुआत ‘हैलो’ से ही होती है. ये अंग्रेज़ी नहीं है, ये दरअसल अंग्रेजियत की बेवजह नक़ल है, जिसकी कोई ज़रुरत नहीं है. जब तक ये नहीं बदलेगी, मुझे नहीं लगता कि तब तक भारतीय भाषाओं का विकास हो सकता है.
मेरा काम कुछ ऐसा है कि अक्सर दुनिया के अलग-अलग देशों के लोगों से फोन पर मेरी बातचीत होती है. जब कोई मुझे कॉल करे, मैं हमेशा ‘नमस्कार’ बोलकर बात शुरू करता हूँ, चाहे फोन करने वाला व्यक्ति भारतीय हो या विदेशी. अभिवादन के लिए मैं जब नमस्कार बोलता हूँ, तो मुझे उधर से अंग्रेज़ व्यक्ति से भी ‘नमस्कार’ या ‘नमस्ते’ सुनने को मिलता है और फिर आगे की बातचीत हम अंग्रेज़ी में करते हैं. स्वाभाविक है कि बात करने वाला व्यक्ति अगर विदेशी है, तो बात अंग्रेज़ी में ही होगी और मैं इसका विरोधी भी नहीं हूँ. लेकिन जब दो भारतीय भी आपस में अंग्रेज़ी बोलते हैं, तो बात मेरी समझ में नहीं आती. कॉल सेंटर से कोई कॉल आता है और उधर वाला व्यक्ति अंग्रेज़ी में बात करता है, इसलिए लोग अंग्रेज़ी में बात क्यों बोलते हैं, ये भी मैं आज तक नहीं समझ सका.
मैं मॉल, मल्टीप्लेक्स, मैकडोनाल्ड-पिज्ज़ा हट जैसी दुकानों, रेल के एसी डब्बों, हवाई अड्डों, हवाई जहाजों में हमेशा हिन्दी/मराठी (पुणे में) में बात करता हूँ और हमेशा मुझे मेरी भाषा में जवाब भी मिला है.
ऐसा नहीं है कि मैं अंग्रेज़ी का विरोधी हूँ. मेरा तो पूरा काम, पूरा रोजगार ही अंग्रेजी, हिन्दी, मराठी जैसी भाषाओं से चलते है. लेकिन मुझे लगता है कि अंग्रेज़ी और अंग्रेजियत में अंतर है. एक भाषा के रूप में अंग्रेज़ी सीखने, जानने, पढ़ने, लिखने और विदेशियों से संवाद के समय अंग्रेज़ी बोलने में कोई आपत्ति नहीं है. लेकिन भारत के लोग आपस में बात करते समय अंग्रेज़ी क्यों बोलते रहते हैं? जब वही लोग अपने नौकरों, माली, धोबी, ड्राइवर, वॉचमैन से बात करते हैं, तो हिन्दी/मराठी/प्रादेशिक भाषाओं में करते हैं, लेकिन आपस में बात करते हैं, तो अंग्रेज़ी में करते हैं. इसका कारण कहीं ये सोच तो नहीं है कि अंग्रेज़ी उच्च-वर्ग की और ‘मॉडर्न’ लोगों की भाषा है, जबकि गरीब, अनपढ़, ग्रामीण, सेवक-वर्ग के लोग हिन्दी या भारतीय भाषाएं बोलते हैं? ये सोच जब तक नहीं बदलती, तब तक कुछ नहीं बदलेगा.
कई बार मुझे अपने काम के संबंध में कुछ लोगों/कंपनियों की सेवाएं लेनी पड़ती हैं, जिनके बदले में मैं उन्हें भुगतान करता हूँ. जब ऐसी किसी भारतीय कंपनी का कोई एजेंट/कर्मचारी मुझे कॉल करता है, तो मैं उनसे साफ़ कहता हूँ कि मेरी बात किसी ऐसे व्यक्ति से करवाई जाए, जो हिन्दी या मराठी बोलना जानता हो. इसका कारण ये है कि मैं बेवजह अंग्रेज़ी में बात करना पसंद नहीं करता. वे लोग ऐसे व्यक्ति से संपर्क करवाते भी हैं, क्योंकि उनको मुझसे ‘बिजनेस’ मिलता है.
इसलिए मेरी यही राय है कि काम सिर्फ अंग्रेज़ी में ही हो सकता है, अंग्रेज़ी वैश्विक भाषा है, अंग्रेज़ी श्रेष्ठ है, अंग्रेज़ी आधुनिक होने की निशानी है, जैसे भ्रमों से बाहर निकलना ज़रूरी है. दुनिया के कई विकसित देश हैं, जहां अंग्रेज़ी को कोई नहीं पूछता. हम एक भाषा के तौर पर अंग्रेज़ी सीखें, विदेशियों और विदेशों से व्यापार-संपर्क करने में अंग्रेज़ी का उपयोग करें, इसमें कोई समस्या नहीं है. लेकिन भारत में अपनी आपसी बातचीत और व्यवहार में जब तक हम गर्व से हिन्दी और अपनी अन्य भारतीय भाषाओं का उपयोग नहीं करते, तब तक कोई सरकार, कोई क़ानून, किसी भाषा के विकास और विस्तार में कुछ नहीं कर सकता.
मुझे विश्वास है कि आप भी बेवजह की अंग्रेज़ियत ओढ़ने के बजाय हिन्दी और अपनी अन्य भारतीय भाषाओं का ही उपयोग करते होंगे. हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं के विकास के लिए हम और क्या-क्या प्रयास अपने-अपने स्तर पर कर सकते हैं, इस बारे में अपने सुझाव अवश्य दें.

