Tuesday, January 20, 2015

हिन्दी अपनाओ, हिन्दी बढ़ाओ!


हाल ही में, मैंने नवभारत टाइम्स की वेबसाइट पर प्रसिद्ध अंग्रेजी उपन्यासकार श्री चेतन भगत का लेख रोमन अपनाओ, हिंदी बचाओपढ़ा। इस लेख में उन्होंने सुझाव दिया है कि यदि हिन्दी को 'बचाना' है, तो हमें हिन्दी भाषा के लिए देवनागरी लिपि को छोड़कर रोमन लिपि अपना लेनी चाहिए। भगतजी भले ही अंग्रेज़ी में लिखते हैं, लेकिन उनकी अंग्रेज़ी किताबों का हिंदी में भी अनुवाद किया जाता है, उनकी लिखी कहानियों पर हिंदी में फ़िल्में बनी हैं और वे दैनिक भास्कर और नवभारत टाइम्स जैसे हिन्दी अखबारों में लिखते भी रहे हैं। इसलिए यह पढ़कर बहुत आश्चर्य और निराशा हुई कि एक लोकप्रिय लेखक और भाषा-प्रेमी होकर भी वे एक भाषा और लिपि को बचाने और बढ़ाने के बजाय, उसे खत्म करने की वकालत कर रहे हैं।
बात अगर सिर्फ हिन्दी बनाम अंग्रेज़ी की होती, तो मैं ये मान लेता कि शायद अंग्रेज़ी लेखक होने के कारण वे अंग्रेज़ी का ज्यादा से ज्यादा प्रचार करने के इच्छुक हैं, लेकिन उन्होंने अपनी बात के समर्थन में भाषा, सामाजिक रुतबा, फ़िल्में, तकनीक आदि सब-कुछ जोड़ दिया है। इसलिए उनकी बात का जवाब देना मुझे और भी ज्यादा ज़रूरी लगता है।
उनका पहला तर्क है कि अपने देश में सरकारों ने हिंदी के लिए कुछ किया नहीं है और सभी सरकारें सिर्फ दिखावा करती रही हैं। हालांकि पुराने कई उदाहरण दिए जा सकते हैं, लेकिन अगर हम सिर्फ आज की भी बात करें, तो हम देख सकते हैं कि श्री नरेन्द्र मोदी जी प्रधानमंत्री बनने के बाद से ही लगातार न सिर्फ हिंदी को आगे बढ़ाने के लिए काम कर रहे हैं, बल्कि वे विदेशों और यूएनओ जैसे वैश्विक मंचों पर भी हिंदी का पूरे आत्मविश्वास के साथ उपयोग भी कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर अब सभी मंत्रालयों के अकाउंट हैं और उन पर नियमित रूप से हिंदी में पोस्ट और ट्वीट आते रहते हैं। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ है। कुछ लोगों को शायद इसका महत्व समझ नहीं आता होगा, लेकिन देश के लोगों को इसमें एक सकारात्मक बदलाव साफ दिख रहा है
उनका दूसरा तर्क है कि अंग्रेज़ी इसलिए आगे बढ़ रही है क्योंकि लोगों को अंग्रेजी के कारण बेहतर करियर की उम्मीद बंधती है और समाज में उनका रुतबा बढ़ता है। अफ़सोस है कि भगतजी ने यहां अंग्रेजी और अंग्रेजियत के अंतर को अनदेखा करके उन्हें एक साथ मिला दिया है। एक भाषा के रूप में अंग्रेजी सीखने और अंग्रेजी के उपयोग से करियर में आगे बढ़ने में कोई बुराई नहीं है और न मैं इसका विरोधी हूं। लेकिन क्या इसके लिए अंग्रेजियत अपनाना ज़रूरी ही है? अगर मुझे अपने ऑफिस में अंग्रेजी का उपयोग करना पड़ता है, तो क्या मैं घर में भी अंग्रेज़ी ही बोलने लगूं या किताबें भी अंग्रेज़ी (अथवा रोमन हिन्दी) में ही पढूं? यह सोच भी गलत है कि अंग्रेज़ी बोलने से ही समाज में रुतबा बढ़ता है। चाहे हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी हों, विख्यात अभिनेता अमिताभ बच्चन हों, महान गायिका लता मंगेशकर जी हों या हमारे पूर्व प्रधानमंत्री अटलजी हों, ये सभी लोग हिंदी का ही ज्यादा उपयोग करते हैं और समाज में इनका रुतबा क्या है, ये कहने की मुझे ज़रुरत नहीं।
