Wednesday, March 5, 2014

अहंकारी अराजक पार्टी

‘आम आदमी’ के नाम पर बनी एक राजनैतिक पार्टी पर ये आरोप बहुत पहले से लगते रहे हैं कि इस पार्टी का और इसके नेताओं का वास्तव में इस देश के आम आदमी से कोई लेना-देना नहीं है, बल्कि यह विदेशी (मुख्यतः अमेरिका की फोर्ड फाउंडेशन) चंदे से एनजीओ चलाने वाले कुछ लोगों का समूह है। आरोप ये भी लगते रहे हैं कि इनमें से अधिकांश लोग नक्सली विचारधारा के प्रति सहानुभूति रखने वाले या नक्सलियों के कृत्यों को सही ठहराने वाले लोग हैं; कुछ लोग अफज़ल गुरु की फांसी का विरोध करने वाले और कश्मीर पाकिस्तान को सौंप देने की बात करने वाले लोग हैं; कुछ लोग भारतीय सेना के खिलाफ़ आन्दोलन  चलाने वाले और अलगाववादियों का समर्थन करने वाले लोग हैं। आरोप ये भी लगते रहे हैं कि इनके लिए पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे देशों में भी चन्दा इकठ्ठा किया गया है और इन लोगों का मुख्य लक्ष्य भारत में लोकतंत्र को अस्थिर करना ही है, जिसका पहला चरण नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री बनने से रोकना है क्योंकि लोकसभा चुनाव में नरेन्द्र मोदी की जीत का मतलब है देश में राष्ट्रवादी विचारधारा वाली एक मज़बूत सरकार बनेगी, जो निश्चित रूप से आतंकियों और भारत-विरोधियों के अनुकूल नहीं होगी।
यह स्वाभाविक ही है कि इन सभी आरोपों के प्रमाण होते हुए भी कुछ लोग अब तक ये मानते थे कि इस पार्टी पर ये सभी आरोप भाजपा और/या कांग्रेस द्वारा राजनैतिक उद्देश्य से लगाए गए हैं क्योंकि ये पार्टियां इस बात से परेशान हैं कि हाल ही में उभरी एक नई राजनैतिक पार्टी इनके लिए खतरा बन रही है। लेकिन आज (5 मार्च 2014 को) गुजरात और फिर दिल्ली में इस पार्टी के लोगों ने जो किया, क्या इस देश के क़ानून को मानने वाला और लोकतंत्र का आदर करने वाला कोई भी व्यक्ति उसका समर्थन कर सकता है?
आज सुबह ही मुख्य चुनाव आयुक्त महोदय ने लोकसभा कार्यक्रम की घोषणा की और तत्काल प्रभाव से पूरे देश में आदर्श आचार-संहिता भी लागू हो गई। इसका सीधा अर्थ यह है कि अब देश की पुलिस व्यवस्था और प्रशासन सीधे चुनाव आयोग के अधीन है। अब प्रत्येक राजनैतिक दल को अपने कार्यक्रमों, रैलियों, सभाओं, रोड शो आदि सभी के लिए चुनाव आयोग और उसके अधीन काम करने वाले प्रशासन से अनुमति लेनी होगी। इसके बावजूद इस अजब तरह की गजब पार्टी ने उपयुक्त अनुमति लिए बिना गुजरात में राजनैतिक रैली की। जब पुलिस ने उनसे आचार-संहिता का उल्लंघन न करने का अनुरोध किया, तो इनके स्वघोषित ईमानदार नेता (जो खुद को अराजक कहने में गर्व महसूस करते हैं) ने अनुरोध मानने से इंकार कर दिया। इसके बाद पुलिस ने नियमानुसार उपयुक्त कार्रवाई की। लेकिन आश्चर्य है कि आचार-संहिता के दौरान चुनाव आयोग के अधीन कार्य कर रही पुलिस की कार्रवाई के लिए ये नेता नरेन्द्र मोदी को दोष दे रहे हैं। इनका हास्यास्पद कथन यह था कि नरेन्द्र मोदी इनकी लोकप्रियता से डर गए हैं और इन्हें रोकना चाहते हैं।
खबर मिली है कि गुजरात में क़ानून का उल्लंघन करने पर फंसने के बाद स्वयं को महात्मा गांधी का अनुयायी और आम आदमी का एकमात्र हितैषी बताने वाली इस पार्टी ने तुरंत ही दिल्ली में भाजपा मुख्यालय को घेर लिया और नरेन्द्र मोदी को चोर, बेईमान आदि घोषित करके वहाँ पथराव, तोड़-फोड़ करना शुरू कर दिया। क्या लोकतंत्र की बात करने वाली, आम आदमी की बात करने वाली, महात्मा गांधी की बात करने वाली कोई पार्टी कभी ऐसा अराजक कृत्य कर सकती है?