Saturday, May 31, 2014

लेकिन...


सन 1991 में बनी फिल्म ‘लेकिन’ हिन्दी फिल्म-जगत की कुछ बेहद शानदार फिल्मों में से एक है। गुलज़ार का लेखन व निर्देशन, लता मंगेशकर का स्वर और पं. हृदयनाथ मंगेशकर का संगीत तो इसे खूबसूरत बनाते ही हैं। लेकिन उससे भी अद्भुत है इसकी थीम।

एक सरकारी कर्मचारी को राजस्थान के सुदूर रेगिस्तानी इलाके में भेजा गया है, जहाँ उसे एक पुरानी, वीरान हवेली
(Image: Google Images)
को सरकार के संरक्षण में लेना है। वह जब भी हवेली में या उसके आस-पास जाता है, उसे एक लड़की वहाँ भटकती हुई दिखाई देती है। लेकिन शायद वह किसी और को नहीं दिखती। वह बार-बार
पुराने दौर में पहुँच जाता है। आगे कहानी में पता चलता है कि वह लड़की पुराने ज़माने के एक गायक की बेटी थी, जिस पर वहाँ के राजा की बुरी नज़र पड़ गई थी। उसके पिता और बहन तो दरबार से निकल भागने में सफल रहे थे, लेकिन वह भागने की कोशिश करते समय बीच रेगिस्तान में पकड़ ली गई और मारी गई। जान बचाकर भागते समय वह रेगिस्तान को पार नहीं कर सकी और उसकी आत्मा आज भी उसी जगह भटक रही है। आखिरकार फिल्म का नायक उसे रेगिस्तान पार करवाता है और वह मुक्त हो जाती है। (कहानी कुछ अलग हो सकती है क्योंकि मैंने फिल्म बहुत सालों पहले देखी थी, लेकिन थीम यही है)