मैं खुद भी हर जगह हिंदी का ज्यादा से ज्यादा उपयोग करता हूं। हवाई अड्डे पर, हवाई जहाज में यात्रा के दौरान, मॉल में, मल्टीप्लेक्स में, सामाजिक समारोहों में, ईमेल लिखते समय, सोशल मीडिया में और फोन पर बातचीत के दौरान मैं ज्यादातर हिंदी का ही उपयोग करता हूं और ऐसा कभी नहीं हुआ है कि हिंदी बोलने के कारण कभी मेरा अपमान किया गया हो या मेरे मित्रों, परिचितों में मेरा रुतबा घटा हो। इसलिए मैं अपने व्यक्तिगत अनुभव से ये कह सकता हूं कि किसी को यह भ्रम नहीं पालना चाहिए कि अंग्रेजी बोलने से आपकी बहुत इज्जत होने लगेगी। आपका रुतबा आपके काम और आपकी सफलता से बढ़ता है, न कि आपकी भाषा से। यदि आप पूरे आत्मविश्वास के साथ अपनी भाषा का उपयोग करते हैं, तो लोग भी आपकी भाषा का और आपका सम्मान करेंगे। यदि आपके मन में ही अपने भाषा के प्रति हीनभावना है, तो दुनिया क्यों आपकी भाषा को सम्मान देगी?
अपने लेख में भगतजी आगे कहते हैं कि अंग्रेजी का उपयोग करने से सूचना और मनोरंजन की एक बिल्कुल नई दुनिया हमारे लिए खुल जाती है और तकनीक तक पहुंच बढ़ती है। उनका तो ये भी दावा है कि अंग्रेजी की सामान्य जानकारी के बिना हम एक मोबाइल फोन या बेसिक मैसेजिंग ऐप्स का उपयोग भी नहीं कर सकते। मुझे नहीं पता कि वे कौन-सा मोबाइल फोन रखते हैं, लेकिन शायद उन्हें जानकारी नहीं है कि आज लगभग हर कंपनी के ऐसे मोबाइल फोन मॉडल उपलब्ध हैं, जिनमें हिंदी भाषा का विकल्प मौजूद होता है। हिंदी को चुनने पर आपके फोन में सारे विकल्प हिंदी में दिखने लगते हैं और वह भगतजी के सुझाव वाली रोमन हिन्दी नहीं, बल्कि विशुद्ध देवनागरी लिपि वाली हिंदी होती है।
उनका यह कहना भी गलत है कि हिंदी के बिना मोबाइल ऐप्स का उपयोग नहीं किया जा सकता। फेसबुक, वॉट्सऐप, ट्विटर जैसे अधिकांश लोकप्रिय ऐप्स अब देवनागरी हिंदी में उपलब्ध हैं। वे आगे लिखते हैं कि वॉट्सऐप में करोड़ों भारतीय सारी बातचीत रोमन हिंदी में करते हैं, इसलिए रोमन हिंदी ही अपना ली जाए। लेकिन इसके आगे उन्होंने स्वयं ही ये भी लिखा है कि ऐसे सॉफ्टवेयर उपलब्ध हैं, जिनसे हिंदी में भी लिखा जा सकता है, लेकिन कोई इनका उपयोग नहीं कर रहा है। तार्किक बात तो ये है कि अगर सॉफ्टवेयर उपलब्ध हैं, तो लोगों को उनकी जानकारी दी जाए। लेकिन ऐसा करने के बजाय वे उल्टा सुझाव दे रहे हैं कि जो लोग उन सॉफ्टवेयर का उपयोग करते भी हैं, वे भी इनका उपयोग बंद करके रोमन में ही हिंदी लिखें। यह तर्क ऐसा ही है, जैसे कोई उनसे कहे कि अगर उनकी किताबें नहीं बिक रही हैं, तो अपनी किताबों का प्रचार करके लोगों तक पहुंचाने की बजाय वे किताबें लिखना ही बंद कर दें।
उनका एक तर्क ये भी है कि ऐसे सॉफ्टवेयर भले ही आउटपुट देवनागरी में देते हैं, लेकिन यूज़र को रोमन में ही टाइप करना पड़ता है। मैंने छः वर्षों तक कंप्यूटर साइंस की पढ़ाई की है, इसलिए मैं जानता हूं कि कंप्यूटर सारा काम बाइनरी भाषा में करते हैं, जिसमें सब-कुछ सिर्फ दो अंकों 1 और 0 से लिखा जाता है। मैं चाहे ‘A’ लिखूं या लिखूं, कंप्यूटर सब-कुछ बाइनरी में ही समझता है। तो क्या मैं सब 1 और 0 से ही लिखने लगूं? हिंदी में ट्रांसलिटरेशन करने वाले सॉफ्टवेयर चाहे बाइनरी में काम करें या रोमन में, मुख्य बात ये है कि वे परिणाम क्या देते हैं? और जब वे हिन्दी के लिए देवनागरी लिपि में परिणाम दे सकते हैं, तो उनका उपयोग करके हिंदी लिखने की बजाय हम क्यों रोमन में ही लिखें?