ये आरोप तो बहुत पहले से लगते रहे हैं कि इस पार्टी का विश्वास लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में और इस देश के संविधान में नहीं है। लेकिन जो तटस्थ लोग इन आरोपों को पहले केवल राजनैतिक आरोप कहकर अस्वीकार कर देते थे, मुझे उम्मीद है कि आज की हिंसक, अराजक और अलोकतांत्रिक घटना के बाद वे लोग एक बार फिर इस पर विचार करेंगे।
लोकतंत्र में अपनी बात रखने या दूसरी पार्टियों का विरोध करने का अधिकार सभी को है। लेकिन यह विरोध लोकतांत्रिक और अहिंसात्मक तरीके से होना चाहिए। पत्थर तो इस पार्टी के लोग फेंक रहे हैं, लेकिन बदनाम हो रहा है इस देश का ‘आम आदमी’। इतिहास गवाह है कि इस देश का आम आदमी सब-कुछ देखता-सुनता है, लेकिन कभी जवाब में पत्थरों की अलोकतांत्रिक और हिंसात्मक भाषा नहीं बोलता, बल्कि वह अपना जवाब चुनाव में मतदान के द्वारा देता है। कांग्रेस सरकार के भ्रष्टाचार, महंगाई और कुशासन से त्रस्त आम आदमी कभी भाजपा कार्यालय पर पत्थरबाजी नहीं करेगा, नरेन्द्र मोदी को गालियाँ नहीं देगा बल्कि कांग्रेस के कुशासन से मुक्ति पाने और देश में सकारात्मक परिवर्तन लाने के लिए वह भाजपा को वोट देगा।
अटलजी ने संसद में अपने एक भाषण में एक बहुत महत्त्वपूर्ण बात कही थी। उन्होंने कहा था, ‘इस देश में सरकारें आती जाती रहेंगी, पार्टियां बनेंगी, टूटेंगी; लेकिन इस देश का लोकतंत्र सुरक्षित रहना चाहिए।’ मुझे लगता है कि हम सभी को यह बात याद रखनी चाहिए। हम चाहे किसी भी पार्टी, सरकार और नेता का समर्थन क्यों न करें। लेकिन हमें कभी भी किसी ऐसी पार्टी या नेता का समर्थन नहीं करना चाहिए, जो अराजक हो, अलोकतांत्रिक हो, हिंसावादी हो और क़ानून-व्यवस्था का निरादर करता हो।
आज की घटना से यह बात और भी ज्यादा स्पष्ट हो गई है कि खुद को ‘आम आदमी’ की पार्टी बताने वाला राजनैतिक दल वास्तव में अराजकता और हिंसा का समर्थक है। इसका लोकतंत्र और इस देश के संविधान पर विश्वास नहीं है। हमें आशा करनी चाहिए कि इस देश का शांतिप्रिय ‘आम आदमी’ कभी किसी अहंकारी अराजक पार्टी (Arrogant Anarchist Party) का समर्थन नहीं करेगा क्योंकि यह केवल चुनावी जीत-हार के लिए नहीं, बल्कि इससे हमारे देश की स्वस्थ लोकतांत्रिक व्यवस्था और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य के लिए भी खतरा उत्पन्न हो रहा है।
-सुमंत विद्वांस