Saturday, May 31, 2014

लेकिन...


सन 1991 में बनी फिल्म ‘लेकिन’ हिन्दी फिल्म-जगत की कुछ बेहद शानदार फिल्मों में से एक है। गुलज़ार का लेखन व निर्देशन, लता मंगेशकर का स्वर और पं. हृदयनाथ मंगेशकर का संगीत तो इसे खूबसूरत बनाते ही हैं। लेकिन उससे भी अद्भुत है इसकी थीम।

एक सरकारी कर्मचारी को राजस्थान के सुदूर रेगिस्तानी इलाके में भेजा गया है, जहाँ उसे एक पुरानी, वीरान हवेली
(Image: Google Images)
को सरकार के संरक्षण में लेना है। वह जब भी हवेली में या उसके आस-पास जाता है, उसे एक लड़की वहाँ भटकती हुई दिखाई देती है। लेकिन शायद वह किसी और को नहीं दिखती। वह बार-बार
पुराने दौर में पहुँच जाता है। आगे कहानी में पता चलता है कि वह लड़की पुराने ज़माने के एक गायक की बेटी थी, जिस पर वहाँ के राजा की बुरी नज़र पड़ गई थी। उसके पिता और बहन तो दरबार से निकल भागने में सफल रहे थे, लेकिन वह भागने की कोशिश करते समय बीच रेगिस्तान में पकड़ ली गई और मारी गई। जान बचाकर भागते समय वह रेगिस्तान को पार नहीं कर सकी और उसकी आत्मा आज भी उसी जगह भटक रही है। आखिरकार फिल्म का नायक उसे रेगिस्तान पार करवाता है और वह मुक्त हो जाती है। (कहानी कुछ अलग हो सकती है क्योंकि मैंने फिल्म बहुत सालों पहले देखी थी, लेकिन थीम यही है)

मुझे यह कहानी हममें से हर एक के जीवन से जुड़ी हुई लगती है। जिस तरह फिल्म में वह लड़की एक ही घटना में उलझी-रुकी हुई थी, शायद हम सबकी ज़िन्दगी में भी ऐसा कोई न कोई प्रसंग, कोई घटना, कोई पल होता ही है, जहाँ हमारा मन अटका रहता है। समय तो आगे ही बढ़ता है, उसके साथ-साथ हमें भी बढ़ना ही पड़ता है; ज़िन्दगी बदल जाती है, हम शारीरिक और सांसारिक रूप से तो समय के साथ-साथ आगे भी बढ़ जाते हैं, लेकिन फिर भी मन उस एक पल में बार-बार लौटता रहता है। फिल्म में उस वीरान रेगिस्तान में भटकती उस लड़की की तरह ही उस एक पल में फंसा हुआ हमारा मन भी खुद को दुनिया के रेगिस्तान में अकेला भटकता हुआ महसूस करता है। जैसे वह लड़की बार-बार वहाँ से भागने की कोशिश करती थी और फिर वहीं आकर फंस जाती थी, उसी तरह हम भी शायद उस एक पल से बाहर निकलने की बहुत कोशिशें करते हैं, लेकिन मन फिर भी बार-बार उसी जगह आकर फंस जाता है। हमें लगता है कि काश! जीवन में वह एक घटना न हुई होती, या वह एक पल न आया होता, तो शायद ज़िन्दगी आज कुछ अलग, कुछ और बेहतर होती।

हर किसी के जीवन से इस फिल्म की इसी समानता के कारण ये फिल्म मेरी पसंदीदा फिल्मों में से एक है। ज़िन्दगी में जो कुछ भी हो चुका है, उसे वापस लौटकर बदला नहीं जा सकता। समय सिर्फ आगे बढ़ता है, पीछे नहीं जाता। जो लोग समय के साथ बढ़ जाते हैं, वे आगे निकल जाते हैं। जो नहीं बढ़ पाते, किसी एक पुराने पल में ही अटके रहते हैं, समय उन्हें भी आगे ही घसीटता है। बढ़ना है या घिसटना है, ये हर किसी को खुद तय करना पड़ता है। बेहतर यही है कि पुरानी बातों, पुरानी घटनाओं और पुरानी यादों को अपने वर्तमान पर हावी न होने दें। जीवन अमर नहीं है, जीवन में कुछ भी स्थायी नहीं है। जो हो चुका, हम उसे बदल नहीं सकते। वह चाहे अच्छा था या बुरा, अब वह बीत चुका है। उसमें उलझे रहकर हम सिर्फ खुद को सज़ा देते हैं। अगर कुछ बुरा या गलत हुआ था, तो उसे पीछे छोड़कर आगे बढ़ना ही समझदारी है क्योंकि उस एक पल में हम जितना ज्यादा उलझे रहते हैं, हम उतने ही ज्यादा दुःखी, उतने ही ज्यादा परेशान होते हैं और आगे के अपने जीवन को हम उतना ही ज्यादा कठिन बनाते जाते हैं।

शायद हमारा मन किसी छोटे बच्चे की तरह होता है। बच्चे ने अगर चाबी अपनी मुठ्ठी में पकड़ ली है और आप उससे छुड़ाना चाहते हैं, तो उसे कोई खिलौना या चॉकलेट देनी पड़ेगी। वह खिलौने की तरफ आकर्षित होकर चाबी को छोड़ देता है। इसी तरह मन को भी कुछ नया चाहिए। अगर आप पुरानी बातों में, पुरानी यादों में उलझे रहेंगे, तो मन आपको और ज्यादा उलझाए रखेगा।

आपके जीवन में भी ऐसी कोई न कोई घटना ज़रूर हुई होगी, ऐसा कोई न कोई पल ज़रूर आया होगा, जिसे आप बदलना चाहते हैं। अगर आप अभी तक उससे बाहर नहीं आ सके हैं, अगर आप अभी तक उसमें उलझे हुए हैं, तो अब वहाँ से निकल आइये। आगे बढ़िए, पुरानी यादों को मिटाने के लिए कुछ नया कीजिए। हो सकता है, जीवन में कोई एक काम नहीं हो सका या कोई एक सपना पूरा नहीं हो पाया। लेकिन उस एक विफलता, एक दुःख के कारण बाकी सारे सपनों को क्यों नष्ट किया जाए? जो बीत गया, उसे भूलिए और आगे बढ़कर कुछ नया लिखिए।

लेकिन चलते-चलते ‘लेकिन’ के इस गीत का भी मज़ा लीजिए!