यह विचार पूरी तरह गलत लगता है कि हिंदी को बचाने की कोशिश में उसकी लिपि को ही मार दिया जाए। यह तर्क ऐसा ही है, जैसे मैं सारे अंडे एक साथ पाने की कोशिश में अपनी मुर्गी को ही मार दूं। चाहे गूगल हो या माइक्रोसॉफ्ट या दुनिया की कोई और बड़ी कंपनी हो, ये सब अपने उत्पाद और सेवाएं हिंदी में उपलब्ध करवाने के लिए लाखों डॉलर खर्च कर रही हैं। माइक्रोसॉफ्ट के विण्डोज़ ऑपरेटिंग सिस्टम सहित, उनके लगभग सारे उत्पाद देवनागरी लिपि वाली हिंदी में उपलब्ध हैं। गूगल सर्च और जीमेल सहित, गूगल के भी लगभग सारे उत्पाद और सेवाएं देवनागरी लिपि वाली हिंदी में उपलब्ध हैं। यहां तक कि फेसबुक, ट्विटर और वॉट्सऐप जैसी सोशल मीडिया सुविधाएं भी देवनागरी वाली हिन्दी में उपलब्ध हैं। जहां तक हिन्दी में लिखने की बात है, तो गूगल इनपुट टूल्स नामक सरल सॉफ्टवेयर के उपयोग द्वारा आज बहुत आसानी से अपने फोन या कंप्यूटर पर हम हिंदी में लिख सकते हैं।
मैं अपने लैपटॉप में विण्डोज़ 8.1 का हिन्दी संस्करण उपयोग करता हूं। मेरे एण्ड्रॉइड स्मार्टफोन का पूरा इंटरफेस हिंदी में है। मैं जीमेल, फेसबुक, ट्विटर, वॉट्सऐप सबका हिंदी संस्करण उपयोग करता हूं और यह सब देवनागरी में है, रोमन हिंदी में नहीं। इसलिए यह कहना पूरी तरह गलत है कि अंग्रेज़ी या रोमन हिंदी के बिना हम आधुनिक तकनीक का उपयोग नहीं कर सकते।
ये सही है कि रोमन हिंदी बॉलीवुड के पोस्टरों और विज्ञापनों में प्रचलित है। ये भी हो सकता है कि हिंदी फिल्मों के स्क्रीनप्ले रोमन हिंदी में लिखे जा रहे हैं। लेकिन अगर बॉलीवुड के कुछ कलाकार और निर्देशक हिन्दी नहीं सीखना चाहते, तो क्या हिन्दी को ही ख़त्म कर दिया जाए? यह कहना सिर्फ भ्रम फैलाने का प्रयास है कि आज की तकनीक-आधारित ज़िंदगी में देवनागरी लिपि को शामिल करना बहुत कठिन काम है। यह तर्क यूनिकोड तकनीक के आने से पहले चल सकता था, लेकिन अब यूनिकोड के कारण हिंदी या किसी भी भाषा का उपयोग किसी भी वेबसाइट, सॉफ्टवेयर, सोशल मीडिया या फोन पर करने में कोई दिक्कत नहीं रह गई है।
अगर किसी एक लिपि को अपना लेना देश की एकता में बहुत बड़ा कदम होगा, तो क्यों न भारत में अंग्रेजी के लिए रोमन की बजाय देवनागरी लिपि ही अपना ली जाए? आज हिंदी को रोमन में लिखने की बात करने वाले कल शायद मराठी, बांग्ला, गुजराती, पंजाबी, तमिल, तेलुगु आदि सभी भाषाओं को रोमन में लिखने की वकालत करने लगेंगे। तो क्यों न इतनी मेहनत करने के बजाय अकेली अंग्रेज़ी को ही देवनागरी में लिखा जाए? ‘आप कैसे हैं?’ को ‘Aap kaise hain?’ लिखने की बजाय क्यों न हम ‘How are you?’ को भी हाऊ आर यू?’ लिखना शुरू कर दें? रोमन को ग्लोबल स्क्रिप्ट कहकर इसे अपनाने का तर्क देने से बेहतर यह होगा कि हम अपने देश में और दुनिया भर में अपनी भाषा के लिए अपनी लिपि का ज्यादा से ज्यादा उपयोग करके इसे भी एक ग्लोबल स्क्रिप्ट का दर्जा दिलाएं। चीनी मैंडरिन को बोलने वालों की संख्या शायद दुनिया में सबसे ज्यादा है, लेकिन उसकी लिपि रोमन नहीं है। यूएन में अरबी सहित कई आधिकारिक भाषाएं हैं, लेकिन वे भाषाएं अपनी-अपनी लिपि का उपयोग करती हैं, सभी भाषाओं में सिर्फ रोमन लिपि में ही काम नहीं होता। सबकी एक लिपि करने से विविधता भी नष्ट हो जाएगी और भाषा का सौंदर्य भी ख़त्म हो जाएगा।
अंग्रेजी और हिन्दी दोनों की अपनी-अपनी उपयोगिता है, इसलिए हिंदी पर रोमन लिपि थोपकर इसे भाषाओं के बीच संघर्ष का रंग देने से अच्छा ये है कि हम दोनों भाषाओं की मूल लिपि का ही उपयोग करके उनके सौंदर्य और उपयोगिता दोनों को बनाए रखें।
भगतजी, आय होप माय पॉइंट इज़ क्लीयर टू यू!

