Saturday, June 21, 2014

भाषाएं, सरकारें और लोग...

जबसे मोदी सरकार बनी है, लोगों में उम्मीद भी जागी है कि हिन्दी और भारतीय भाषाओं को अब प्रोत्साहन मिलेगा और इनका विकास होगा. इसमें कोई शक नहीं कि मोदीजी हिन्दी को जल्दी ही ‘अंतर्राष्ट्रीय ब्रांड’ बना देंगे. लेकिन जब तक आम लोग खुद अपनी भाषाओं का उपयोग नहीं करते और अंग्रेज़ी को श्रेष्ठ मानने की मानसिकता से बाहर नहीं निकलते, तब तक ज्यादा कुछ होने वाला नहीं है.
मैं हमेशा देखता हूँ कि मॉल्स, मल्टिप्लेक्स, मैकडोनाल्ड और पिज्ज़ा हट जैसी दुकानों, रेलवे के एसी डब्बों और हवाई जहाजों/हवाई अड्डों जैसी जगहों पर ज्यादातर लोग अक्सर अंग्रेज़ी में ही बात करते हैं. कोई फोन रिसीव करें, तो शुरुआत ‘हैलो’ से ही होती है. ये अंग्रेज़ी नहीं है, ये दरअसल अंग्रेजियत की बेवजह नक़ल है, जिसकी कोई ज़रुरत नहीं है. जब तक ये नहीं बदलेगी, मुझे नहीं लगता कि तब तक भारतीय भाषाओं का विकास हो सकता है.
मेरा काम कुछ ऐसा है कि अक्सर दुनिया के अलग-अलग देशों के लोगों से फोन पर मेरी बातचीत होती है. जब कोई मुझे कॉल करे, मैं हमेशा ‘नमस्कार’ बोलकर बात शुरू करता हूँ, चाहे फोन करने वाला व्यक्ति भारतीय हो या विदेशी. अभिवादन के लिए मैं जब नमस्कार बोलता हूँ, तो मुझे उधर से अंग्रेज़ व्यक्ति से भी ‘नमस्कार’ या ‘नमस्ते’ सुनने को मिलता है और फिर आगे की बातचीत हम अंग्रेज़ी में करते हैं. स्वाभाविक है कि बात करने वाला व्यक्ति अगर विदेशी है, तो बात अंग्रेज़ी में ही होगी और मैं इसका विरोधी भी नहीं हूँ. लेकिन जब दो भारतीय भी आपस में अंग्रेज़ी बोलते हैं, तो बात मेरी समझ में नहीं आती. कॉल सेंटर से कोई कॉल आता है और उधर वाला व्यक्ति अंग्रेज़ी में बात करता है, इसलिए लोग अंग्रेज़ी में बात क्यों बोलते हैं, ये भी मैं आज तक नहीं समझ सका.
मैं मॉल, मल्टीप्लेक्स, मैकडोनाल्ड-पिज्ज़ा हट जैसी दुकानों, रेल के एसी डब्बों, हवाई अड्डों, हवाई जहाजों में हमेशा हिन्दी/मराठी (पुणे में) में बात करता हूँ और हमेशा मुझे मेरी भाषा में जवाब भी मिला है.
ऐसा नहीं है कि मैं अंग्रेज़ी का विरोधी हूँ. मेरा तो पूरा काम, पूरा रोजगार ही अंग्रेजी, हिन्दी, मराठी जैसी भाषाओं से चलते है. लेकिन मुझे लगता है कि अंग्रेज़ी और अंग्रेजियत में अंतर है. एक भाषा के रूप में अंग्रेज़ी सीखने, जानने, पढ़ने, लिखने और विदेशियों से संवाद के समय अंग्रेज़ी बोलने में कोई आपत्ति नहीं है. लेकिन भारत के लोग आपस में बात करते समय अंग्रेज़ी क्यों बोलते रहते हैं? जब वही लोग अपने नौकरों, माली, धोबी, ड्राइवर, वॉचमैन से बात करते हैं, तो हिन्दी/मराठी/प्रादेशिक भाषाओं में करते हैं, लेकिन आपस में बात करते हैं, तो अंग्रेज़ी में करते हैं. इसका कारण कहीं ये सोच तो नहीं है कि अंग्रेज़ी उच्च-वर्ग की और ‘मॉडर्न’ लोगों की भाषा है, जबकि गरीब, अनपढ़, ग्रामीण, सेवक-वर्ग के लोग हिन्दी या भारतीय भाषाएं बोलते हैं? ये सोच जब तक नहीं बदलती, तब तक कुछ नहीं बदलेगा.
कई बार मुझे अपने काम के संबंध में कुछ लोगों/कंपनियों की सेवाएं लेनी पड़ती हैं, जिनके बदले में मैं उन्हें भुगतान करता हूँ. जब ऐसी किसी भारतीय कंपनी का कोई एजेंट/कर्मचारी मुझे कॉल करता है, तो मैं उनसे साफ़ कहता हूँ कि मेरी बात किसी ऐसे व्यक्ति से करवाई जाए, जो हिन्दी या मराठी बोलना जानता हो. इसका कारण ये है कि मैं बेवजह अंग्रेज़ी में बात करना पसंद नहीं करता. वे लोग ऐसे व्यक्ति से संपर्क करवाते भी हैं, क्योंकि उनको मुझसे ‘बिजनेस’ मिलता है.
इसलिए मेरी यही राय है कि काम सिर्फ अंग्रेज़ी में ही हो सकता है, अंग्रेज़ी वैश्विक भाषा है, अंग्रेज़ी श्रेष्ठ है, अंग्रेज़ी आधुनिक होने की निशानी है, जैसे भ्रमों से बाहर निकलना ज़रूरी है. दुनिया के कई विकसित देश हैं, जहां अंग्रेज़ी को कोई नहीं पूछता. हम एक भाषा के तौर पर अंग्रेज़ी सीखें, विदेशियों और विदेशों से व्यापार-संपर्क करने में अंग्रेज़ी का उपयोग करें, इसमें कोई समस्या नहीं है. लेकिन भारत में अपनी आपसी बातचीत और व्यवहार में जब तक हम गर्व से हिन्दी और अपनी अन्य भारतीय भाषाओं का उपयोग नहीं करते, तब तक कोई सरकार, कोई क़ानून, किसी भाषा के विकास और विस्तार में कुछ नहीं कर सकता.
मुझे विश्वास है कि आप भी बेवजह की अंग्रेज़ियत ओढ़ने के बजाय हिन्दी और अपनी अन्य भारतीय भाषाओं का ही उपयोग करते होंगे. हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं के विकास के लिए हम और क्या-क्या प्रयास अपने-अपने स्तर पर कर सकते हैं, इस बारे में अपने सुझाव अवश्य दें.

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