मुझे यह कहानी हममें से हर एक के जीवन से जुड़ी हुई लगती है। जिस तरह फिल्म में वह लड़की एक ही घटना में उलझी-रुकी हुई थी, शायद हम सबकी ज़िन्दगी में भी ऐसा कोई न कोई प्रसंग, कोई घटना, कोई पल होता ही है, जहाँ हमारा मन अटका रहता है। समय तो आगे ही बढ़ता है, उसके साथ-साथ हमें भी बढ़ना ही पड़ता है; ज़िन्दगी बदल जाती है, हम शारीरिक और सांसारिक रूप से तो समय के साथ-साथ आगे भी बढ़ जाते हैं, लेकिन फिर भी मन उस एक पल में बार-बार लौटता रहता है। फिल्म में उस वीरान रेगिस्तान में भटकती उस लड़की की तरह ही उस एक पल में फंसा हुआ हमारा मन भी खुद को दुनिया के रेगिस्तान में अकेला भटकता हुआ महसूस करता है। जैसे वह लड़की बार-बार वहाँ से भागने की कोशिश करती थी और फिर वहीं आकर फंस जाती थी, उसी तरह हम भी शायद उस एक पल से बाहर निकलने की बहुत कोशिशें करते हैं, लेकिन मन फिर भी बार-बार उसी जगह आकर फंस जाता है। हमें लगता है कि काश! जीवन में वह एक घटना न हुई होती, या वह एक पल न आया होता, तो शायद ज़िन्दगी आज कुछ अलग, कुछ और बेहतर होती।

हर किसी के जीवन से इस फिल्म की इसी समानता के कारण ये फिल्म मेरी पसंदीदा फिल्मों में से एक है। ज़िन्दगी में जो कुछ भी हो चुका है, उसे वापस लौटकर बदला नहीं जा सकता। समय सिर्फ आगे बढ़ता है, पीछे नहीं जाता। जो लोग समय के साथ बढ़ जाते हैं, वे आगे निकल जाते हैं। जो नहीं बढ़ पाते, किसी एक पुराने पल में ही अटके रहते हैं, समय उन्हें भी आगे ही घसीटता है। बढ़ना है या घिसटना है, ये हर किसी को खुद तय करना पड़ता है। बेहतर यही है कि पुरानी बातों, पुरानी घटनाओं और पुरानी यादों को अपने वर्तमान पर हावी न होने दें। जीवन अमर नहीं है, जीवन में कुछ भी स्थायी नहीं है। जो हो चुका, हम उसे बदल नहीं सकते। वह चाहे अच्छा था या बुरा, अब वह बीत चुका है। उसमें उलझे रहकर हम सिर्फ खुद को सज़ा देते हैं। अगर कुछ बुरा या गलत हुआ था, तो उसे पीछे छोड़कर आगे बढ़ना ही समझदारी है क्योंकि उस एक पल में हम जितना ज्यादा उलझे रहते हैं, हम उतने ही ज्यादा दुःखी, उतने ही ज्यादा परेशान होते हैं और आगे के अपने जीवन को हम उतना ही ज्यादा कठिन बनाते जाते हैं।

शायद हमारा मन किसी छोटे बच्चे की तरह होता है। बच्चे ने अगर चाबी अपनी मुठ्ठी में पकड़ ली है और आप उससे छुड़ाना चाहते हैं, तो उसे कोई खिलौना या चॉकलेट देनी पड़ेगी। वह खिलौने की तरफ आकर्षित होकर चाबी को छोड़ देता है। इसी तरह मन को भी कुछ नया चाहिए। अगर आप पुरानी बातों में, पुरानी यादों में उलझे रहेंगे, तो मन आपको और ज्यादा उलझाए रखेगा।

आपके जीवन में भी ऐसी कोई न कोई घटना ज़रूर हुई होगी, ऐसा कोई न कोई पल ज़रूर आया होगा, जिसे आप बदलना चाहते हैं। अगर आप अभी तक उससे बाहर नहीं आ सके हैं, अगर आप अभी तक उसमें उलझे हुए हैं, तो अब वहाँ से निकल आइये। आगे बढ़िए, पुरानी यादों को मिटाने के लिए कुछ नया कीजिए। हो सकता है, जीवन में कोई एक काम नहीं हो सका या कोई एक सपना पूरा नहीं हो पाया। लेकिन उस एक विफलता, एक दुःख के कारण बाकी सारे सपनों को क्यों नष्ट किया जाए? जो बीत गया, उसे भूलिए और आगे बढ़कर कुछ नया लिखिए।

लेकिन चलते-चलते ‘लेकिन’ के इस गीत का भी मज़ा लीजिए!