1 comment:

  1. India is divided by complex scripts but not by phonetic sounds needs simple nukta and shirorekha free Gujanagari script at national level along with Roman script.

    Writing Hindi in Roman script is nothing but reviving our old Brahmi script which was modified by Roman people to their use. We need more research in this area.

    Think,In internet age,Why all Indian languages are taught to others in Roman script but not in a complex Devanagari script?
    Why some Devanagari scripted languages are slowly disappearing?
    Which script will unite sister languages(Urdu/Hindi)?

    If Hindi can be learned in a complex Urdu script then why it can't be done in easy regional Gujanagari script?

    We need to Provide education to children in a simple Gujanagari script and free India from complex scripts.

    One may go through these links.
    http://www.omniglot.com/writing/brahmi.htm
    http://www.omniglot.com/writing/gujarati.htm
    Also we need standard Roman Alphabet to write Hindi in Roman script
    Each consonant produces these 15 sounds when combined with vowels.
    ્,ા,િ,ી,ુ,ૂ,ૅ,ે,ૈ,ૉ,ો,ૌ,ં ,ં,ઃ
    ə ɑ ɪ iː ʊ uː æ ɛ əɪ ɔ o əʊ əm ən əh .........IPA........ɑɪ ,ɑʊ,æʊ,
    ạ ā i ī u ū ă e ại ǒ o ạu ạm ạn ạh.........Gujạlish
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    https://groups.google.com/forum/?hl=en&fromgroups=#!topic/hindishikshakbandhu/aP2VEOwD0cQ

    https://amrutmanthan.files.wordpress.com/2010/07/amrutmanthan_hindi-will-destroy-marathi-language_tamil-tribune_100728.pdf

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