Tuesday, July 22, 2014

झरना...


अब खुश और संतुष्ट लोग बहुत कम मिलते हैं.
हम किसी से भी बात करें - वह शिकायतों का पिटारा खोल देता है.
‘मेरे पास समय ही नहीं रहता, मेरे पास पैसे नहीं हैं, दुनिया की इस दौड़ में मैं कैसे टिकूंगा, ओह, आज तो बारिश हो रही है, आज मेरा मूड नहीं है!’
ये सब अपनी खुशी को ‘टालने’ के बहाने हैं.
कुछ काम ऐसे हैं, जिनसे हमें ही खुशी मिलेगी - लेकिन हम ही उन बातों की खुशी गंवा रहे हैं!
क्या यह अजीब नहीं लगता?
किसी फूल की खुशबू का मज़ा लेने में कितना समय चाहिए?
उगते-डूबते सूरज को देखने के पैसे लगते हैं?
कभी नहाते समय खुलकर गाइए, वहां कौन आपसे होड़ लगाने आता है?
बारिश हो रही है? कोई बात नहीं - उसमें भीगने का मज़ा लीजिए!
बिना कुछ किए आराम से बिस्तर में पड़े रहने के लिए ‘मूड’ बनाना पड़ता है?
इंसान जब जन्म लेता है, तो उसके हाथों की मुट्ठियां बंद होती हैं.
ईश्वर ने हमारी एक मुट्ठी में ‘खुशी’ और दूसरी में ‘संतुष्टि’ भरकर हमें इस दुनिया में भेजा था. जैसे-जैसे हम बड़े होते जाते हैं, उस बढ़ती उम्र के साथ धीरे-धीरे वह ‘खुशी’ और ‘संतुष्टि’ कहीं बिखरती जाती है.
अब हमें ‘खुश’ होने के लिए ‘किसी व्यक्ति’ पर, ‘किसी बात’ पर निर्भर होना पड़ता है. 
अब हम खुश और संतुष्ट होते हैं:
किसी के आने पर- किसी के जाने पर.
किसी के होने पर- किसी ने का होने पर.
कुछ हासिल कर लेने पर-कुछ गँवा देने पर.
किसी से बात करने पर- किसी से बात न करने पर.
वास्तव में खुशी का कभी न थमने वाला झरना अपने ‘भीतर’ ही है.
बस उसमें कूदने और मौज करने की देर है.
लेकिन इसके बावजूद...
हम सब सिर्फ उस झरने के किनारे खड़े हैं - पानी के टैंकर के इंतज़ार में!
जब तक हम इस तरह इंतज़ार करते रहेंगे, तब तक यह प्यास बुझना भी असंभव है!
दूसरों से तुलना करते करते, हम ‘और’ पैसे, ‘और’ कपडे, ‘और’ बड़ा घर, ‘और’ बड़ी पोजीशन, ‘और’ ज्यादा नंबर की चाह में उलझे रहते हैं..!!
इस ‘और’ के पीछे भागते-भागते, खुशी के उस झरने को हम कितना पीछे छोड़ आए हैं!

(Image Source: Google Images)
(Whatsapp पर मिले एक मराठी संदेश का हिन्दी अनुवाद)

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